मणिकर्णिका घाट (वाराणसी) पर चल रहा बुलडोजर ऐक्शन चर्चा में है. घाट का विस्तार और इसके आसपास अतिक्रमण हटाकर सुंदरीकरण के लिए हो रही तोड़फोड़ से कुछ लोग नाराज हैं. राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी जारी हैं. विवाद और राजनीति से इतर बात करते हैं काशी की विरासत रहे मणिकर्णिका घाट के महत्व की.
काशी और मणिकर्णिका की क्या है मान्यता?
मणिकर्णिका का श्मशान घाट उतना ही पुराना है, जितना पुराना यह मानना कि काशी में बाबा विश्वनाथ के रूप में भगवान शिव हमेशा निवास करते हैं. ये कैलास के अलावा उनका दूसरा घर है और पुराण इसे शिव की नगरी बताते हैं. कहा जाता है कि काशी के इसी मणिकर्णिका घाट पर दूर-दूर से आकर लोग खुद को लकड़ी चीरने वाले आरे से चिरवा लेते थे. इस तरह वे यहां एक तरीके से आत्महत्या कर लेते थे क्योंकि उनका मानना था कि काशी में मरने और मणिकर्णिका घाट पर जलाए जाने और गंगा में अस्थियां बहा देने से वह जन्म-मरण से मुक्त हो जाएंगे और मोक्ष पा लेंगे या फिर स्वर्ग चले जाएंगे.
इस बात की गवाही बाबा कबीर की वो वाणी देती है, जिसमें वह कहते थे, 'जो कबीर काशी में मरिहें, रामहिं कौन निहोरा?' यानि अगर सिर्फ काशी में ही मरने से स्वर्ग मिल जाता है तो फिर ईश्वर के होने न होने का क्या मतलब? कर्म के लेख का क्या ही मोल?
काशी, वाराणसी और मणिकर्णिका घाट के साथ ये सारी मान्यताएं कैसे जुड़ गईं? इन सवालों का जवाब स्कंदपुराण में मिलता है. इस पुराण के काशी खंड में श्रीशैल पर्वत पर महर्षि अगस्त्य को कुमार कार्तिकेय काशी तीर्थ की महिमा एक कथा के रूप में सुनाते हैं.
शिवजी ने काशी को कहा था आनंदवन
वह बताते हैं कि काशी शिव और शक्ति (प्रकृति) का आनंद स्थान है. यह इलाका पांच कोस तक फैला हुआ है. जब धरती पर प्रलय आता है तब भी शिव-पार्वती इस क्षेत्र का त्याग नहीं करते हैं और यह पवित्र तीर्थ 'अविमुक्त' तीर्थ बन जाता है. यानी जिसका कभी त्याग नहीं किया गया हो. यह क्षेत्र शिवजी को सबसे अधिक प्यारा और उन्हें आनंद देने वाला था, इसलिए उन्होंने पहले इसका नाम 'आनन्दवन' रखा था.
इसी आनंदवन में शिवजी और माता पार्वती ने अपने शरीर के बाएं हिस्से पर नजर डाली. इस बाएं अंग से तीनों लोकों में सबसे सुंदर पुरुष निकला. शिवजी ने उन्हें पुरुषोत्तम कहा और फिर उन्हें स्थायी नाम देते हुए महाविष्णु बताया. उन्होंने कहा- विष्णु! तुमसे ही वेद प्रकट होंगे और तुम पहले ही सारा सत्य और ज्ञान जान लोगे. ऐसा कहकर शिवजी फिर से अपने आनंदवन में चले गए और समाधि में बैठ गए.
तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से एक सुन्दर तालाब खोदकर उसे अपने शरीर के पसीने से निकले जल से भर दिया, फिर उसीके किनारे शिवजी की ही घोर तपस्या की. तब शिवजी पार्वतीजी के साथ वहां फिर से प्रकट हुए ओर बोले- महाविष्णो! वर मांगो.
मणिकर्णिका नाम रखे जाने की क्या है कथा?
तब भगवान विष्णु ने उनसे माता पार्वती सहित सौम्य रूप में दर्शन देने को कहा- भगवान् शिव बोले - ऐसा ही होगा और इसी दौरान उनके कानों के मणि जड़े हुए कुंडल गिर पड़े. तब शिवजी ने कहा- जनार्दन. इस स्थान पर मेरी मणिजटित कर्णिका (मणिमय कुण्डल) गिर पड़े है, इसलिये इस तीर्थ का नाम मणिकर्णिका हो जाएगा.
इस तरह काशी में स्थित गंगा किनारे एक कुंड के पास बने घाट को मणिकर्णिका घाट नाम मिला. जो आज आत्माओं की मुक्ति का स्थान बना हुआ है. शिवजी से वरदान पाने के बाद भगवान विष्णु बोले- प्रभु! यहां मुक्तामय कुण्डल गिरने से यह उत्तम तीर्थ मुक्ति का प्रधान क्षेत्र भी कहलाए और यहां शिवस्वरूप ज्योति प्रकाशित होती है, इसलिये इसका दूसरा नाम 'काशी' होगा.
इस तरह प्राचीन पौराणिक कथाओं के कारण काशी मुक्ति का क्षेत्र बन गया और मणिकर्णिका मुक्ति देने का साधन. कहते हैं कि यहां जब भी कोई चिता जलने के लिए आती है तो शिव, उस शव को खुद अपनी गोद में सहारा देते हैं और मृतक के कान में तारक मंत्र कहते हैं. शिवजी के ऐसा करने से आत्मा शिवतत्व में समा जाती है और मोक्ष या स्वर्ग की राह पर निकल जाती है. पुराण कथाओं की यह बातें और लोक मान्यताएं आगे चलकर इतनी गहराई तक जाकर बैठ गईं कि लोग खुद ही अपनी एक उम्र जी लेने के बाद काशी में आकर 'आत्मसमाधि, आत्महत्या' जैसा तरीका अपनाते थे.
