घटनाः 1 झांसी जिले की गरौठा तहसील केसिमरिया गांव के किसान खेतों में घुस रही आवारा गायों से लंबे समय से परेशान थे. तीन साल के सूखे ने उन्हें पहले ही तोड़ दिया था, उस पर इस साल हुई अतिवृष्टि ने उड़द-मूंग की फसल को हलकान कर रखा था. बची-खुची फसल पर आवारा गायों की नजर थी. इसीलिए गांव वाले रात में चौकसी पर बैठ गए. गायों का झुंड खेत में घुसता, इससे पहले ही गांव वालों ने उन्हें खदेडऩा शुरू कर दिया. जब गांव वालों को तसल्ली हो गई कि उन्होंने रेवड़ को गांव के बाहर खदेड़ दिया है, तभी इससे बड़ी मुसीबत उनके सामने आ गई. गायें अब शाजापुर गांव में घुसने वाली थीं और वहां के लोग भी गायों से उतने ही त्रस्त थे. नतीजा यह हुआ कि गाय तो गई एक तरफ और दोनों गांवों के लोगों ने एक-दूसरे पर पथराव शुरू कर दिया. पुलिस बुलानी पड़ी. लेकिन गायों की संख्या और गांव वालों के तेवर देख पुलिस मामले को दबाने के अलावा कुछ न कर सकी.
घटनाः 2 इसी जिले में 18 सितंबर को बबीना के पास ग्राम पंचायत खांडी के केशव राजपूत ने गौर किया कि कुछ गायें एक-दो दिन से अपनी ही जगह पर बैठी हैं. वहां से कहीं गई नहीं. उन्होंने पास जाकर देखा तो सन्न रह गए. गायों के खुर में लंबी-लंबी लोहे की कीलें ठोक दी गई थीं. पैरों में गहरे जख्म हो गए थे. कुछ के जख्मों में कीड़े पड़ गए थे. पूछताछ की तो पता चला कि पास के गांव नयापुरा के राजपूत समुदाय के ही लोग अपनी फसल को इन जानवरों से हो रहे नुक्सान से इस कदर खफा थे कि गोमाता के खुरों में कील ठोकने जैसा क्रूर काम कर बैठे. भारी दबाव के बाद पुलिस ने मामले में एफआइआर दर्ज की.
बुंदेलखंड के एक ही जिले की ये दो घटनाएं, क्या उसी देश में हो रही हैं, जो पिछले एक-दो साल से गोरक्षकों का आतंक देख रहा है. जहां गाय का मांस खाने का इल्जाम चस्पां कर किसी इनसान का कत्ल किया जा सकता है. जहां मरी गाय का चमड़ा उतारने पर दलितों की पिटाई हो रही हो. और हालात यहां तक बिगड़े कि खुद प्रधानमंत्री को दखल देकर कहना पड़ा कि गोरक्षा के नाम पर कुछ असामाजिक तत्व अपनी दुकान चला रहे हैं. गोरक्षा के ऐसे आक्रामक दौर में गांव वाले आखिर क्यों गोरक्षा के बजाए गोप्रताडऩा पर उतरने को मजबूर हुए? ये घटनाएं सिर्फ इन्हीं गांवों में नहीं हुई हैं. बुंदेलखंड के किसी भी जिले की पुलिस से पूछ लीजिए, वह आपको बताएगी कि खेत में गाय हांकने को लेकर गांव वालों के बीच झड़प के मामले उनके पास आए दिन आ रहे हैं. इन मामलों में पुलिस गांव वालों को समझा नहीं पाती और गाय को समझाने का तो खैर सवाल ही नहीं उठता. उधर, राजस्थान के नागौर जिले के चितावा थाना क्षेत्र में 11 अक्तूबर को खेत में गाय घुस जाने पर किसान जगदीश ने गोशाला के चरवाहे परमाराम की इस कदर पिटाई की कि उसे गंभीर हालत में जिला अस्पताल रेफर करना पड़ा. वहीं, मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के उदयपुरा और खिलवानी गांवों में किसान तब आमने-सामने आ गए जब एक गांव के किसान गायों को ट्रैक्टर में भरकर दूसरे गांव में छोड़ गए. इस तरह के हालात से निबटने के लिए गांवों में बाकायदा संघर्ष समितियां बना ली गई हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के अखबारों के स्थानीय संस्करणों में इस तरह की खबरें तकरीबन रोज नजर आ रही हैं.
