भ्रष्टाचार से हलकान उत्तर प्रदेश, पार पाना नहीं आसान

प्रधान और सचिव के गठजोड़ ने केंद्र और राज्य सरकार की प्राथमिकता वाली योजना स्वच्छ भारत मिशन को भी भ्रष्टाचार में जकड़ लिया है.

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 जनता के बीच प्रतापगढ़ में चौपाल के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जनता के बीच प्रतापगढ़ में चौपाल के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

आशीष मिश्र / संध्या द्विवेदी / मंजीत ठाकुर

  • नई दिल्ली,
  • 09 मई 2018,
  • अपडेटेड 8:35 PM IST

गोरखपुर और फूलपुर के लोकसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हार के बाद अपनी सरकार के कामकाज की जमीनी हकीकत जानने के लिए मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ दौरे पर निकले. शुरुआत 23 अप्रैल से हुई जब मुख्यमंत्री प्रतापगढ़ शहर से 18 किलोमीटर दूर पट्टी तहसील के कंधई माधपुर गांव में रात गुजारने पहुंचे.

योजनाओं की पोल न खुल जाए, इसलिए अफसरों ने मुख्यमंत्री  की चौपाल में एक जनसभा सरीखी व्यवस्था की थी. मंच के बाद 'डी' बनाया गया था ताकि कोई भी व्यक्ति योगी आदित्यनाथ तक न पहुंच सके. शाम करीब सात बजे गांव पहुंचते ही मुख्यमंत्री जनता को मंच से दूर बैठा देख अफसरों पर नाराज हो गए.

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उन्होंने गांव वालों से सुरक्षा घेरा तोड़कर मंच के समीप बैठने को कहा. इसके बाद योगी जनता से घिर गए और चौपाल शुरू हुई. उन्होंने पूछा, ''कितने लोगों को शौचालय मिला?" चौपाल में आधे से ज्यादा लोगों ने हाथ उठाकर शौचालय न मिलने की बात कही.

इसके बाद सबने शौचालय और प्रधानमंत्री आवास योजना में रिश्वत मांगने की शिकायत करनी शुरू कर दी. गुस्साए योगी ने डीएम शंभु कुमार, सीडीओ राजकमल यादव को मंच पर बुलाया और पूछा, ''इन लोगों को शौचालय क्यों नहीं मिला?'' अधिकारी बगलें झांकने लगे. डीएम बोले, ''सर, मैं दिखवाता हूं.'' नाराज मुख्यमंत्री ने आदेश दिया, ''सुबह तक हर पात्र व्यक्ति के खाते में शौचालय बनाने के लिए 12,000 रुपए पहुंच जाने चाहिए."

पूर्वी जिले से फीडबैक लेने के बाद 26 अप्रैल को योगी पश्चिमी जिले अमरोहा पहुंचे. दलित परिवार के घर रात गुजारने के अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे मुख्यमंत्री  विकास कार्यों की नब्ज टटोलने सीधे कलेक्ट्रेट गए. यहां सभागार में बैठक के दौरान कुछ जनप्रतिनिधियों ने कहा, ''पंचायती राज विभाग में पैसा लिए बगैर कोई काम नहीं हो रहा है. स्वच्छता मिशन में लाभार्थी महिलाओं को भुगतान भी नहीं हुआ है." खफा मुख्यमंत्री ने जिला पंचायत राज अधिकारी और सहायक विकास अधिकारी को तलब किया. संतोषजनक जवाब न दे पाने पर उन्होंने दोनों अफसरों को निलंबित करने का आदेश दिया.

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गांव में रात गुजारकर जनता की नब्ज टटोलने पहुंचे मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के मंत्रियों को इस कड़वे सच से रू-ब-रू होना पड़ा कि कई कोशिशों के बावजूद जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार पर प्रभावी नकेल नहीं कसी जा सकी है. यही वजह है कि भाजपा के नेता अपनी ही सरकार के कामकाज पर उंगली उठा रहे हैं (देखें बॉक्स).

अफसरों पर निर्भरता से समस्या

बांदा जिले के तिंदवारी क्षेत्र से विधायक बृजेश प्रजापति ने जसपुरा क्षेत्र के कानाखेड़ा इलाके में डाली गई पाइपलाइन में गड़बड़ी की शिकायत जल निगम के कई बड़े अफसरों से की थी.

