लाल शर्ट और छोटी नीली पैंट... उस बच्चे ने यही कपड़े पहन रखे थे. सागर की आती-जाती लहरों के किनारे तट पर बिखरी रेत में वह औंधा सा लेटा हुआ दिख रहा था. उसका मुंह जमीन की तरफ और पीठ आसमान की ओर थी. वह शांत लग रहा था. नितांत शांत, बिल्कुल हर तरह की हलचल से परे, किसी भी तरह के संघर्ष से दूर.
2015 के सितंबर की उस सुबह, तुर्की के समुद्र तट से जब 'शांति में सोए' बच्चे की तस्वीर दुनिया भर में पहुंची तो सारी दुनिया शोर से भर उठी. चारों तरफ चीखें ही चीखें थीं. चीखें, जो मानवता को झकझोर रही थीं और इंसानियत की दुर्दशा का खुला इश्तेहार थीं. ये चीखें मर्सिया थीं उस बच्चे के नाम जो बेहतर जिंदगी की तलाश में परिवार के साथ सीरिया से तुर्की जा रहा था, लेकिन आखिर में उसे मौत ही नसीब हुईं.
तीन साल के अयलान कुर्दी का ये शव मानवता के कंधे पर पड़ा सबसे नाजुक बोझ था, जो असल में बेहद भारी था. इतना कि, कई तानाशाहों के साम्राज्य इसी के नीचे दबकर नेस्तनाबूद हो जाएं... और आज की तारीख देखिए, यह बात सच साबित हो गई. बशर अल-असद की सत्ता से बेदखली में कहीं न कहीं अयलान की धौंकती आखिरी सांस का भी हाथ रहा ही होगा.
अयलान सिर्फ तीन साल का एक सीरियाई बच्चा जो अपनी जिंदगी की उम्मीदों और सपनों के साथ समुद्र की लहरों में कहीं खो गया. लेकिन उसकी मौत ने ऐसी कहानी रची जो आज भी इंसानियत के लिए चेतावनी है. कुर्दी का परिवार सीरिया के कोबानी शहर का रहने वाला था. लंबे समय से छिड़े गृह युद्ध ने स्थितियां ऐसी बना दीं कि, लाखों लोग विस्थापन और त्रासदी के गर्त में धकेल दिए गए अयलान के माता-पिता, अब्दुल्ला और रेहान, अपने बच्चों के साथ एक बेहतर जिंदगी की तलाश में थे. उनका शहर धीरे-धीरे मलबे में तब्दील हो रहा था, ऐसे में उन्हें बेहतरी का एक ही रास्ता नजर आया, पलायन... सीरिया छोड़कर कहीं और जाने का रास्ता.
आखिरकार, उन्होंने तुर्की जाने का फैसला किया, जहां से वे यूरोप पहुंचने की कोशिश करना चाहते थे. लेकिन यह सफर आसान नहीं था. उनके पासपोर्ट नहीं थे, उनके पास पैसे नहीं थे. उन्हें मिल सकी तो सिर्फ और सिर्फ मानव तस्करी करने वाले गिरोहों से मदद, जो ऐसे लोगों को खतरनाक नावों में भरकर समुद्र पार कराने का दावा करते थे. 2015 के सितंबर महीने की एक अंधेरी रात, अब्दुल्ला और उनका परिवार 12 अन्य प्रवासियों के साथ एक छोटी रबर की नाव पर सवार हुआ. उनके साथ अयलान और उसका बड़ा भाई, गालिब, भी थे. तुर्की के बॉडरम से निकलकर उनका लक्ष्य ग्रीस का कोस द्वीप था, जहां उन्हें पहुंचना था.
लेकिन, उनकी नाव समुद्र की तेज लहरों का सामना नहीं कर पाई और पलट गई, अब्दुल्ला ने अपनी पूरी ताकत से अपने बच्चों को बचाने की कोशिश की, लेकिन समुद्र की बेहद क्रूर लहरों ने पूरे परिवार को जुदा कर दिया. अयलान, गालिब और उनकी मां रेहान डूब गए. अगली सुबह, तुर्की के सागर तट पर एक छोटे से बच्चे के शव को देखा गया. वह लाल रंग की टी-शर्ट और नीले रंग की छोटी पैंट पहने हुए था. उसका चेहरा नीचे की ओर था, जैसे वह सो रहा हो.
इस तस्वीर ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया. अखबारों और सोशल मीडिया पर यह फोटो वायरल हो गई. यह तस्वीर सिर्फ अयलान की नहीं थी, बल्कि उन लाखों प्रवासियों की पीड़ा का जीता-जागता चेहरा थी, जो युद्ध और गरीबी से बचने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगाते हुए पलायन को अपना रहे थे. अब्दुल्ला कुर्दी, जो अपनी पत्नी और दोनों बेटों को खो चुके थे, उन्होंने कहा, "मैंने अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य चाहा था. लेकिन अब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा.' अयलान कुर्दी की कहानी हमें झकझोरती है, हमारी सभ्यता पर सवाल करती है. वह पूछती है कि क्या इतने सालों में तुम एक ऐसा समाज बना सके, जहां मेरे जैसे मासूम आजादी के साथ खेल सकें और सुरक्षित रह सकें.
आज सीरिया में दमिश्क की सड़कों पर जश्न का माहौल है. प्रेसिडेंट रहे असद, देश छोड़कर भाग गए हैं, यानी कि उन्हें भी पलायन का ही सहारा लेना पड़ा है. सीरिया के इतिहास में रविवार का दिन ऐतिहासिक साबित हुआ. 13 साल का संघर्ष रंग लाया, बशर अल-असद की तानाशाह सत्ता का खात्मा हुआ, बीते पांच दशकों से एक ही परिवार के केंद्र में रही सत्ता की परिपाटी बदल गई. यह दिन न केवल 13 वर्षों से चले आ रहे विनाशकारी युद्ध का अंत है, बल्कि बशर अल-असद के 24 वर्षों के सत्तावादी शासन का भी अंत माना जा रहा है. अब सत्ता पर विद्रोही ताकतों का कब्जा है और राजधानी दमिश्क की सड़कों पर हजारों लोग जश्न मनाने के लिए जुटे हैं. जो अब मान रहे हैं कि वे आजाद हैं.
विकास पोरवाल