काशी में लोग क्यों त्याग देते थे प्राण
कुष्ठ या और भी गंभीर-लाइलाज रोग वाले रोगी जब ये जान लेते थे कि अब मौत होनी ही है तो वह किसी तरह काशी के लिए यात्रा पर निकल पड़ते थे. इस यात्रा और प्रक्रिया को काशी करवत, या काशी करौट कहा जाता था. मणिकर्णिका घाट के पास मौजूद काशी करवट मंदिर इसका गवाह रहा है. लोग यहां आते थे और तिथि-मुहूर्त देखकर घाट पर ही खुद को आरे से चिरवा लेते थे.
बाद के दिनों में बहुत से लोग नदी में डूबकर, ऊंचे पेड़ों से कूदकर और अग्नि में जलकर भी अपने प्राण त्यागने लगे. कई बार रोगी ऐसा करते कि वह अपना इलाज बिल्कुल बंद कर देते थे और जबतक मृत्यु न हो जाए तबतक काशी में निवास में करते थे. ऐसी ही मान्यता प्रयागराज संगम और कुंभ के साथ भी जुड़ी थी, जिसका जिक्र तो कई मुगल और ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी किया है.
भक्ति काल के कई संत कवियों ने अपने भजनों में 'काशी करवट' परंपरा का जिक्र किया है. जैसे सूरदास ही अपने पद में कहते हैं, 'सूरदास प्रभु तुम्हारे दर्शन बिन, लेहो करवट कासी' यानी प्रभु कृष्ण दर्शन नहीं देंगे, तो वे काशी करवत (काशी में आत्महत्या) कर लेंगे. केवल सूरदास ही नहीं, बल्कि कबीर, रैदास, मीरा बाई, मलिक मोहम्मद जायसी और सूफी संत रज्जब जैसे संतों ने भी अपनी रचनाओं में करवत का जिक्र किया है.
कबीर ने अपने कई दोहों में करवत का जिक्र किया है. उदाहरण के तौर पर-
'करवत भला न करवत तेरी, लागू गले सु बिनती मेरी.'
संत कबीर के समकालीन संत रविदास ने अपने एक दोहे में हरि को पाने के लिए करवत की यातना सहने की बात कही है. उन्होंने लिखा—
'हरि गुरु साध समान चित, नित आगम तत मूल.
इन बिच अंतर जिन परे, करवत सहन कबूल.'
भक्त मीरा बाई की रचना ‘दरस बिन दूखन लागे नैन’ की अंतिम दो पंक्तियों में करवत की पीड़ा दिखती है-
'बिरह कथा कासूं कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन.
मीरा के प्रभु कबरे मिलोगे, दुख मेटण सुख देण.'
इसी तरह संत दादू दयाल भी लिखते हैं-
'हूं सौं करवत काशी कद सह्या, रे तूंगा माहीं ना बह्या.
रे सौं विरहनी ज्यों दुख ना सह्या.'
सूफी संत रज्जब दर्ज करते हैं, 'दादू सिर करवत बहे, राम हद थे जाय. माहीं कलेजा काटिये, काल दरों दिख जाय.'
संत साहित्य में करवत सांसारिक दुखों और आध्यात्मिक मुक्ति के बीच की उस सीमा का प्रतीक बन गई, जहां मनुष्य अपने शरीर को त्यागकर आत्मा की शुद्धि चाहता है, लेकिन इसी भक्ति परंपरा में निर्गुण के कवि महात्मा कबीर ने ऐसी मान्यताओं और परंपराओं की निंदा की और खुले मन से आलोचना की. उन्होंने लिखा-
लोका मति के भोरा रे।
जौ कासी तन तजै कबीरा, तौ रामहि कहां निहोरा रे॥
कहै कबीर सुनहुं रे संतौ, भ्रंमि परे जिनी कोई।
जस कासी तस मगहर ऊसर, हिरदै राम सति होई॥
यह प्रसिद्ध भी है लोक मान्यताओं के उलट जब मृत्यु का समय आया तब कबीर काशी छोड़कर मगहर चले गए थे. उस वक्त मान्यता थी कि काशी में मरने से स्वर्ग मिलता है और मगहर में मरने से नर्क. आज भी उत्तर प्रदेश के मगहर में महात्मा कबीर की समाधि बनी हुई है, जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पंथों के लोग जुटते हैं.
काशी का केंद्र है मणिकर्णिका
काशी के इस मणिकर्णिका घाट को 'महाश्मशान' कहा जाता है. मणिकर्णिका इस काशी नगरी का केंद्र माना जाता है. कहते हैं कि विश्व का नाभिस्थल भारत है. भारत का नाभिस्थल काशी है और काशी का नाभिकेंद्र है मणिकर्णिका, माना जाता है कि यहां पर सदियों से लगातार चिताएं जलती रही हैं और चिता की आग कभी नहीं बुझती है. 5वीं से 7वीं शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने काशी का वर्णन किया. उन्होंने शवदाह की परंपरा और घाटों का जिक्र किया, जो उनके लिए रोचक घटना की तरह था. 12वीं शताब्दी और इसके बाद मुगल कालीन और अंग्रेज यात्रियों ने भी लिखा कि मणिकर्णिका घाट पर रात-दिन चिताएं जलती रहती हैं.
विकास पोरवाल