लखनऊ: 'स्पेशल बच्चों' की खास मसाला फैक्ट्री, मेहनत से यूं बदल रही किस्मत!

लखनऊ के 'दृष्टि सामाजिक संस्थान' की ओर से एक फैक्ट्री की शुरुआत की गई है, जो शारीरिक और मानसिक रूप से चुनौतियों से जूझ रहे स्पेशल बच्चों को रोजगार दे रही है.

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Drishti Samajik Sansthan Lucnow Drishti Samajik Sansthan Lucnow

शिल्पी सेन

  • लखनऊ,
  • 04 जून 2023,
  • अपडेटेड 5:42 PM IST

लखनऊ के गोहना कला गांव में स्थित एक फैक्ट्री डिसेबल बच्चों के लिए हौसले और कामयाबी की मिसाल है. दरअसल, यहां वो बच्चे हैं जो अलग-अलग शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, लेकिन फिर भी उन्हें मसाला पीसने से लेकर सरसों का तेल निकालने तक अत्याधुनिक मशीनों के जरिए काम करते देखे जा सकते हैं, वो भी बिना किसी दिक्कत के.

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16 साल के मकबूल जब 6 साल के थे तो उनके माता-पिता ने उन्हें लखनऊ के 'दृष्टि सामाजिक संस्थान' के शरणालय में छोड़ दिया था. शायद उनको लगा होगा कि सेरब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) की वजह से मकबूल परिवार पर बोझ बन सकता है. लेकिन आज, 16 साल का मकबूल न सिर्फ़ इस मसाला फैक्ट्री में काम करके आत्मनिर्भरता बना है बल्कि अपने जैसे दूसरे बच्चों की मदद भी कर रहा है. कुछ ऐसी ही कहानी है अरमान की. जो सरसों का तेल बनाने के लिए कोल्ड प्रेस्ड ऑयल (cold pressed oil) मशीन पर तेजी से अपना हाथ चलाता है.

मकबूल और अरमान की तरह ही करीब 30 किशोर हैं, जो इस फैक्ट्री में काम करते हैं. दरअसल, ये फैक्ट्री शारीरिक और मानसिक रूप से चुनौतियों से जूझ रहे स्पेशल बच्चों के लिए ही शुरू की गई है. दृष्टि सामाजिक संस्थान की जॉइंट डायरेक्टर शालू ने बताया कि 'यह संस्थान इन बच्चों का परिवार है, उन्हें रोजगार देने के लिए फैक्ट्री की शुरुआत की गई है.

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उन्होंने यह भी बताया कि इसके लिए 14 साल से ज़्यादा के उन बच्चों को लिया गया है, जो माइल्ड कैटेगरी के हैं. इसमें भी लड़कों एवं लड़कियों का अलग ग्रुप बनाया गया है. इस फैक्ट्री के लिए दृष्टि सामाजिक संस्थान ने लोन लेने के साथ ही इनकी देखभाल के लिए एक इन्स्ट्रक्टर रहते हैं. दृष्टि संस्थान चलाने वाले अथर्व बहादुर का कहन है कि उनकी शारीरिक और मानसिक चुनौतियों पर विजय प्राप्त करके काम करना सिखाया जाता है. 

फिलहाल, यहां 14 साल से अधिक आयु वाले लोग हल्दी, धनिया पीसने से लेकर, मसालों को मिक्स करने और सरसों का तेल निकालने एवं बोतल में भरने तथा मसालों की पैकिंग का काम करते हैं. अथर्व ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उनके लिए मुनाफ़ा मायने नहीं रखता बल्कि दिव्यांग किशोरों को आत्मनिर्भर बनाने की एक कोशिश है.

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इससे आस-पास के किसानों की मदद भी हो रही है. फैक्ट्री के लिए सरसों और हल्दी आस-पास के किसानों से ख़रीदी जाती है. गोहना कला गांव के किसान और ग्राम प्रधान सूबेदार यादव ने बताया कि किसानों को अपनी फसल मंडी तक नहीं लेकर जानी पड़ती. साथ ही आस-पास के लोग शुद्धता से तैयार इन मसालों और तेल को ख़रीदते हैं. इसके अलावा दृष्टि सामाजिक संस्थान में रहने वाले करीब 250 बच्चों के लिए भी खाना बनाने में भी इसकी खपत होती है. बता दें कि 'दृष्टि सामाजिक संस्थान' 1990 से मानसिक मंदित और दिव्यांग बच्चों के शरणालय के तौर पर काम कर रहा है. 
 

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