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अफगानिस्तान: अबोध बचपन के तालिबान लड़ाका बनने की कहानी

वरुण शैलेश
  • नई दिल्ली,
  • 20 अगस्त 2021,
  • अपडेटेड 11:22 AM IST
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अफगानिस्तान में कुंदुज प्रांत के चहरदरा जिले का 15 साल का कासिम एक स्थानीय मदरसे में तालीम ले रहा था. लेकिन साल 2015 में उसे तालिबान सेना में भर्ती कर लिया गया. कासिम के माता-पिता ने कई दफा तालिबान से संपर्क किया कि उनके बेटे को लौटा दिया जाए ताकि वो अपनी तालीम पूरी कर सके. माता-पिता ने गुहार लगाई कि उनका बेटा पढ़ाई पूरी करने के बाद जब सेना में जाने की उम्र का हो जाएगा तो वे उसे भेज देंगे. लेकिन तालिबान ने उनके बेटे को लौटाने से मना कर दिया.

अहमद चाहरदरा जिले के एक व्यापारी का बेटा है. जब वह 14 साल का था, तालिबान ने उसे लड़ाके के तौर पर भर्ती कर लिया. परिजन बताते हैं कि अपने बेटे के भर्ती होने के लगभग एक हफ्ते बाद, अहमद की मां ने तालिबान कमांडर से अपने बेटे को लौटने की अपील की, लेकिन उसने मना कर दिया. कासिम और अहमद की कहानी फरहाद, अतार, मंसूर, नजीब जैसे उन सैकड़ों मासूमों की तरह है जिन्हें तालिबान लड़ाकों के गुट में जबरन भर्ती कर लिया गया.  बचपन के माथे पर बंदूकों से न मिटने वाली जिहाद की जिद लिख दी गई.     

(फोटो-Getty Images)

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असल में, तालिबान कम उम्र में ही बच्चों को जंग की तालीम देना शुरू कर देते हैं, क्योंकि बचपन में उन्हें किसी खांचे में ढालना आसान होता है. उन्हें आसानी से लड़ने के लिए राजी किया जा सकता है. कुंदुज़ में बाल सैनिकों के रिश्तेदारों ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि तालिबान बच्चों को निशाना बनाते हैं क्योंकि उन्हें मजहबी जिहाद के बारे में समझाना आसान है. बच्चे एक ऐसी उम्र में होते हैं जहां वे परिवार की जिम्मेदार महसूस नहीं करते, और इसलिए आसानी से खतरनाक कामों के लिए उन्हें राजी किया जा सकता है. 

(फोटो-AP)

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बच्चे भविष्य होते हैं. उनकी परवरिश से तय होता है कि वो देश को कैसे रचते हैं, उसे कैसे सुंदर बनाते हैं. कला, साइंस, मेडिकल, इंजीनियरिंग में जाने का रुझान प्राथमिक शिक्षा से बनता है, लेकिन अगर कोरे कागज जैसे इन्हीं बच्चों के हाथ में बंदूक थमा दी जाए तो यह कल्पना करना मुश्किल नहीं कि वो क्या बनेंगे?

अफगानिस्तान पर कब्जा करने की कहानी के पीछे तालिबान के सैन्य लड़ाकों की बड़ी भूमिका है. तालिबान ने इन लड़ाकों को जरूरी शिक्षा के बजाय जंग के मैदान में लड़ने की तालीम देकर तैयार किया है.            

इसकी तस्दीक ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) की रिपोर्ट भी करती है. इस मानवाधिकार संगठन का दावा है कि अफगानिस्तान में तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए बच्चों को अपनी सेना में शामिल किया है. आतंकी गुट बड़ी संख्या में बच्चों को अपनी सेना में शामिल कर चुका है

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अफगानिस्तान में जिन बच्चों के हाथों में स्कूल की किताबें होनी चाहिए, उन हाथों को विस्फोटक बनाने की तालीम दी जा रही है. मासूम दिमाग और शरीर को सेना से टक्कर लेने की ट्रेनिंग दी जा रही है. जिस अबोध बाल मन में जब दुनिया जहां, पेड़ पौधों, प्रकृति को समझने की ललक होती है, उस दौरान उसे जेहाद की ट्रेनिंग दी जा रही है. 

