हाल ही में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रेल भवन में अपने कुछ नजदीकी सहयोगियों को उस समय के बारे में बताया, जब जवानी के दिनों में उन्होंने शतरंज खेलना छोड़ दिया था. वे शतरंज में इस कदर खोए रहने लगे थे कि शतरंज की चालें उनके सपनों में आने लगती थीं. लेकिन अब रेल मंत्री के रूप में संभवतया उनके सपनों में महज रेल का चक्का आता होगा. एक ऐसा मकड़जाल, जिसमें भारतीय रेल पिछले कई सालों से उलझी हुई है. दशकों से लगातार कमतर निवेश, उपेक्षा और लगभग 5 लाख करोड़ रु. की लंबित परियोजनाओं के कारण पटरियों पर काफी बोझ है. और नतीजतन भारत में पटरियों पर रफ्तार दुनिया में सबसे कम है-माल ढुलाई के लिए करीब 25 किमी प्रति घंटा और यात्रियों के लिए 70 किमी प्रति घंटा. इसका बहुत प्रतिकूल असर पड़ा है-घटिया सेवाएं, उससे भी बदतर दुर्घटनाएं, गैर-प्रतिस्पर्धी किराया और कम आंतरिक राजस्व.
प्रभु ने पिछले साल अपने पहले बजट में और इस साल 24 फरवरी को संसद में पेश अपने दूसरे बजट में कई अनूठे उपायों से इस मकड़जाल को तोड़ने की कोशिश की है. उन्होंने संसद में कहा, “ये चुनौतीपूर्ण समय है. संभवतया सबसे मुश्किल.” रेलवे के राजस्व की पहले से ही सूखती धारा को इस साल और संकट झेलना होगा, क्योंकि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को अमल में लाने के लिए उसे अनुमानतः 32,000 करोड़ रु. का बोझ उठाना पड़ेगा. नतीजतन, आय 8.5 फीसदी के अनुमानों से नीचे चले जाएगी. रेलवे का परिचालन अनुपात, यानी एक रुपया कमाने के लिए खर्च की गई राशि पिछले साल के 90 की तुलना में बढ़कर 92 हो जाएगी.
प्रभु ने यात्री या माल ढुलाई के किराए से तो कोई छेड़छाड़ नहीं की है, लेकिन उनकी योजना है कि “गैर-किराया मद” से लगभग 15,000 करोड़ रु. का राजस्व जुटाया जाए. ऐसा मुख्य रूप से विज्ञापनों और यात्री सुविधाओं जैसी मूल्य वर्धित सेवाओं के जरिए करने की योजना है. यहां उन्होंने अपनी मदद के लिए विकास का तीन-सूत्रीय एजेंडा तैयार किया है-नव अर्जन, नव मानक और नवसंरचना.
प्रभु ने लालफीताशाही भी कम की है. एक रेलवे अधिकारी का कहना था कि फैसले लेने की अवधि 500 दिन से कम होकर 88 दिन रह गई है. रेल मंत्री एनडीए के सबसे कामयाब औजार सोशल मीडिया को भी संचालित कर रहे हैं. रेल भवन की चौथी मंजिल पर स्थित सोशल मीडिया कंट्रोल रूम को लगभग दर्जन भर रेलवे अधिकारी चौबीसों घंटे मॉनिटर करते रहते हैं. चार-चार अधिकारी तीन पालियों में काम करते हैं और वे रेल मंत्री को किए जाने वाले यात्रियों के ट्वीट की निगरानी करते हैं. वे व्यक्तिगत सुरक्षा से लेकर बेबी फूड के अनुरोध तक हर शिकायत क्षेत्रीय प्रबंधकों को भेजते हैं.
प्रभु ने राजस्व को अधिकतम करके और खर्च को बचाकर रेलवे की वित्तीय स्थिति को सुधारने की भी कोशिश की है. रेलवे को इस साल बिजली बचत से 3,000 करोड़ रु. बचाने की उम्मीद है. रेलवे ने जीवन बीमा निगम से लाभप्रद दरों पर 1.5 लाख करोड़ रु. उधार लिए हैं ताकि वह अपनी परियोजनाओं के लिए वित्त जुटा सके. इनमें अन्य महत्वाकांक्षी योजनाओं के अलावा अगले पांच साल में 9,000 किमी लंबे रेलमार्ग का दोहरीकरण करना भी शामिल है.
