समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी बताने वाली आईपीसी की धारा 377 पर आज एक बार फिर बड़ी सुनवाई शुरू होनी है. इससे पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की चार हफ्ते के लिए सुनवाई टालने के आग्रह को ठुकरा दिया है.
QUEER यानी अजीब या विचित्र, लेकिन क्या अजीब या विचित्र होने की वजह से उसे अपराध मान लिया जाए. धारा 377 के खिलाफ पूरी बहस इसी पर टिकी है.
किसी जानवर के साथ यौन संबंध बनाने पर इस कानून के तहत उम्रकैद या 10 साल की सजा एवं जुर्माने का प्रावधान है.
आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस धारा 377 पर कई सालों से देशभर में बहस छिड़ी है, उसके तहत अप्राकृतिक संबंध बनाने के मामले में पिछले लगभग 150 सालों में सिर्फ 200 लोगों को ही दोषी करार दिया गया है.
2001 में सेक्स वर्करों के लिए काम करने वाली संस्था नाज फाउंडेशन ने हाईकोर्ट में यह कहते हुए इसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया था कि अगर दो एडल्ट आपसी सहमति से एकांत में सेक्सुअल संबंध बनाते है तो उसे धारा 377 के प्रावधान से बाहर किया जाना चाहिए.
2 जुलाई 2009 को नाज फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि दो व्यस्क आपसी सहमति से एकातं में समलैंगिक संबंध बनाते है तो वह आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा कोर्ट ने सभी नागरिकों के समानता के अधिकारों की बात की थी.
हालांकि एलजीबीटी समुदाय की यह खुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी और सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को होमो सेक्सुअल्टी के मामले में दिए गए अपने जजमेंट में समलैंगिगता मामले में उम्रकैद की सजा के प्रावधान के कानून को बहाल रखने का फैसला किया था. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें दो बालिगो के आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर माना गया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा जबतक धारा 377 रहेगी तब तक समलैंगिक संबंध को वैध नहीं ठहराया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट इस समुदाय को ‘मिनिस्क्यूल माइनोरिटी’ मानता है. जबकि इस समाज के हक की लड़ाई लड़ रहे लोगों का कहना है कि समलैंगिगता को अपराध की श्रेणी में रखे जाने की वजह से कई लोग खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं. उनके दावे के मुताबिक 5 से 10 प्रतिशत आबादी एलजीबीटी के दायरे में आती है. वहीं अगस्त, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर फ़ैसला सुनाते हुए
कहा था कि सेक्शुअल ओरिएंटेशन किसी व्यक्ति का निजी मामला है और सरकार
इसमें दखल नहीं दे सकती. ऐसे में एलजीबीटी समुदाय के लिए एक बार फिर उम्मीद जगी है.
इस केस से जुड़े पेटिशनर्स ने कोर्ट के सामने फैक्ट रखा कि होमोसेक्सुएलिटी कोई मेंटल डिसऑडर्र नहीं है बल्कि यह सामान्य और नैचुरल ह्यूमेन सेक्सुअल बिहेवियर है. पेटिशनर्स के अनुसार इंटरनैशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजिजेस (आईसीडी-10), विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिकन साइकाइट्रिक असोसिएशन ने होमोसेक्सुएलिटी को मेंटल डिसऑडर्र और बीमारी की श्रेणी से बाहर कर दिया है. इनके एक्सपर्ट के अनुसार होमोसेक्सुएलिटी को क्राइम के दायरे में लाने से एलजीबीटी लोगों के मेंटल हेल्थ पर असर पड़ता है.
आपको बता दें कि कई धार्मिक संस्थाएं धारा 377 के पक्ष में खड़ी हैं. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, उत्कल क्रिश्चियन काउंसिल, एपॉस्टोलिक चर्चेज अलायंस, तमिलनाड़ु मुस्लिम मुन्न कझगम के अलावा कई धर्मगुरुओं ने दिल्ली हाईकोर्ट 2009 के फैसले का विरोध किया था. एपॉस्टोलिक चर्चेज अलायंस के अनुसार बाइबल में समलैंगिकता को घृणास्पद माना गया है और इसे अपराध की श्रेणी से हटाने का अर्थ होगा इसे वैधता प्रदान करना.
वहीं एलजीबीटी समुदाय का मानना है कि धारा 377 के खिलाफ आंदोलन सिर्फ सेक्स से जुड़ा नहीं है, यह एक व्यक्ति की आजादी, भावना, समानता और सम्मान का विषय है. (ALL PHOTOS: GETTY)