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिसर्च बताती है कि तालिबान बच्चों को इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) यानी विस्फोटक तैयार करने और उसे लगाने सहित तमाम सैन्य अभियानों के लिए ट्रेनिंग देकर तैनात करता रहा है. अफगानिस्तान के कुंदुज़ प्रांत में तालिबान ने 13 से 17 वर्ष की आयु के बच्चों को सैन्य प्रशिक्षण देने के लिए मदरसों या इस्लामी धार्मिक स्कूलों का इस्तेमाल किया है. इनमें से कई को जंग के मैदान में तैनात किया गया है.

(फोटो-Getty Images)

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अफगानिस्तान के सीनियर रिसर्चर पेट्रीसिया गॉसमैन कहते हैं, "बच्चों को युद्ध में भेजने की तालिबान की रणनीति उतनी ही निंदक और क्रूर है जितनी कि यह गैरकानूनी है. अफगान बच्चों को अपने माता-पिता के साथ स्कूल और घर पर होना चाहिए, तालिबान की लड़ाई के लिए बच्चों का शोषण नहीं किया जाना चाहिए."

(फोटो-Getty Images)

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ह्यूमन राइट्स वॉच ने पिछले एक साल में तालिबान लड़ाकों के तौर पर भर्ती किए गए 13 बच्चों के रिश्तेदारों का इंटरव्यू किया. मानवाधिकार संगठन ने सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक विश्लेषकों और संयुक्त राष्ट्र के साथ साक्षात्कार के माध्यम से इन दावों की पुष्टि की. कुंदुज़, तखर और बदख्शां प्रांतों के मदरसों से भर्ती किए गए कुछ बच्चे 13 वर्ष या उससे भी कम उम्र के हैं, जबकि तालिबान दावा करता है कि वह केवल "मानसिक और शारीरिक परिपक्वता" हासिल करने वाले लड़ाकों को भर्ती करते हैं और सैन्य अभियानों में "बिना दाढ़ी वाले लड़कों" का इस्तेमाल नहीं करते हैं. 

(सांकेतिक फोटो-रॉयटर्स)

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तालिबान पहले से ही जेहादी अभियानों में बच्चों और किशोरों को शामिल करने से इनकार करता रहा है. लेकिन 18 साल से कम उम्र के लड़ाकों की तैनाती अफगानिस्तान में लागू अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती है और 15 साल से कम उम्र के बच्चों से जुड़े मामलों में युद्ध अपराध है.

(फोटो-Getty Images)

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कुंदुज के निवासियों और विश्लेषकों का कहना है कि बाल लड़ाकों की भर्ती और तैनाती में वृद्धि अप्रैल 2015 में शुरू हुए उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान के बड़े हमले के साथ हुई. ह्यूमन राइट्स वॉच के इंटरव्यू से संकेत मिलता है कि अन्य उत्तरी प्रांतों, कम से कम 2012 के बाद से तालिबान द्वारा संचालित मदरसे कुंदुज में काम कर रहे हैं. 2013-2014 में कुंदुज के चाहरदरा और दश्त-ए-आर्ची जिलों में जमीन हासिल करने के बाद तालिबान इन प्रांत में शिक्षा पर अधिक प्रभाव कायम करने में कामयाब रहा. 

( सांकेतिक फोटो-Getty Images)

 

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असल में, तालिबान 1990 के दशक से बच्चों को लड़ाकों के रूप में भर्ती और उनका इस्तेमाल करता आ रहा है. लेकिन कुंदुज़ निवासी जिनके बेटे भर्ती किए गए हैं, उनका और विश्लेषकों का मानना ​​है कि 2015 में अफगान सरकारी बलों के खिलाफ तालिबान अभियानों में तेजी के कारण भर्ती में वृद्धि हुई. तालिबान के कुंदुज में नियंत्रण के विस्तारित क्षेत्र में मदरसों में प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना से भी बाल सैनिकों की भर्ती में वृद्धि हुई. कुंदुज के निवासियों ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि तालिबान ने 2015 में अकेले चाहरदरा जिले से 100 से अधिक बच्चों की भर्ती की और उन्हें तैनात किया.

(फोटो-AP)
 

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तालिबान कमांडरों ने मदरसों का इस्तेमाल न केवल शिक्षा के लिए बल्कि बच्चों के मिलिट्री ट्रेनिंग देने के लिए भी किया. इससे पहले, तालिबान कमांडरों ने सैन्य प्रशिक्षण के लिए चुने गए लड़कों को पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान भेजा था, जहां पाकिस्तान के सैन्य अभियानों के बावजूद, तालिबान बेफिक्र होकर काम करता है. इस तरह की ट्रेनिंग अब भी जारी है. तालिबान ने कुंदुज़ में कम से कम तीन जिलों पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया है. स्थानीय नागरिकों और विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान स्थानीय स्तर पर कड़ी सैन्य ट्रेनिंग देता है. 

