हर साल प्राकृतिक आपदाओं आदि कई वजहों से बहुत से लोग गायब हो जाते हैं. लाख ढूढ़ने के बाद भी जब ये लोग नहीं मिलते तो परिजन थक-हारकर बैठ जाते हैं. ऐसे व्यक्ति का कुछ पता नहीं होता कि जिंदा है भी या नहीं. ऐसे में घर वाले क्या करें? क्या उन्हें उस व्यक्ति की बीमा रकम के लिए आवेदन करना चाहिए? और करना चाहते हैं तो यह कैसे हो सकता है? आइए इसे जानते हैं.
अगर गायब होने वाला व्यक्ति कमाने वाला परिवार का एकमात्र सहारा था, तो ऐसी बीमा पॉलिसी का क्लेम हासिल करना परिवार के लिए और जरूरी हो जाता है.
कब कर सकते हैं क्लेम
सामान्य तौर पर जब किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है तो परिवार के लोग उसकी मौत का सर्टिफिकेट और अन्य दस्तावेज जमाकर बीमा की रकम हासिल कर लेते हैं, लेकिन गायब हुए व्यक्ति का तो कोई डेथ सर्टिफिकेट नहीं हो सकता. लेकिन एक ऐसा कानून है जिसके मुताबिक गायब हुए व्यक्ति को मृत घोषित किया जा सकता है.
इंडियन एविडेंट एक्ट के सेक्शन 108 के अनुसार, किसी व्यक्ति के गायब होने के बारे में दर्ज एफआईआर के सात साल बाद उसे मृत मान लिया जाता है. इस तरह किसी गायब व्यक्ति के बीमा की रकम हासिल करने के लिए परिजनों को कम से कम सात साल तक इंतजार करना होगा.
लेकिन अगर व्यक्ति गायब होता है तो अगले वर्षों में उसके बीमा प्रीमियम की रकम परिवार को जमा करनी होगी, नहीं तो पॉलिसी लैप्स हो जाएगी, खासकर टर्म प्लान के मामले में ऐसा होता है.
कैसे मिलेगी बीमा की राशि
पॉलिसीधारक लापता हो जाता है, तो सबसे पहले उसके वारिस इंश्योरेंस ऑफिस में जाकर सूचित करें. परिजन सात साल होने पर पहले उस व्यक्ति का डेट सर्टिफिकेट हासिल करेंगे, इसके बाद कोर्ट से संपर्क करेंगे. कोर्ट ही बीमा कंपनी को बीमा जारी करने का आदेश देगा. गायब व्यक्ति के कानूनी वारिसों को इसके लिए एफआईआर की कॉपी और पुलिस की नॉन-ट्रेसेबल रिपोर्ट भी जमा करनी होगी.
किन हालात में पहले मिल जाता है पैसा
कई बार गायब व्यक्ति के बीमा के मामले में 7 साल की शर्त का पालन नहीं किया जा सकता. अगर तमाम साक्ष्यों से यह बात साफ प्रमाणित हो रही है कि व्यक्ति की मौत हो चुकी है, तो बीमा कंपनी सात साल की शर्त में राहत दे सकती है, जैसे सरकार ने लिस्ट जारी कर मौत की आशंका जाहिर की हो. हालांकि अक्सर प्राकृतिक आपदाओं की हालत में बीमा कंपनी दावों का निपटान नहीं करती, क्योंकि बीमाधारक की मौत का कोई प्रमाण नहीं होमा.
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