अंधेरे में डूबा शहर, गलियों में सन्नाटा, दहशत में लोग... US हमलों के बाद कराकस में कैसी है आम लोगों की जिंदगी?

अमेरिकी हवाई हमलों और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वेनेजुएला की राजधानी कराकस भय, अराजकता और अनिश्चितता के साये में है. बिजली गुल है, कम्युनिकेशन सिस्टम ठप है, दुकानें बंद हैं और सड़कों पर सन्नाटा पसरा है. खाने-पीने के लिए लंबी कतारें, मोबाइल चार्ज कराने की जद्दोजहद और घरों में कैद लोग... कराकस के हालात भयावह हैं.

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अमेरिकी हमलों के बाद और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बीच वेनेजुएला में सक्रिय मिलिशिया ग्रुप 'कोलेक्टिवोस' का सदस्य हथियार थामे नजर आ रहा है. (Photo: Reuters) अमेरिकी हमलों के बाद और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बीच वेनेजुएला में सक्रिय मिलिशिया ग्रुप 'कोलेक्टिवोस' का सदस्य हथियार थामे नजर आ रहा है. (Photo: Reuters)

प्रणय उपाध्याय

  • नई दिल्ली,
  • 04 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:40 PM IST

अमेरिकी सैन्य हमलों और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वेनेजुएला की राजधानी कराकस और आसपास के इलाकों में हालात भयावह बने हुए हैं. बमबारी से तबाह हुई बिजली सप्लाई, ठप संचार व्यवस्था और रोटी-पानी के संकट ने आम लोगों की जिंदगी को अंधेरे में धकेल दिया है. शहर में सन्नाटा है, सड़कों पर डर पसरा है और हर चेहरे पर एक ही सवाल- अब आगे क्या?

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कराकस में रहने वाले इंडियन कम्युनिटी के सदस्य सुनील मल्होत्रा ने मौजूदा हालात का आंखों देखा हाल साझा किया. उन्होंने बताया कि अमेरिकी हवाई हमलों ने राजधानी की रीढ़ तोड़ दी है. सबसे ज्यादा नुकसान फुएर्ते तियूना में हुआ है. यही वह इलाका है, जहां से कराकस और आसपास के इलाकों को बिजली सप्लाई होती है. यहां भारी बमबारी हुई है, इसलिए बिजली बहाल होने की समयसीमा कोई नहीं बता पा रहा. फुएर्ते तियूना वेनेजुएला का सबसे बड़ा सैन्य ठिकाना माना जाता है. यहीं से कई अहम प्रशासनिक और सैन्य फैसले होते रहे हैं.

हमलों के बाद कराकस का हवाई अड्डा और राजधानी से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित एक बड़ा एयरबेस भी निशाना बना. नतीजा यह हुआ कि देश की आवाजाही लगभग पूरी तरह ठप हो गई. पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद है, टैक्सी और बसें सड़कों से गायब हैं. जो लोग बाहर निकल भी रहे हैं, वे पैदल ही लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं. डर इस कदर है कि शाम ढलते ही लोग घरों में कैद हो जाते हैं.

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कराकस में रहने वाले सुनील मल्होत्रा ने अमेरिकी हमलों के बाद वहां की स्थिति और घटनाक्रम के बारे में बताया.

बिजली गुल होने से हालात और भी बदतर हो गए हैं. कराकस के बड़े हिस्से अंधेरे में डूबे हुए हैं. मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवा बुरी तरह प्रभावित है. लोगों के लिए अपनों से कॉन्टैक्ट करना मुश्किल हो गया है. सुनील मल्होत्रा बताते हैं कि उन्हें अपना फोन चार्ज कराने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा. 

सुनील कहते हैं कि जहां मैं रहता हूं, वहां से काफी दूर एक स्ट्रीटलाइट में बिजली आ रही है. कुछ हॉट डॉग बेचने वालों ने वहां अवैध तरीके से कनेक्शन लगा रखा है. लोग उसी से अपने फोन चार्ज कर रहे हैं. मैं शाम चार बजे वहां गया था और रात 11 बजे लौट पाया.

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फोन चार्ज करने के लिए लगी भीड़ भी हालात की गंभीरता बयां करती है. सैकड़ों लोग एक ही जगह खड़े रहते हैं, अपनी बारी का इंतजार करते हुए. पुलिस कई बार वहां पहुंचकर लोगों को हटने को कहती है, यह कहते हुए कि अपनी सुरक्षा का ध्यान रखें. लेकिन लोगों के पास कोई और ऑप्शन भी नहीं है. बिना फोन के वे न तो हालात की खबर ले सकते हैं और न ही किसी से कॉन्टैक्ट कर सकते हैं.