कार्रवाई न होने से क्षुब्ध बृजेश 24 अप्रैल को जल निगम के अधीक्षण अभियंता एस.सी. श्रीवास्तव के कार्यालय पहुंचे.

''सुना है, आप पैसे लिए बगैर कोई काम नहीं करते!" यह कहते हुए बृजेश ने श्रीवास्तव के गले में नोटों की माला पहना दी. अधीक्षण अभियंता ने आरोपों को गलत बताते हुए मामले की शिकायत कमिशनर से की.

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर तुरंत सख्त कार्रवाई न होने से भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं में असंतोष बढ़ रहा है.

प्रदेश भाजपा के एक मंत्री बताते हैं, ''सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार की शिकायत करने पहुंचने वाले कार्यकर्ताओं और नेताओं को ही संदेह की नजर से देखने लगते हैं.

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इससे भ्रष्ट अफसर बेलगाम हो रहे हैं." भ्रष्ट कर्मचारियों, अफसरों पर कड़ी नजर रखने के लिए भ्रष्टाचार निवारण संगठन ने पिछले वर्ष नवंबर में गृह विभाग को एक प्रस्ताव भेजकर हर मंडल में 'भ्रष्टाचार निवारण इकाई' बनाने का सुझाव दिया था. फिलहाल प्रस्ताव फाइलों में है.

सिद्धार्थनगर में 2 अप्रैल को जिला जेल के सामने मैदान पर 'स्कूल चलो' अभियान की शुरुआत करने पहुंचे मुख्यमंत्री को रैली स्थल पर दूर किनारे एक महिला बच्चों के साथ तख्ती लिए दिखाई दी.

मुख्यमंत्री ने उसे मंच पर बुलाया तो पता चला कि महिला के मकान पर दबंग कब्जा कर रहे हैं और पुलिस रिश्वत लेकर दबंगों का साथ दे रही है.

जांच में आरोप सही पाए गए और एसओ समेत पांच पुलिस कर्मी निलंबित हुए. गाजीपुर में गंगा के किनारे हो रहे अवैध कब्जों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे प्रेम प्रकाश बताते हैं, सरकारी अफसरों पर अतिनिर्भरता से भ्रष्टाचार के ज्यादातर मामले दबे जा रहे हैं. सरकार के पास ऐसा कोई प्रभावी तंत्र नहीं है कि जनता सीधे भ्रष्टाचार की शिकायत कर राहत पा सके." उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य लगातार भ्रष्ट अफसरों को सुधरने की नसीहत दे रहे हैं. मौर्य कहते हैं, ''भ्रष्टाचार पर भाजपा सरकार सख्त है. इस सरकार में पहली बार बड़ी संख्या में भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई की गई है."

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ई-टेंडर का नहीं दिखा असर

पिछले वर्ष एक सितंबर से खनन मंं ई-टेंडर व्यवस्था लागू करने के साथ ही कैबिनेट मंत्री और प्रदेश सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने माफिया राज और भ्रष्टाचार खत्म होने का दावा किया था. लेकिन ई-टेंडर लागू होने के आठ महीने बीतने के बाद स्थितियां और बदतर हो गई हैं.

बुंदेलखंड के आरटीआइ एक्टिविस्ट आशीष सागर कहते हैं, ''ई-टेंडर से केवल खदानों का आवंटन ही किया गया लेकिन खनन की पूरी भ्रष्ट व्यवस्था पर कोई नियंत्रण नहीं रखा गया. आलम यह है कि ई-टेंडर से बाहर की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने बुंदेलखंड की खनन व्यवस्था पर कब्जा जमाकर एक नए माफिया राज की शुरुआत की है.

इन माफियाओं ने न केवल टेंडर में ऊंची बोली लगाई बल्कि प्रतिद्वंद्वी को भी मैनेज करके ई-टेंडर की काट ढूंढ़ ली." बांदा-चित्रकूट से भाजपा सांसद भैरों प्रसाद मिश्र ने मुख्यमंत्री  आदित्यनाथ को पत्र लिखकर खनन विभाग में भ्रष्टाचार के चलते अवैध खनन को बढ़ावा मिलने की शिकायत की थी (देखें बॉक्स).

