दरभंगा राजवंश और उसकी अंतिम महारानी: वैभव, रहस्य और पतन की कहानी

दरभंगा राज की अपार संपदा और शाही वैभव का अध्याय हाल ही में 96 वर्ष की आयु में महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ समाप्त हो गया. यह कहानी केवल धन-दौलत की नहीं, बल्कि साज़िश, रहस्य और एक शांत त्रासदी की भी है.

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दरभंगा रियासत के महाराज अपने समय में भारत के तीसरे सबसे धनी शख्स थे दरभंगा रियासत के महाराज अपने समय में भारत के तीसरे सबसे धनी शख्स थे

संदीपन शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 18 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:46 AM IST

बीसवीं सदी की शुरुआत में दरभंगा राज भारत की सबसे भव्य रियासतों में गिना जाता था. बिहार और बंगाल में फैली सैकड़ों वर्ग मील भूमि, 4,495 गांवों पर फैले इस 'साम्राज्य का शासक' भारत का तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति के तौर पर पहचाना जाता था.

नरगोना, रामबाग, राजनगर और बेला के शाही महल यूरोपीय स्थापत्य शैली की चमक से दमकते थे. निजी रेलवे सैलून महाराजा को उनके विशाल इलाकों से सीधे महल तक पहुंचाते थे. रोल्स रॉयस, बेंटले और पैकार्ड जैसी आलीशान कारें शाही गैराज की शोभा बढ़ाती थीं.

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राजवंश की नींव
इस वैभवशाली राजवंश की नींव महाराजा रामेश्वर सिंह ने रखी, जिन्होंने 1898 से 1929 तक शासन किया. शिक्षित और प्रगतिशील सोच वाले महाराजा ने सदियों पुरानी पर्दा प्रथा को तोड़ते हुए अपनी पत्नी को छपरा, मुंगेर और भागलपुर की प्रशासनिक नियुक्तियों पर साथ रखा. समाज के विरोध के चलते उन्होंने कुछ समय के लिए कदम पीछे खींचे, लेकिन जैसे-जैसे समय बदला और उनका कद बढ़ता गया, उनकी पत्नी फिर से उनके साथ सार्वजनिक जीवन में दिखने लगीं. उस दौर में यह एक क्रांतिकारी कदम था.

युवा महाराजा, 21 वर्ष की आयु में संभाली गद्दी
उनके पुत्र कामेश्वर सिंह ने 21 वर्ष की आयु में गद्दी संभाली. 28 नवंबर 1907 को जन्मे कामेश्वर सिंह शिक्षित, वैश्विक नजरिया रखने वाले और राजनीतिक रूप से चतुर शासक थे.

23 वर्ष की उम्र में वे लंदन में आयोजित राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए. वे भारत की संविधान सभा के सदस्य बने और उस संविधान के निर्माण में योगदान दिया, जिसने आखिरकार उनके ही शाही विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया. कहा जाता है कि वे महात्मा गांधी से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने एक प्रसिद्ध अंग्रेज चित्रकार से गांधी जी का चित्र बनवाया था. उन्होंने राज्यसभा में सेवा दी, राष्ट्रीय मंचों पर बिहार का प्रतिनिधित्व किया और ऐसे कानूनी संघर्ष लड़े, जिनके परिणामस्वरूप संविधान में संशोधन हुए. लेकिन सार्वजनिक उपलब्धियों के पीछे उनका निजी जीवन कहीं अधिक जटिल था.

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पहला विवाह... महारानी राजलक्ष्मी
उनकी पहली शादी पारंपरिक मानी जाती थी. महारानी राजलक्ष्मी एक किशोर वधू के रूप में दरभंगा आईं, इस बात से अनजान कि उनका वैवाहिक जीवन एक मौन त्रासदी में बदल जाएगा. 1925 से उन्होंने नियमित रूप से डायरी लिखनी शुरू की. 34 वर्षों तक इन डायरियों में महल की चारदीवारी के भीतर का जीवन दर्ज होता रहा.

1934 में, जिन कारणों का आज तक स्पष्ट खुलासा नहीं हुआ, महाराजा और राजलक्ष्मी के बीच अलगाव हो गया. इसके बाद महारानी राजलक्ष्मी अगले 42 वर्षों तक महल परिसर में ही रहीं. उनकी डायरियां आज भी उस रहस्य से पर्दा उठाने का इंतजार कर रही हैं कि 1934 में वास्तव में क्या हुआ था.

दूसरा विवाह.... महारानी कामेश्वरी प्रिया

इसी 1934 में, अलगाव के वर्ष में ही महाराजा ने दूसरा विवाह किया. महारानी कामेश्वरी प्रिया शिक्षित, सक्रिय और आधुनिक विचारों वाली थीं. महाराजा ने विशेष रूप से महाराष्ट्र से गंगा बाई को बुलवाया, ताकि वे उन्हें शिक्षित और प्रशिक्षित कर सकें.