वैसे तो भारत दुनिया का सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करने वाला देश है. 14.63 करोड़ टन लीटर सालाना के दूध उत्पादन के कारनामे में भैंस और गाय की ही मुख्य भूमिका है. 2012 की पशुगणना उठाकर देखें तो पता चलेगा कि देश के 51 करोड़ मवेशियों में से गोवंश की संख्या 19 करोड़ के करीब है. इसमें से बैल-बछड़ों को हटा दें तो गाय की संक्चया 12 करोड़ से कुछ अधिक है. संख्या के लिहाज से गाय भैंसों से दोगुनी है. और सिर्फ गांवों की बात करें तो हर गांव में औसतन 306 गाय-बैल बैठते हैं. लेकिन असल दिक्कत जम्मू-कश्मीर के एनिमल ब्रीडिंग विशेषज्ञ फरहत उमर कुछ इस तरह बताते हैं, ''इज्राएल में एक गाय जहां सालाना 10,000 लीटर से अधिक दूध देती है, वहीं हमारे यहां गाय औसतन 2,000 से 2,500 लीटर सालाना दूध देती है." साहीवाल, थारपारकर और गीर जैसी भारतीय नस्ल की गायें जरूर बहुत अच्छी मात्रा में दूध देती हैं, लेकिन इस तरह की शुद्ध नस्ल की गायों की संख्या बहुत सीमित है. गांव में आवारा छोड़ दी गई गाएं, इसी बिगड़ी नस्ल की हैं जो कम दूध दे रही हैं. ऐसा नहीं है कि इन गायों की सिर्फ नस्ल खराब हुई है, इनके कम दूध देने की एक वजह इनमें पनप रही बीमारियां भी हैं. गाय बड़ी संख्या में आंत की टीबी (जॉनीज टीबी) की शिकार हैं. इस बीमारी के कारण गाय के शरीर को खाना लगता नहीं है. यही नहीं जो देसी गाय पूरे जीवन में 10-12 साल तक दूध दे सकती है, वह दो से तीन बच्चों के जन्म के बाद ही बांझ हो जाती है. इस तरह की गाय को पालने के बजाए आवारा छोड़ देने में ही लोग अपनी भलाई समझ रहे हैं. इस बीमारी पर नियंत्रण के लिए 2014 में टीका विकसित करने वाले मथुरा के केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान में पशु स्वास्थ्य शाखा के प्रमुख डॉ. शूरवीर सिंह बताते हैं, ''यह बीमारी दूध और गोबर के जरिए भी फैल जाती है. सामान्य तौर पर दूध को उबालने पर बैक्टीरिया मर जाते हैं, लेकिन यह बैक्टीरिया पाश्चरीकरण के बाद भी खुद को बचा लेता है." डॉ. सिंह को अफसोस है कि 2014 में भारत सरकार ने उनके टीके को स्वीकार करने के बावजूद बड़े पैमाने पर इसका प्रचार प्रसार नहीं किया. उनका मानना है कि ऐसा करने से गायों के बीमार और कम दूध देने की समस्या काफी हद तक दूर हो जाती.
बहरहाल, यह बात तो हुई गायों की, उधर, बैल की हालत तो और खराब है. खेती-बाड़ी में अब हल-बैल का इस्तेमाल न के बराबर रह गया है. वे पूरी तरह अनुपयोगी हो गए हैं. पहले उत्तर भारत में आम चलन यही था कि लोग अपने बछड़ों को दूसरे राज्यों से आने वाले व्यापारियों को बेच देते थे. ये व्यापारी गांव-गांव से बछड़े खरीदते हुए, बड़ा झुंड तैयार करते थे और फिर जुगत भिड़ाकर इन्हें किसी बूचडख़ाने तक भेज देते थे. चूंकि बछड़ा आंख के सामने या आस-पास के इलाके में नहीं कटता था, इससे किसान की आत्मा पर गोहत्या का बोझ नहीं पड़ता था और व्यावहारिक रूप से गांव को इस अनुपयोगी पशु का बोझ नहीं उठाना पड़ता था. उत्तर प्रदेश योजना आयोग के सदस्य सुधीर पंवार कहते हैं, ''इतना तो कहा ही जा सकता है कि उग्र गोरक्षा के कारण लोग बछड़ा बेचने और खरीदने से बचने लगे हैं. गोकशी पहले की तुलना में कम हुई है. लेकिन अनुपयोगी पशुओं से निबटने का दूसरा व्याहारिक तरीका फिलहाल हमारे पास नहीं है." हालांकि 2007 की पशुगणना की तुलना में 2012 की पशुगणना में गाय-बैल की संख्या में मामूली कमी आई है, लेकिन इसमें इसका जिक्र नहीं है कि आवारा गाय-बैल की संख्या घटी है या पहले से बढ़ी है.
वैसे, इस तनाव को घातक होने से बचाने के लिए पहले जानवरों की जेल यानी कांजी हाउस का विकल्प हुआ करता था. इसके तहत यह व्यवस्था थी कि यदि कोई पशु किसी के खेत में घुसता था तो खेत का मालिक उस पशु को कांजी हाउस में बंद करा सकता था. मवेशी के मालिक को जब इसकी जानकारी होती थी तो वह निर्धारित जुर्माना चुकाकर मवेशी को छुड़ा लेता था. कांजी हाउस का संचालन ग्रामीण क्षेत्र में ग्राम पंचायत और शहरी क्षेत्र में नगर निकाय किया करते थे. झांसी जिले में ही पहले आठ गांव पर एक कांजी हाउस था. लेकिन जैसे-जैसे आवारा पशुओं की संख्या बढ़ती गई और कांजी हाउस में पशुओं को छुड़ाने वालों का आना कम हो गया तो इनका संचालन कठिन हो गया. इस समय जिले में एक भी कांजी हाउस काम नहीं कर रहा है. सबसे बुरी गत झांसी शहर के कांजी हाउस की हुई. हुआ यह कि 1997-98 में बीजेपी के धन्नूलाल गौतम नगर पालिका के चेयरमैन बने और झांसी सदर से ही बीजेपी विधायक रविंद्र शुक्ला मंत्री बने. दोनों नेताओं के प्रयास से कांजी हाउस की जमीन बीजेपी के जिला कार्यालय के लिए देने का प्रस्ताव नगर पालिका से पारित करा लिया गया. यहां अब बीजेपी का जिला कार्यालय चलता है. शुक्ला बताते हैं, ''कांजी हाउस खंडहर था, वहां बीजेपी कार्यालय बनाने के लिए हमने पहल कराई थी." वहीं झांसी के नगर आयुक्त अरुण प्रकाश कहते हैं, ''कांजी हाउस कब और कैसे बीजेपी को दे दिया गया, इसकी जानकारी मेरे पास नहीं है."
