राजस्थान के इन रेगिस्तानों से पानी भले ना निकले, मगर देश और दुनिया के लिए इस मुश्किल वक्त में इन्हीं रेतों से उम्मीद की किरण फूटी है. एक ऐसी उम्मीद जो ये कह रही है कि कोरोना को रोका जा सकता है. राजस्थान के भीलवाड़ा जैसे छोटे से शहर ने जो कर दिखाया उसके चर्चे आज पूरी दुनिया में हैं. कहा जा रहा है कि कोरोना से लड़ने के लिए भीलवाड़ा मॉडल अपनाकर इस महामारी से आज़ादी पाई जा सकती है. अमेरिका हो या इटली, स्पेन या जर्मनी या फिर ईरान हो या भारत. हर जगह आज भीलवाड़ा मॉडल के ही चर्चे हैं. मगर सवाल ये कि आखिर भीलवाड़ा ने ऐसा किया क्या. जो पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गया.
जिस कोरोना ने पूरे देश को 40 दिनों के लिए बंद करवा दिया. जिस कोरोना की चपेट में अब तक दस हजार से ज्यादा लोग आ चुके हैं. जिस कोरोना के चलते करीब साढ़े तीन सौ लोगों की मौत हो चुकी है. जिसके मामले हर दिन हजार के हिसाब से बढ़ रहे हैं, उसी कोरोना से हिंदुस्तान के तीन इलाकों ने जिस तरह मुकाबला किया वो एक मिसाल बन गया. अगर इन तीन इलाकों के मॉडल पूरे देश में अपना लिए जाएं तो कोरोना की हार तय है.
कोरोना पर फुल कवरेज के लिए यहां क्लिक करें
भीलवाड़ा में कोरोना का कहर
करीब 23 लाख की आबादी वाला राजस्थान का एक गुमनाम ज़िला पिछले महीने अचानक सुर्खियों में आ गया था. दरअसल, भीलवाड़ा देश का इकलौता ऐसा इलाका बना बैठा था, जहां कोरोना की थर्ड स्टेज ने दस्तक दे दी थी. अचानक आए कोरोना के 27 मामलों ने राजस्थान सरकार और भीलवाड़ा प्रशासन के हाथ पैर फुला दिए. शुरुआत एक प्राइवेट हॉस्पिटल से हुई. जहां एक डॉक्टर कोरोना पॉजिटिव पाए गए. इसके बाद तो मानो यहां कोरोना पॉज़िटिव मामलों की झड़ी ही लग गई. संक्रमण पहले अस्पताल के कर्मचारियों और मेडिकल स्टाफ में फैला. 17 डॉक्टर और नर्स इसका शिकार हुए. फिर ये वायरस अस्पताल से बाहर भी लोगों को अपना निशाना बनाने लगा. एक पल को लगा कि भीलवाड़ा इटली ना बन जाए.
नहीं बढ़ी मरीजों की संख्या
मगर फिर जो मॉडल यहां अपनाया गया, उसे देखकर पूरी दुनिया हैरान रह गई. इस मॉडल ने ऐसा चमत्कार किया कि भीलवाड़ा में कोरोना के मरीज़ों की तादाद 27 से 28 तक नहीं होने पाई. पर आखिर ये भीलवाड़ा मॉडल था क्या? इसे किसने बनाया. कैसे बनाया. सरकार और प्रशासन ने यहां कोरोना के मरीज़ों की तादाद को कैसे नहीं बढ़ने दिया? इस कामयाबी के पीछे हीरो कौन है? ये जानना ज़रूरी है. तो शुरुआत सबसे पहले भीलवाड़ा के मॉडल से.
ये है भीलवाड़ा मॉडल
सरकार ने सबसे पहले पूरे भीलवाड़ा को अलग-अलग ज़ोन में बांट दिया. पहला हॉट ज़ोन जिसे 1 किलोमीटर के दायरे में लिया गया. दूसरा बफर ज़ोन जिसे 3 किलोमीटर के दायरे में रखा गया. फिर बाहरी ज़ोन जिसके दायरे में पूरे भीलवाड़ा ज़िले को लिया गया. इन सभी इलाकों में पहले कर्फ्यू और फिर महाकर्फ्यू लगाया गया. उसके बाद स्वास्थ्य कर्मियों की 3072 टीमें भीलवाड़ा भेजी गईं. एक-एक घर जाकर सर्वे के साथ-साथ लोगों की 2 से 3 बार स्क्रीनिंग की गई. 15 दिन के अंदर-अदर करीब 22 लाख लोगों की स्क्रीनिंग कर दी गई. स्क्रीनिंग के बाद पता चला कि जिले के करीब 14 हज़ार लोगों में खांसी जुकाम के लक्षण हैं.
बिना कोई रिस्क लिए इन सभी 14 हजार लोगों को प्रशासन ने फौरन क्वारंटीन में भेजा दिया. इन 14 हज़ार लोगों से डॉक्टर की टीम लगातार संपर्क में रही और दिन में 2 बार इन लोगों के चेकअप किए गए. साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग पर पूरा ज़ोर दिया गया. यही नहीं शहर के 55 वार्डों को पूरी तरह सैनिटाइज़ भी करवाया गया.
