उन्होंने लखनऊ को एक नई दिनचर्या दे डाली है. मार्च 2017 की 19 तारीख के बाद से, जब 45 साल के योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के पद की शपथ दिलाई गई थी, विधान भवन के पीछे स्थित राज्य सचिवालय के पंचम तल में एक अभूतपूर्व किस्म की हलचल रहती है.
इमारत की पांचवी मंजिल पर स्थित और अब केसरिया रंग में रंग दिया गया मुख्यमंत्री का दफ्तर भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य को संचालित करने वाला केंद्र है. योगी आदित्यनाथ ने 47 सदस्यों वाली मंत्रिपरिषद के लिए समय-सारिणी तय कर दी है और अक्सर वे मंत्रियों को बैठक के लिए बुला लेते हैं जो कई बार तड़के तक चल जाती हैं.
कैबिनेट मंत्री श्रीकांत शर्मा कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश के सभी मंत्रियों को हर सप्ताह के पहले दो दिन लखनऊ में रहने और अपने प्रतिनिधियों से मिलने के लिए कहा गया है.'' मंगलवार का दिन मंत्रिमंडल की बैठकों के लिए तय है. शर्मा बताते हैं, ''सीएम पहले ही 19 मार्च के बाद से 30 से ज्यादा मंत्रिमंडलीय बैठकें ले चुके हैं.'' वे दावा करते हैं कि यह बसपा और सपा की सरकारों के अधीन हुई मंत्रिमंडल की बैठकों से कहीं ज्यादा है.
योगी प्रशासन से अवांछित जड़ता को भी दूर करने की कोशिश कर रहे हैं. पचास से ज्यादा की उम्र के सभी अधिकारियों की स्क्रीनिंग के बाद योगी ने राज्य सेवा के एक दर्जन से भी ज्यादा अधिकारियों को जबरन सेवानिवृत्ति देने या उनकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश दिया है. सचिवालय में भी सौ से भी ज्यादा 'ढीले' कर्मचारियों को अवनति देकर समूचे राज्य की बाबूशाही को कड़ा संकेत दिया गया है—काम करो या घर बैठो.
एक तरफ तो वे अपने अफसरों पर काम करने के लिए सख्ती बरत रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खामोशी के साथ लेकिन दृढ़ता से भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे को भी आगे बढ़ा रहे हैं. इसकी बानगी देखिए, राज्य सरकार के जिस पहले बजट को जुलाई में उत्तर प्रदेश विधानसभा ने पारित किया, उसमें अयोध्या, मथुरा, चित्रकूट और वाराणसी जैसे हिंदू धार्मिक केंद्रों को विकसित करने के लिए 2,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं.
साथ ही साथ वे उत्तर प्रदेश से बीमारू राज्य का ठप्पा हटवाने के लिए केंद्र सरकार के विकास एजेंडे को भी आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने मेट्रो रेल से लेकर एक्सप्रेसवे और जेवर में हवाई अड्डे तक कई ढांचागत परियोजनाओं का भी ऐलान किया है.
—आशीष मिश्र
आशीष मिश्र / संध्या द्विवेदी