ग्रामीण जीवन में गोवंश की भूमिका सीमित हो जाने, चरागाह की जमीन के दूसरे काम में इस्तेमाल होने और कांजी हाउस भी खत्म होने के बाद मवेशियों को नियंत्रित करने का एक ही रास्ता बचता है—गोशाला. उत्तर प्रदेश में 1967 में जहां 65 गोशालाएं पंजीकृत थीं, वहीं 2015 में इनकी संख्या बढ़कर 390 हो गई. लेकिन संख्या बढऩे का मतलब यह नहीं है कि गोशालाएं इतनी सारी गायों की रक्षा कर सकती हैं. अब बांदा का ही उदाहरण लीजिए. पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर को आरटीआइ से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, जिले में नौ गोशालाएं पंजीकृत हैं. इन गोशालाओं में कुल मिलाकर 295 गाय-बैल और बछड़े-बछियां हैं. हो सकता है ये गोशालाएं इनकी सबसे अच्छी सेवा करती हों, लेकिन इतने आवारा पशु तो बांदा जिले के चार गांवों के चौराहों पर खड़े मिल जाएंगे. यानी गोशालाओं की क्षमता बहुत ही सीमित है. इसी तरह का हाल लखनऊ के जानकीपुरम इलाके की लक्ष्मण गोशाला का है. नगर निगम ने इस गोशाला के रखरखाव का जिम्मा जीवाश्रय संस्था को दे रखा है. ढाई एकड़ में फैली गोशाला में 650 गाय हैं. नगर निगम यहां गाय के खाने के लिए रोजाना 40 रु. प्रति गाय खर्च देता है. आठ साल से इसी दर से पैसा दिया जा रहा है. इतने पैसे में क्या लखनऊ जैसे शहर में गोसेवा हो सकती है?
और जब गोसेवा नहीं हो सकती तो कई लोग गोसेवा के नाम पर अपनी दुकान चलाना शुरू कर देते हैं, जैसा कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा था. स्वयंभू गोरक्षकों के डर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पशु व्यापार ठंडा पड़ गया है. इस साल 20 जून को शामली रेलवे के सामने गोरक्षकों ने गाय से भरे एक मिनी ट्रक को पकड़ लिया. ये लोग कामधेनु योजना के तहत गायें ला रहे थे. इसके बावजूद गोरक्षकों ने इन लोगों की जमकर पिटाई की. बाद में पुलिस ने किसी तरह मामला शांत कराया. इस तरह की घटनाओं से किनारा करते हुए वीएचपी के केंद्रीय मंत्री अशोक तिवारी कहते हैं, ''हमारे पास गोरक्षक नाम से कोई दल नहीं है. लेकिन अगर कार्यकर्ताओं को गोतस्करी की सूचना मिलती है, तो वे पुलिस को इसकी जानकारी देते हैं." महाराष्ट्र में भी गोरक्षा के लिए पुलिस ने सख्त कदम उठाए थे. इसके तहत गाय पालने वालों को नियमित अंतराल पर थाने जाकर बताना होता था कि उनके मवेशी की क्या स्थिति है. ऐसा भले ही गोरक्षा के लिए किया गया हो, लेकिन असल में इससे लोग गाय पालन से दूर ही होते चले गए.
गोसेवा की जगह गोसंकट पैदा करने वाले इन उपायों से अलग उपाय सुझाते हुए नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, करनाल के डायरेक्टर ए.के. श्रीवास्तव कहते हैं, ''पहला काम गायों को दुधारू बनाने का है. इसके अलावा सिर्फ बछिया पैदा करने वाली सस्ती तकनीक विकसित करने पर भी रिसर्च चल रही है. इससे बैलों के बोझ से बचा जा सकेगा." लेकिन क्या अनुपयोगी पशुओं का मांस के लिए उपयोग करना बेहतर विकल्प नहीं होगा? इस सवाल पर श्रीवास्तव कहते हैं, ''मौजूदा पशुओं के लिए ही चारे की कमी है. हमें ज्यादा दूध देने वाले कम पशु चाहिए होंगे."
(—साथ में आशीष मिश्र और विजय महर्षि)
पीयूष बबेले