प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान 13 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की थी. इस बीमा योजना मकसद था प्राकृतिक आपदाओं, कीड़ों के हमलों या आग की वजह से हुए फसली नुकसान की भरपाई करना. लेकिन कई राज्यों में किसान अब इस योजना से दूरी बना रहे हैं. जानकार भी मोदी सरकार की इस योजना में खामियां गिनाते रहे हैं.
किसानों की आपबीती
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में पिछले साल एक किसान को 20,000 रुपये का नुकसान होने पर फसल बीमा के महज 951 रुपये मुआवजे के तौर पर मिले. किसान का कहना था कि इससे ज्यादा तो उन्होंने प्रीमियम दिया था. वहीं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सीहोर में साल 2017 में किसानों को मात्र 4 रुपये और 17 रुपये तक का मुआवजा दिया गया था, जबकि किसान ने प्रीमियम 1,342 रुपये भरा था.
ऐसी मिसालें देश भर में मिल जाएंगी. नतीजतन, फसल बीमा योजना से किसानों का मोहभंग होने लगा है. सरकार का लक्ष्य 2019 के मार्च तक बुआई के कुल रकबे के करीब 50 फीसदी हिस्से को बीमा के दायरे में लाना था. वजह यह कि 2016-17 में बुआई के कुल रकबे की 30 फीसदी फसल ही बीमा के दायरे में थी, लेकिन 2017-18 में इसमें करीब एक-चौथाई की कमी दर्ज की गई.
बजट से उम्मीद...
हालांकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लेकर मोदी सरकार सक्रिय दिख रही है और उम्मीद की जा रही है कि बजट में इससे जुड़ी खामियां खत्म हो सकती हैं. साथ ही इसका दायरा भी बढ़ाया जा सकता है. दोबारा सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने कई योजनाओं पर काम करने के लिए 100 दिन का लक्ष्य रखा है. इसी के तहत सरकार फसल बीमा का दायरा बढ़ाने के लिए जल्द ही डाकघरों में भी सुविधा शुरू करेगी. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का कहना है कि डाकघरों में यह सुविधा उपलब्ध होने से लाभ लेने वाले किसानों की संख्या दोगुनी हो जाएगी.प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में किसान को महज 1 से 1.5 फीसदी तक ही प्रीमियम देने का प्रावधान है. बाकी प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकार भरती हैं. लेकिन सरकार फसल बीमा से सीधे नहीं जुड़ी है. वह इसके लिए बीमा कंपनियों से निविदा मंगाती है जो भविष्य में होने वाले नुकसान के अनुमान की गणना कर उसका प्रीमियम वसूल करती हैं.
फसल बीमा योजना की खामियां
किसान को कोई कागजात नहीं दिया जाता है, जिससे वह साबित कर सकें कि उसका बीमा हो गया है. नुकसान होने की स्थिति में किसान को खुद 48 घंटे के अंदर रिपोर्ट करना होता है. क्लेम के लिए बीमा कंपनियां मनमानी करती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों की घटती दिलचस्पी का एक कारण यह भी है कि बीमा कंपनियां क्लेम को तेजी से नहीं निपटाती हैं, क्योंकि बीमा पॉलिसी बैंकों और बीमा कंपनियों के हितों के हिसाब से बनाई गई है.
साल 2017 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी नई रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' में कई खामियों को उजागर किया था. रिपोर्ट में कहा गया था कि किसानों को बीमा राशि मुहैया कराने में की जा रही देरी के चलते किसानों को समय से वित्तीय मदद प्रदान करने का लक्ष्य बाधित हुआ. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जितने किसानों पर सर्वेक्षण किया गया, उनमें से दो तिहाई (66.66 फीसदी) किसानों को इस योजना की जानकारी ही नहीं थी.
गौरतलब है कि पिछले कई सालों से अवर्षण, ओलावृष्टि और तूफान के चलते फसलें नष्ट हो रही हैं. कर्ज लेकर खून-पसीने बहाकर खेती करने वाले अन्नदाता बर्बाद हो रहे थे. नुकसान से बचाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू किया गया है.
अमित कुमार दुबे