देश में लीची उत्पादन में बिहार की कुल हिस्सेदारी 65 प्रतिशत से भी ज्यादा है. राज्य की कुल 30,600 हेक्टेयर भूमि पर लीची के बाग लगे हुए हैं. अब तक राज्य के मुजफ्फरपुर जिले को ही लीची उत्पादन का केंद्र माना जाता था. हालांकि, नए सर्वे में पाया गया कि प्रदेश के तकरीबन 37 जिले की भूमि लीची उत्पादन के लिए काफी फायदेमंद है. इन 37 जिलाें में 50,05,441 हेक्टेयर खेत लीची के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं. वहीं, 29,80,047 हेक्टेयर अन्य भूमि भी इसकी खेती के लिए फायदेमंद बताई गई है.
मुजफ्फरपुर में 153418 हेक्टेयर भूमि लीची की खेती के लिए उपुक्त
मुजफ्फरपुर जिले में अब तक सिर्फ 12 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती हाेती है. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर की ओर से कराए गए नए सर्वे में यहां 1,53,418 हेक्टेयर क्षेत्र को लीची की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है. पूर्णिया, पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, मधुबनी, कटिहार, बांका, औरंगाबाद, जमुई, मधेपुरा, सीतामढ़ी और अररिया में मुजफ्फरपुर से भी अधिक भूमि लीची उत्पादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त पाई गई.
अकेले बिहार में चीन से अधिक लीची उत्पादन की क्षमता
चीन में 31 लाख टन लीची की पैदावार होती है, जबकि वहां 8 लाख हेक्टेयर में इसके बाग हैं. भारत में एक लाख हेक्टेयर में लीची के बाग हैं जिससे 7.5 लाख टन लीची का उत्पादन हाेता है. ऐसे में यदि नए सर्वे में चिह्नित क्षेत्र के सिर्फ 7 फीसदी एरिया में लीची बाग लगा दिए जाएं तो कुछ वर्षों में ही भारत लीची उत्पादन में चीन से आगे निकल जाएगा. अकेले बिहार में चीन से अधिक लीची का उत्पादन होने लगेगा.
भारत में जिस तरह बिहार सर्वाधिक लीची उत्पादक राज्य है, उसी तरह चीन में उसके कुल उत्पादन की 40 फीसदी लीची ग्वांनडांग प्रांत में होती है. ग्वांनडांग के 3.2 लाख हेक्टेयर में 12 लाख टन लीची होती है, जबकि बिहार के सिर्फ 34 हजार हेक्टेयर में 3 लाख टन. ऐसे में राज्य के मुजफ्फरपुर जिले में जितनी भूमि लीची के लिए चिह्नित की गई है वह ग्वांनडांग को पीछे छोड़ने के लिए काफी है.
नदियों के किनारे होती है लीची की खेती
मुजफ्फरपुर स्थित राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास ने बताया कि नदियों द्वारा लाई गई जलाेढ़ मिट्टी में लीची की बेहतर पैदावार का इतिहास रहा है. चीन व भारत समेत पूरे विश्व में नदियों के आसपास ही लीची की ज्यादा बागवानी हाेती है. बिहार में गंगा, गंडक, बूढ़ी गंडक के किनारे ताे यूपी में गंगा और शारदा नदियों के किनारे सर्वाधिक लीची बाग हैं. लीची की जड़ाें के विकास व पोषक तत्वों की आपूर्ति में ऐसी उपजाऊ मिट्टी का विशेष महत्व एवं योगदान है. भारत में लीची की शाही, चायना, देहरा राेज, राेज सेंटेड, बम्बई, पूर्वी, कलकतिया, कस्बा, लाैंगिया, देहरादून, बेदाना, गंडकी, लालिमा, गंडकी संपदा, गंडकी याेगिता, कसैलिया किस्में पाई जाती है.
लीची के लिए उपयुक्त भूमि जिलेवार
पूर्णिया - 303281 हेक्टेयर.
पूर्वी चंपारण - 300271 हेक्टेयर.
प. चंपारण - 285287 हेक्टेयर.
मधुबनी - 275541 हेक्टेयर.
कटिहार - 263518 हेक्टेयर.
बांका - 235738 हेक्टेयर.
औरंगाबाद - 198376 हेक्टेयर.
जमुई - 193941 हेक्टेयर.
मधेपुरा - 174264 हेक्टेयर.
सीतामढ़ी - 167797 हेक्टेयर.
अररिया - 164404 हेक्टेयर.
मुजफ्फरपुर - 153418 हेक्टेयर.
नवादा - 145830 हेक्टेयर.
भागलपुर - 131687 हेक्टेयर.
पटना - 124329 हेक्टेयर.
गाेपालगंज - 123747 हेक्टेयर.
नालंदा - 121005 हेक्टेयर.
सहरसा - 118591 हेक्टेयर.
सुपाैल - 110031 हेक्टेयर.
भाेजपुर - 109188 हेक्टेयर.
लीची की खेती से किसानों की आय होगी दोगुनी
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास ने बताया कि किसान सामान्य रूप से धान-गेहूं की खेती करते हैं. इससे प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष 50 से 60 हजार रुपये तक की आय होती है. जबकि, इसके लिए प्रतिवर्ष पूंजी लगानी होती है. मेहनत भी काफी अधिक करनी पड़ती है. बिहार की शाही लीची अपने उत्तम स्वाद व रंग को लेकर देश से लेकर विदेश तक प्रसिद्ध है. लीची एक बार लगा देने के बाद सिर्फ केयर करनी होती है. इससे आय 1 से सवा लाख रुपये प्रति वर्ष हो सकती है. दूसरी तरफ इससे काफी संख्या में लोगों को रोजगार भी मिलता है.
मणिभूषण शर्मा