मुख्यमंत्री कार्यालय से निर्देश मिलने के बाद चित्रकूट के जिलाधिकारी विशाख जी. अय्यर ने सात टीमें गठित कर चित्रकूट में बालू खदानों की जांच की थी और फिर दोषियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई गई.

इलाहाबाद में खनन और पुलिस विभाग के अफसरों के संरक्षण से यमुनापार के घूरपुर और लालपुर में निकाली गई अवैध बालू को जमा किया जा रहा है ताकि उसे जून में बारिश शुरू होने के बाद मनमाने दाम पर बेचा जा सके. घूरपुर से लालपुर के मुख्य मार्ग सहित आसपास के गांवों के बाग-बगीचों तक बालू के ढेर लगे हैं लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मुंह फेरे हुए हैं. खनन राज्यमंत्री अर्चना पांडेय बताती हैं, ''भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई की गई है."

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नहीं टूटा प्रधान-सचिव गठजोड़

ग्रामीण इलाकों में रहने वाले गरीबों को आवास देने की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना में भी भ्रष्टाचार का घुन लग गया है. मुरादाबाद जिले की बात करें. यहां पर पिछले दो वर्ष में पौने आठ हजार अभ्यार्थियों का चयन प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए किया गया है.

इनमें से 6,500 से कुछ अधिक लाभार्थियों को सरकार से मिलने वाली निर्धारित रकम की तीसरी किस्त भी जारी हो गई. सरकार को गड़बड़ी की सूचना मिली तो ग्राम्य विकास, पंचायत और अन्य विभागों के अधिकारी सत्यापन के लिए घर-घर दौड़ाए गए. सत्यापन में 233 लाभार्थी ऐसे मिले जिन्होंने 40,000 रु. की पहली किस्त बैंक से निकाल ली है.

ग्राम्य विकास विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि प्रधान और सचिव ने लाभार्थियों के फर्जी नाम पते से बैंक अकाउंट खोलकर पीएम आवास योजना का पैसा हड़पा है. मुरादाबाद में 'डिस्ट्रिक्ट रूरल डेवलपमेंट अथारिटी' के परियोजना निदेशक राज करन पाल बताते हैं, ''लापता लोगों की तलाश की जा रही है. दोषी लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी."

गोंडा में पिछले छह महीने के दौरान 15 से अधिक प्रधानों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई है जिन पर रिश्वत लेकर अपात्रों को यह आवास योजना देने का आरोप है.

फैजाबाद के साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. वी.एन. अरोड़ा बताते हैं, ''मनरेगा योजना की सक्षम मॉनिटरिंग न होने से प्रधान और सचिव के गठजोड़ ने गांवों में भ्रष्ट सिस्टम तैयार कर दिया है. भाजपा सरकार भी इस गठजोड़ को तोडऩे में नाकाम रही है, जिससे गांवों में शुरू हुई दूसरी महत्वाकांक्षी योजनाएं भी भ्रष्टाचार की चपेट में हैं."

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प्रधान और सचिव के गठजोड़ ने केंद्र और राज्य सरकार की प्राथमिकता वाली योजना स्वच्छ भारत मिशन को भी भ्रष्टाचार में जकड़ लिया है. कानपुर के बिल्हौर ब्लॉक में गंगा के किनारे मौजूद नानामऊ, ददिखा, हसौली, अकबरपुर सेंगर समेत एक दर्जन से ज्यादा गांवों के प्रधानों ने सचिव के साथ मिलकर फर्जी ढंग से खुले में शौचमुक्त घोषित करा लिया. जांच में पता चला कि इन गांवों में तो शौचालय बने ही नहीं और करोड़ों रु. की बंदरबांट हो गई. ऐसा ही भ्रष्टाचार कन्नौज, सहारनपुर, सीतापुर जैसे जिलों में भी सामने आने पर दोषियों पर कार्रवाई की गई है.

प्रदेश में भाजपा सरकार का पहला साल पूरा होने के बाद 19 मार्च को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने जनता को 'एंटी करप्शन पोर्टल' का हथियार सौंपा. यह हथियार कितना प्रभावी होगा, इसी से सरकार के भ्रष्टाचार विरोधी रुख की थाह मिलेगी.

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