प्रभु ने पिछले साल पेश की गई बिबेक देबरॉय समिति की रिपोर्ट में भारतीय रेलवे के पुनर्गठन से जुड़े ज्यादा विवादास्पद पहलुओं को किनारे रखा है. इन सिफारिशों में रेलवे बोर्ड का पुनर्गठन, निजी कंपनियों के प्रवेश की इजाजत और अस्पताल चलाने या सुरक्षा प्रदान करने जैसे क्षेत्रों से खुद को अलग करना शामिल है. फिर भी प्रभु रेलवे को दूरदृष्टि से देखने वाले पहले रेल मंत्रियों में से हैं. अपने भाषण में रेल मंत्री ने एक ऐसे भविष्य की ओर इशारा किया है, जिसमें रेलों में मांगने पर आरक्षित जगह उपलब्ध होगी, मालगाड़ियों से तय समय सारिणी के अनुरूप सामान पहुंचाने की प्रतिबद्धता रहेगी, तकनीक की मदद से सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार होगा, सभी मानव-रहित रेलवे क्रॉसिंग खत्म कर दिए जाएंगे जो इस समय ज्यादातर रेल दुर्घटनाओं का कारण हैं और रेलवे के समय पालन को 95 फीसदी तक ले आया जाएगा. नए दौर में मालगाडिय़ों की औसत गति बढ़कर 50 किमी प्रति घंटे हो जाएगी और एक्सप्रेस यात्री ट्रेनों की गति 80 किमी प्रति घंटा. स्वर्ण-चतुर्भुज के रास्तों पर अर्ध-उच्चगति की ट्रेनें दौड़ेंगी और पटरियों पर मानव-मल का सीधे गिरना पूरी तरह खत्म हो जाएगा.
ऐसी ही एक सूरत बदलने वाली योजना तो बहुत करीब है. 80,000 करोड़ रु. की यह ढांचागत परियोजना रेलवे को वैसे ही बदल देगी जैसे लगभग एक दशक पहले स्वर्ण चतुर्भुज योजना ने सड़क परिवहन में क्रांति ला दी थी. डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) माल ढुलाई की गति को तीन गुना कर देगा और माल ढुलाई की दरों को कम कर देगा जो विकसित देशों के मुकाबले इस समय दो से तीन गुना ज्यादा हैं. इसमें दिल्ली को मुंबई से जोड़ने वाला पश्चिमी फ्रेट कॉरिडोर और दिल्ली को कोलकाता से जोड़ने वाला पूर्वी फ्रेट कॉरिडोर शामिल है. लेकिन इस दिशा में प्रगति अभी धीमी है. इसका प्रस्ताव लगभग एक दशक पहले रखा गया था. लेकिन अब रेलवे को भरोसा है कि डीएफसी को 2019 तक यानी अगले आम चुनावों के आसपास पूरा कर लिया जाएगा. प्रभु ने बजट में तीन नई डीएफसी की योजना भी पेश की-दिल्ली-चेन्नै, खड़गपुर-मुंबई और खड़गपुर-विजयवाड़ा.
रेलवे के बारे में एक्सिस सिक्युरिटीज की जनवरी, 2016 की एक रिपोर्ट प्रभु के रास्तों यानी पटरियों के दोहरीकरण और विद्युतीकरण से पटरियों पर बोझ कम होने की उम्मीद जाहिर नहीं करती. उसके लिए तो रेलवे को डीएफसी या हाइ-स्पीड रेल जैसी छलांग की जरूरत होगी. ऐसी फायदा देने वाली परियोजनाओं को बाहर से सस्ते में वित्तपोषित किया जा सकता है और वे रेलवे के चरमराते ढांचे पर बोझ कम करेंगी. प्रभु ने एक बार यूरोप और चीन के रेल नेटवर्क से तुलना किए जाने को अनुचित बताया था क्योंकि वे 30 साल की परिकल्पना के बाद आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं. जाहिर है, प्रभु के पास इतना समय नहीं होगा.
संदीप उन्नीथन