महारानी ने समकालीन समाज में खुद को ढालना सीखा, प्रशासनिक विषयों पर चर्चा करना सीखा और सामाजिक आयोजनों में अपने पति के साथ आत्मविश्वास से खड़ी रहीं. वे राजनेताओं और अन्य राजघरानों के साथ बैठकों में महाराजा के साथ जाती थीं और दरभंगा राज के प्रशासन को गहरी रुचि से समझती थीं. महाराजा उनसे बेहद प्रसन्न थे.

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लेकिन यह विवाह अधिक समय तक नहीं चल सका. मात्र सात-आठ वर्षों के भीतर ही महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन हो गया.
 
तीसरी महारानी... महारानी कामसुंदरी
लगभग दो वर्षों तक महाराजा ने पुनर्विवाह से इंकार किया. लेकिन राजमाता को अपने पुत्र का अकेलापन खलता था. अंततः 1943 में (कुछ स्रोत 1940 बताते हैं) उन्होंने महाराजा को तीसरी शादी के लिए राजी कर लिया. दुल्हन थीं कल्याणीजी, जो विवाह के बाद महारानी अधिरानी कामसुंदरी के नाम से जानी गईं.
वे महाराजा से काफी छोटी थीं और दूसरी महारानी की तरह आधुनिक जीवनशैली अपनाने में सहज नहीं थीं. लेकिन उनकी एक खास रुचि थी, फोटोग्राफी.

1943 से 1962 तक, 19 वर्षों तक, महाराजा और महारानी ने एक साथ भारत की सबसे बड़ी रियासतों में से एक का संचालन किया. यह वही दौर था, जब देश ब्रिटिश शासन से आजादी की ओर बढ़ रहा था और आजादी के बाद की उथल-पुथल से गुजर रहा था. महारानी ने महल के जीवन को कैमरे में कैद किया और मिथिला की परंपरागत रानी की भूमिका निभाती रहीं.

...और महाराज की रहस्यमयी मृत्यु

1 अक्टूबर 1962 को महाराजा दुर्गा पूजा के लिए दरभंगा पहुंचे. वे कलकत्ता के मिडलटन स्ट्रीट स्थित दरभंगा हाउस से अपने आलीशान निजी रेलवे सैलून में नरगोना पैलेस के निजी रेलवे टर्मिनल पर उतरे. उस समय उनकी उम्र 54 वर्ष थी. वे स्वस्थ दिखाई दे रहे थे और उनका मनोबल भी अच्छा था.
लेकिन उसी सुबह वे अपने सुइट के बाथरूम में बाथटब में मृत पाए गए.

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इस खबर ने भारत ही नहीं, दुनिया को चौंका दिया. एक स्वस्थ, सक्रिय 54 वर्षीय व्यक्ति की अचानक बाथटब में मृत्यु कैसे हो सकती थी?

इसके बावजूद, उसी दिन माधवेश्वर में उनका अंतिम संस्कार जल्दबाज़ी में कर दिया गया. इस दौरान उनकी दोनों जीवित महारानियां मौजूद थीं. कोई जांच नहीं हुई. कोई आधिकारिक सवाल नहीं उठे. मृत्यु का कारण हृदयाघात बताया गया.

महाराजा ने अपनी मृत्यु से ठीक एक साल पहले, 5 जुलाई 1961 को वसीयत लिखी थी. क्या उन्हें किसी अनहोनी का पूर्वाभास था?

महाराजा की कोई संतान नहीं थी. उनके भाई राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह का पहले ही निधन हो चुका था. उनके तीन पुत्र थे—जीवेश्वर सिंह (वयस्क और विवाहित), यज्ञेश्वर सिंह (नाबालिग) और शुभेश्वर सिंह (नाबालिग). वसीयत में दोनों महारानियों के जीवनकाल की व्यवस्था की गई थी. (वरिष्ठ महारानी का निधन 1976 में हुआ).

जब सरकार ने दिल्ली स्थित दरभंगा हाउस को अपने कब्जे में ले लिया, तो महारानी कामसुंदरी देवी उससे सटे आउटहाउस में रहने लगीं. दरभंगा में वे लगभग 1980 तक नरगोना पैलेस में रहीं, इसके बाद नरगोना परिसर में ही उनके लिए कल्याणी हाउस का निर्माण किया गया.

कुछ दिन पहले 96 वर्ष की आयु में महारानी कामसुंदरी देवी का निधन हो गया. उनके साथ ही वैभव, रहस्य और इतिहास से भरे एक महान साम्राज्य का अंतिम अध्याय भी समाप्त हो गया.
 

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