आज केदारनाथ त्रासदी की छठवीं बरसी है. केदारनाथ में 6 साल पहले आई तबाही में 5 हजार से भी ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. सरकार केदारनाथ धाम के पुराने स्वरूप को काफी हद तक लौटाने में कामयाब रही है. लेकिन उस भयानक तबाही के निशान केदारनाथ घाटी में आज भी देखने को मिलते हैं. फोटो में दिख रही जगह उस रामबाड़ा है कि जिसके बारे में कहा जाता है कि जल प्रलय की रात वहां 5 हजार से ज्यादा लोग थे लेकिन वहां सन्नाटा फैल गया गया था. (All Photo: Facebook)
6 साल पहले 16 जून को केदारनाथ में आए जल प्रलय ने उत्तराखंड को हिलाकर रख दिया था. इस जल प्रलय में 5 हजार से ज्यादा लोगों की जानें गई और कई लोग लापता हो गए थे. आधिकारिक रूप से 4 हजार 435 मृतक लोगों के परिजनों को मुआवजा दिया गया, इसलिए इतने ही लोगों को अब आधिकारिक रूप से मरा हुआ माना गया है. लेकिन हकीकत में मरने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थी.
आपदा के अगले साल तो वहां कोई जा ही नहीं पाया. दूसरे साल सांकेतिक रूप से यात्रा शुरू की गई. 2016 में केदारनाथ यात्रा पूरी तरह से शुरू हुई थी. आपदा के तीन साल बाद 2016 में केदारनाथ में कई ऐसे घर थे जो पूरी तरह से क्षतिग्रस्त पड़े थे. केदारनाथ के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खुले हैं और त्रासदी की बरसी के दिन भी हजारों लोग दर्शन के लिए पहुंचे थे.
गौरीकुंड से केदारनाथ मंदिर तक 16 किलोमीटर की चढ़ाई में आधी दूरी पर रामबाड़ा जगह आती है जहां हादसे की रात 5 हजार लोगों के रुकने की बात कही जा रही थी. आज वह जगह पूरी तरह श्मशान है. वहां एक बैनर लगा हुआ है जिस पर लिखा है, "मंदाकिनी के सैलाब में अंतर्ध्यान रामबाड़ा- इस यात्रा पथ पर रह-रह कर आएगी तुम्हारी याद हमें उदास कर जाएगी, लेकिन हमें रोना नहीं है, आंसुओं के सैलाब में तुम्हें खोना नहीं है."
बता दें कि 16 जून 2013 की रात केदारनाथ में भयंकर जल प्रलय आई थी, इस जल प्रलय ने केदार घाटी की शक्ल बदल दी थी. इस जल प्रलय ने केदारनाथ को मौत की चादर से ढंक दिया और हजारों लाशें नदी में बह गई थी. इतना ही नहीं कई लोगों का पता भी नहीं चला. इस भयानक जल प्रलय में न होटल बचे न धर्मशाला, न जिंदगी बची और न ही कुदरत की खूबसूरती. सलामत बचा तो बस केदारनाथ मंदिर. वह भी इसलिए कि मंदिर के पीछे एक बड़ी चट्टान पहाड़ों से खिसककर आकर रूक गई थी जिसकी वजह से मंदिर का नामोनिशान मिटने से बच गया था.
इस त्रासदी के बाद केदारनाथ के पास बहने वाली नदी मंदाकिनी की धारा का रुख बदल गया. पूरे उत्तराखंड की नदियां किनारे तोड़कर बहने लगी थीं.
आपदा के चौथे दिन केदारनाथ मंदिर के पास राहत दल पहुंचा तो वहां सैकड़ों लाशें पानी में तैरती मिली थीं. नदी में बस, ट्रक और मकान बहते हुए दिखे थे. सोनपुर और सीतापुर में गाड़ियां पानी पर तैर रही थीं. लोगों के शव पेड़ पर लटके थे.
जो जिंदा थे, वह राहत दल के हेलिकॉप्टर की तरफ हाथ हिलाकर जान बचाने के लिए चिल्ला रहे थे. पायलट ने किसी तरह लैंड किया तो कई लोग उनसे चिपक गए और बचाने की गुहार लगाने लगे. रामबाड़ा और केदारनाथ के बीच जंगलचट्टी में 500 के करीब लोग फंसे थे. उन्हें बचाने के चक्कर में एक हेलिकॉप्टर भी वहां क्रैश हो गया था. उसके बाद एयरफोर्स के एएलएच हेलिकॉप्टर से रेस्क्यू किया गया.
गौरतलब है कि 15 जून 2013 को पहाड़ों पर तेज बारिश हुई. 16 जून को केदारघाटी में मंदाकिनी ने कहर बरपाया. 17 जून को हर तरफ तबाही का मंजर दिखने लगा. 18 जून को 200 मौत की खबर आई. एक हजार लोगों के लापता होने की आशंका जताई गई. तबाही के चौथे दिन सहायता दल केदारनाथ पहुंच पाया. 19 जून तक 62 हजार यात्री अलग-अलग जगहों पर फंसे होने की सूचना थी. इसके लिए सेना के 5500 और आइटीबीपी के 600 जवान बचाव में उतरे थे. 19 जून को केंद्र सरकार ने एक हजार करोड़ रुपये की मदद की घोषणा की.
21 जून को केदारनाथ से हरिद्वार तक लाशें ही लाशें देखी गई. रामबाड़ा में बचाव दलों को जगह-जगह शव नजर आए. 22 जून को उत्तराखंड के सीएम ने एक हजार लोगों के मारे जाने की पुष्टि की. 25 जून को केदार घाटी में वायु सेना का हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था जिसमें 20 जवान शहीद हुए थे. 28 जून को सरकार ने एक लाख पांच हजार चार सौ बारह लोगों को बचाने का दावा किया. 30 जून को सरकार ने माना कि आपदा में 3000 हजार लोग मारे गए. 2 जुलाई को सेना का रेस्क्यू ऑपरेशन खत्म हुआ.