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खाने-पीने की स्थिति भी तेजी से बिगड़ रही है. बड़े सुपरमार्केट लगभग सभी बंद हैं. केवल छोटे-छोटे मोहल्ले की दुकानें, जिन्हें भारत में किराना स्टोर कहा जाता है, किसी तरह खुली हैं. लेकिन वहां भी हालात ठीक नहीं हैं. हर ब्लॉक में 500 से 600 लोग लाइन में खड़े हैं. दुकानदार एक बार में सिर्फ एक या दो लोगों को अंदर जाने दे रहे हैं. सबसे लंबी लाइनें ब्रेड की दुकानों के बाहर देखी जा रही हैं. लोग डर के मारे जितना हो सके, उतना राशन जमा करना चाहते हैं.

खास बात यह है कि फार्मेसियों के बाहर भी भारी भीड़ है. वेनेजुएला में दवाइयों की दुकानों में डिब्बाबंद खाने का सामान भी बिकता है, जैसे टूना, सार्डीन और हैम. ऐसे में लोग दवा के साथ-साथ खाने का सामान जुटाने के लिए फार्मेसियों का रुख कर रहे हैं. अभी पूरी तरह से खाद्य संकट नहीं है, लेकिन जिस तरह लोग टूट पड़े हैं, उससे आने वाले दिनों को लेकर चिंता गहराती जा रही है.

सरकारी स्तर पर स्थिति और भी धुंधली है. न तो स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई ठोस बयान आ रहा है और न ही यह साफ किया जा रहा है कि हालात कब सामान्य होंगे.

सुनील मल्होत्रा कहते हैं कि यहां तक कि अधिकारी भी नहीं जानते कि बिजली कब तक बहाल होगी. नुकसान इतना ज्यादा है कि किसी के पास कोई क्लियर जवाब नहीं है.

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डर का माहौल ऐसा है कि विरोध-प्रदर्शन की संभावना भी लगभग खत्म हो गई है. मल्होत्रा बताते हैं कि लोग घरों से बाहर निकलने से घबरा रहे हैं. साल 2014 से 2017 के बीच यहां लगातार विरोध प्रदर्शन हुए थे. उस दौरान कई लोग मारे गए, यहां तक कि 13-14 साल के बच्चों को जेल में डाल दिया गया और वे कभी वापस नहीं आए. कोई भी माता-पिता अब अपने बच्चों को सड़कों पर नहीं भेजना चाहता. ऊपर से देश पहले ही भारी पलायन झेल चुका है. करीब 70-80 लाख लोग वेनेजुएला छोड़कर जा चुके हैं. ऐसे में विरोध करने वालों की संख्या भी बेहद कम रह गई है.

वेनेजुएला पर अमेरिकी हमलों के बाद इलाके में बिजली गुल होने पर लोग अपने मोबाइल फोन बाहर इस तरीके से चार्ज करते नजर आए. (Photo: Reuters)

इंडियन कम्युनिटी की बात करें तो कराकस में उनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है. फिर भी मौजूदा हालात को देखते हुए भारतीय दूतावास सतर्क हो गया है. दूतावास ने यहां रह रहे भारतीयों के लिए एक वॉट्सएप ग्रुप बनाया है, जिसके जरिए जरूरी निर्देश और अपडेट शेयर किए जा रहे हैं. हालांकि, कमजोर नेटवर्क के कारण कई लोगों तक मैसेज समय पर नहीं पहुंच पा रहे.

इन सबके बीच सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब यह खबर आई कि अमेरिकी सैनिकों ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को राष्ट्रपति भवन से गिरफ्तार कर लिया और वे न्यूयॉर्क ले गए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर की गई इस कार्रवाई ने वेनेजुएला को राजनीतिक रूप से पूरी तरह शून्य में ला खड़ा किया है. एक झटके में देश का शीर्ष नेतृत्व गायब हो गया और प्रशासनिक ढांचा लड़खड़ा गया.

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अमेरिका का कहना है कि मादुरो पर नार्को-टेररिज्म जैसे गंभीर आरोप हैं और उन पर अमेरिका में केस चलेगा. दूसरी ओर, वेनेजुएला ने इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन बताया है. सरकार समर्थकों का आरोप है कि अमेरिका देश के विशाल तेल भंडार और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है.

आम लोगों के लिए फिलहाल ये बड़े राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बेमानी हो चुके हैं. उनकी प्राथमिकता सिर्फ इतनी है कि बिजली आए, खाना मिले और जान-माल सुरक्षित रहे. कराकस की गलियों में पसरा सन्नाटा, बंद दुकानों के शटर और लंबी-लंबी कतारें इस बात की गवाही दे रही हैं कि देश इस वक्त गहरे संकट में है.

सुनील मल्होत्रा की आवाज में डर साफ झलकता है, लेकिन साथ ही एक उम्मीद भी कि हालात ज्यादा दिन ऐसे नहीं रहेंगे. फिलहाल तो हर कोई बस घर में बैठा है, डरा हुआ. कोई नहीं जानता कि अगला दिन क्या लेकर आएगा. वेनेजुएला के लिए यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि आम जनता के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है. एक ऐसा अंधेरा, जिसमें रोशनी की कोई तय तारीख नजर नहीं आ रही.

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