आपको बता दें कि 20 मार्च को भीलवाड़ा में पहला कोरोना पॉज़िटिव केस मिला था. इसके बाद एक दिन के अंदर 50 चेक पोस्ट बनाकर पूरे शहर को सील कर दिया गया. रोडवेज़ बसें, प्राइवेट गाड़ियां सब रोक दी गई. कर्फ्यू के दौरान राशन और सब्ज़ी की होम डिलिवरी की गई. इसके बाद पहले संक्रमित शख्स से जिस अस्पताल में 17 डॉक्टर और नर्स कोरोना पॉज़िटिव हुए. वहां आए 6 हज़ार लोगों की लिस्ट बनाई गई और उन्हें फौरन क्वॉरेटाइन किया गया. इसके बाद तकरीबन पूरे ज़िले की स्क्रीनिंग हुई. मगर सरकार के सामने समस्या ये थी कि आखिर इतने लोगों को कैसे क्वॉरेंटाइन किया जाए. लिहाज़ सरकार ने भीलवाड़ा के सभी फाइव स्टार, थ्री स्टार होटल, रिजॉर्ट और प्राइवेट अस्पतालों का अधिग्रहण कर लिया. इन्हीं होटलों और रिजार्ट में स्वास्थ्य कर्मियों की देखरेख में क्वारंटाइन किए हुए लोगों को रखा गया.
रूथलेस कर्फ्यू का इस्तेमाल
भीलवाड़ा के कर्फ्यू को रूथलेस कर्फ्यू का नाम दिया गया. मतलब ऐसा कर्फ्यू जिसमें किसी तरह की कोई मुरव्वत नहीं की गई. इतनी पुख्ता और सख्त कार्रवाई का ही नतीजा था कि भीलवाड़ा को कोरोना पर जीत हासिल करने में सिर्फ 15 दिन लगे. इस तरह ये राजस्थान का पहला कोरोना मुक्त ज़िला बना. भीलवाड़ा की कामयाबी देख केंद्र सरकार ने तत्काल राज्यों से इसी मॉडल पर काम करने की सलाह दी. खुद राज्य सरकारों ने गहलोत सरकार से इस मॉडल को समझने के लिए संपर्क साधा. यहां तक की दुनिया के कई असरदार लोगों ने इस मॉडल को समझने और उसे अपने यहां अपनाने में दिलचस्पी दिखाई.
कोरोना कमांडोज़ का हौसला बढ़ाएं और उन्हें शुक्रिया कहें...
कर्फ्यू के शुरुआती तीन चार दिनों तक तो लोग समझ ही नहीं पाए कि आखिर हो क्या रहा है. घबराए लोग खाने पीने का सामान जुटाने के लिए बदहवास नजर आए. मगर मुख्यमंत्री गहलोत और प्रशासन ने लोगों को इत्मिनान दिलाया कि उनकी ज़रूरत के सामान उनके घरों तक पहुंचाए जाएंगे. और ऐसा किया भी गया. दुनिया में ये पहली मिसाल है जहां कोरोना के फेज़-3 में पहुंच जाने के बाद भी उसे इस तरह काबू किया गया हो. यही वजह है कि अब दुनिया भर में भीलवाड़ा कोरोना से लड़ने के लिए एक मॉडल बन चुका है. ज़ाहिर है देश के सामने कोरोना से जंग में भीलवाड़ा एक नजीर है. ऐसे में अगर इस मॉडल को बाकी जगहों पर भी कड़ाई से लागू किया जाए तो कोरोना पर काबू पाया जा सकता है.
भीलवाड़ा के नायक
अब आखिर में सवाल ये कि कोरोना मॉडल का ये आईडिया था किसका? किसने इसे लागू कराया. और किसने इस मॉडल को चैलेंज की तरह लेकर मिसाल पेश कर दी. कौन है भीलवाड़ा मॉडल के हीरो? तो इसमें सबसे पहला नाम आता है राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव रोहित सिंह का. जिन्होंने वुहान की रणनीति को बारीकी से समझा और फिर इसे भीलवाड़ा में लागू करने का आइडिया दिया था. इस मॉडल की दूसरी हीरो हैं आईएएस अधिकारी टीना डाबी. जिन्होंने प्रशासनिक स्तर पर इसे शानदार तरीके से लागू किया. कुछ साल पहले दिल्ली की टीना डाबी तब सुर्खियों में आईं थी, जब इन्होंने यूपीएससी में टॉप किया था. फिलहाल ये भीलवाड़ा में सब डिविज़न कलेक्टर के तौर पर तैनात हैं. और सबसे अहम रोल रहा राजस्थान की सरकार का. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने शुरु से ही राजस्थान में कोरोना के मामलों को लेकर काफी संवेदनशीलता दिखाई, इसी की नतीजा है कि भीलवाड़ा पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया.
शम्स ताहिर खान / परवेज़ सागर