सालों से बेंगलुरु में घर खरीदने का सपना देखने वाले लोग एक ही उम्मीद लगाए बैठे थे कीमतें कम होंगी, मार्केट में सुधार आएगा और घर एक बार फिर उनके बजट में होंगे. लेकिन बाज़ार के ताजा आंकड़ों और जमीनी रुझानों ने इस उम्मीद पर पानी फेरते हुए सिर्फ निराशा ही दी है. शहर का रियल एस्टेट मार्केट अब सिर्फ महंगा ही नहीं हुआ है, बल्कि इसने अपनी बुनियादी कीमतों को ही पूरी तरह बदल दिया है. वह बजट जिसे कभी 'प्रीमियम' माना जाता था, अब शहर में घर खरीदने के लिए केवल एक शुरुआती कीमत बन कर रह गया है.
चार्टर्ड अकाउंटेंट और वित्तीय विश्लेषक नितिन कौशिक ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए इस बदलाव को साझा किया. उन्होंने बेंगलुरु में ₹1 करोड़ के "ड्रीम होम" को "आधिकारिक तौर पर एक मिथक करार दिया. उनका यह आकलन खरीदारों, ब्रोकरों और डेवलपर्स के बीच बढ़ती आम सहमति को दर्शाता है. महामारी से पहले के स्तर पर कीमतों के वापस लौटने का इंतजार करने का अब तक कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला है.
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₹1 करोड़ अब 'लग्जरी' नहीं रहा
कुछ साल पहले तक, ₹1 करोड़ के बजट को हाई-एंड यानी प्रीमियम हाउसिंग से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन आज, कई प्रमुख आईटी कॉरिडोर में इस कीमत में बमुश्किल एक साधारण दो-बेडरूम अपार्टमेंट ही मिल पा रहा है. व्हाइटफील्ड (Whitefield) और सरजापुर (Sarjapur) जैसे क्षेत्रों में, प्रति वर्ग फुट की दरें अब ₹10,000 से ₹15,000 के बीच पहुंच गई हैं. इन लोकेशनों पर एक सामान्य तीन-बेडरूम (3BHK) अपार्टमेंट की कीमत अब ₹1.5 करोड़ से ₹2 करोड़ के बीच है और यह कीमत इंटीरियर, रजिस्ट्रेशन और फर्निशिंग के खर्चों को जोड़ने से पहले की है.
बेंगलुरु के वे बाहरी इलाके भी, जिन्हें कभी "किफायती" माना जाता था, अब वहां की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है. एयरपोर्ट के पास के इलाके और सुदूर उत्तर बेंगलुरु में दरें ₹7,000 प्रति वर्ग फुट को पार कर रही हैं. इसने उन पहली बार घर खरीदने वाले ग्राहकों की उम्मीदों को खत्म कर दिया है, जो इस भरोसे थे कि शहर से दूर जाने पर उन्हें कम कीमत में घर मिल जाएगा.
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कीमतें कम क्यों नहीं हो रही हैं?
यह तेजी केवल सट्टेबाजी या निवेश की वजह से नहीं है. खरीदारों की पसंद और शहरी जीवन शैली में आए संरचनात्मक बदलाव मांग के स्वरूप को बदल रहे हैं. सबसे बड़े बदलावों में से एक है 'नजदीकी' को दिया जाने वाला महत्व. ऑफिस जाने के लंबे सफर का आकर्षण अब खत्म हो गया है, खासकर तब जब हाइब्रिड वर्क मॉडल ने ऑफिस और घर के बीच के अंतर को कम कर दिया है. अब खरीदार उन घरों के लिए मोटी कीमत देने को तैयार हैं, जो उनके दफ्तर, स्कूल और दैनिक सुविधाओं तक पहुंचने के समय को कम करते हैं. इस बाजार में अब मार्बल की फ्लोरिंग नहीं, बल्कि 'समय' असली लग्जरी बन गया है.
परियोजनाओं की सुरक्षा और समय पर पजेशन मिलना अब खरीदारों के लिए एक और बड़ा कारक बन गया है. सालों तक प्रोजेक्ट्स के अटकने और देरी से मिलने के अनुभवों के बाद, खरीदार अब नामी और भरोसेमंद डेवलपर्स को प्राथमिकता दे रहे हैं. इसके लिए वे ग्रेड-ए बिल्डर्स को 15-20% अधिक कीमत देने को भी तैयार हैं, सिर्फ इस भरोसे के लिए कि उनका घर समय पर मिल जाएगा.
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किराए ने भी बदला खरीदारों का मन
आसमान छूते किराए भी लोगों को घर खरीदने की ओर धकेल रहे हैं. कई इलाकों में दो-बेडरूम अपार्टमेंट का मासिक किराया अब ₹45,000 तक पहुंच गया है. ऐसे में "किराया बनाम ईएमआई" का पुराना गणित अब बदल चुका है. कई परिवारों के लिए अब हर महीने बढ़ने वाले किराए की तुलना में ईएमआई भरना कम दर्दनाक महसूस हो रहा है, जिससे वे अनिच्छा से ही सही लेकिन खरीदारी की ओर निर्णायक कदम उठा रहे हैं.
यह कोई 'बबल' नहीं, बल्कि 'न्यू नॉर्मल' है मुंबई या दिल्ली के विपरीत, बेंगलुरु का मार्केट किसी पुरानी लीक पर नहीं चल रहा है. इसके बजाय, यहां एक ऐसा बाजार बन रहा है जहां सुविधा, बुनियादी ढांचा और विश्वसनीयता ही कीमतें तय करती हैं.
कौशिक की खरीदारों को सलाह इस नई वास्तविकता को दर्शाती है: "मार्केट में सही समय का इंतजार करना छोड़ दें." इसके बजाय, मूलभूत सुविधाओं जैसे पानी की सुरक्षा, बुनियादी ढांचे का विकास, कनेक्टिविटी और काम की जगह से नजदीकी पर ध्यान दें. कड़वा सच तो यही है कि बेंगलुरु में ₹1 करोड़ का घर अब 'प्रीमियम' नहीं रह गया है.
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