(फोटो-AP)

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तालिबान खास उम्र के बच्चों को भर्ती करते और उन्हें ट्रेनिंग देते हैं. लड़कों को छह साल की उम्र से ही शिक्षा देना शुरू कर दिया जाता है, और ये बच्चे सात साल तक तालिबान शिक्षकों के अधीन धार्मिक विषयों का अध्ययन जारी रखते हैं. तालिबान द्वारा भर्ती किए गए लड़कों के रिश्तेदारों के अनुसार, जब वे 13 वर्ष के होते हैं, तब तक तालिबान प्रशिक्षित बच्चे सैन्य कौशल सीख चुके होते हैं, जिसमें हथियारों का इस्तेमाल, विस्फोटक बनाना, लगाना शामिल है. इसके बाद तालिबान शिक्षक इन प्रशिक्षित बाल सैनिकों को विशिष्ट तालिबान गुटों से मिलवाते हैं.

(फोटो-AP)

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अफगानिस्तान के सीनियर रिसर्चर पेट्रीसिया गॉसमैन ने कहा, "तालिबान लड़ाकों की भर्ती बच्चों और उनके परिवारों दोनों के लिए अफगानिस्तान के लंबे संघर्ष की भयावहता को बढ़ाता है. तालिबान को तुरंत बच्चों की भर्ती बंद कर देनी चाहिए और सभी बच्चों को उनके घर छोड़ देना चाहिए, यहां तक कि उन बच्चों को भी बख्श दिया जाना चाहिए जो स्वेच्छा से शामिल हो रहे हैं."

(फोटो-AP)

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क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून? अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून, या युद्ध के कानून, जंग के लिए 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की भर्ती या उपयोग पर रोक लगाते हैं. "पंद्रह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सशस्त्र बलों या समूहों में भर्ती करना अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के रोम संविधि के तहत एक युद्ध अपराध है. यह अफगानिस्तान पर भी लागू होता है. जो लोग युद्ध अपराधों के लिए प्रतिबद्ध हैं, इस किस्म का आदेश देते हैं, सहायता करते हैं, या कमान की जिम्मेदारी संभालते हैं उन पर आईसीसी या राष्ट्रीय अदालतों में मुकदमा चलाया जा सकता है.

(फोटो-AP)

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सशस्त्र संघर्ष में बच्चों की भागीदारी पर बाल अधिकारों पर कन्वेंशन के लिए वैकल्पिक प्रोटोकॉल है, जिसे अफगानिस्तान ने 2003 में स्वीकार किया था. इसमें कहा गया है कि गैर-राज्य सशस्त्र समूह किसी भी परिस्थिति में लोगों की भर्ती नहीं कर सकते हैं. 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का इस्तेमाल नहीं कर सकते. यह वैकल्पिक प्रोटोकॉल सरकारों पर भी लागू होता. सैन्य बलों का भी दायित्व है कि वे बच्चों को विशेष सम्मान और ध्यान दें. 

(फोटो-AP)

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नहीं मिलता है वेतनः तालिबान भले ही तेजी से मजबूत हुआ है लेकिन वह अपने लड़ाकों को सैलरी नहीं दे पा रहा है. लड़ाकों को भर्ती करने वाले कमांडरों का कहना है कि तालिबान नियमित रूप से वेतन नहीं दे पा रहा है. इसके चलते तालिबान कमांडर स्थानीय संसाधनों और लूटी हुई चीजों के सहारे अपना खर्चा चला रहे हैं. न्यू यॉर्क टाइम्स ने हेलमंद प्रांत के यूनिट कमांडर मुल्ला बाक़ी ज़रावर के हवाले से बताया, 'जिहाद में जो दोस्त हमारे साथ हैं, उन्हें सही से वेतन तक नहीं मिलता है. लेकिन हम उनकी पॉकेट मनी, उनकी मोटरसाइकिल, उनके यात्रा खर्च का ध्यान रखते हैं, और अगर उन्होंने कुछ लूटा है तो यह उनकी कमाई है.' उन क्षेत्रों में जहां उनका पूरा तरह से नियंत्रण वे वहां अपना खर्चा चलाने के लिए दूसरी नौकरियां भी करते हैं.  

(फोटो-Getty Images)

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