लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित 5 नंबर की कोठी के बाहर 17 मई की सुबह साढ़े दस बजे से वीआइपी गाडिय़ों का काफिला पहुंचने लगा था. राज्यसभा के लिए पार्टी के उम्मीदवार घोषित करने की खातिर समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव अपने आवास पर संसदीय बोर्ड की बैठक कर रहे थे. अमर सिंह का जिक्र आते ही कैबिनेट मंत्री आजम खान की त्योरियां चढ़ गईं. जब सात उम्मीदवारों की सूची में एक भी मुसलमान को जगह नहीं मिली तो आजम विरोध में बैठक छोड़कर चले गए. दो दिन बाद दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना सैयद अहमद बुखारी भी राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन में मुसलमानों की उपेक्षा पर विरोध दर्ज कराने मुलायम के घर पहुंचे. मुलायम ने पिछले चुनाव में दो मुसलमानों को राज्यसभा भेजने की बात कहकर अपना पक्ष रखा पर कुछ 'मजबूरियों' के चलते इस बार ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. कुछ ऐसी ही 'मजबूरी' मुसलमानों के वोटों पर दावेदारी कर रही बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की भी थी. पश्चिमी यूपी के कुछ बड़े नेताओं के सुझावों को दरकिनार कर बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपनी पार्टी के कोटे की दो राज्यसभा सीटों पर सतीश मिश्र और अशोक सिद्धार्थ को उतार दिया.
यूपी में मुसलमान मतों की दावेदार दो सबसे बड़ी पार्टियां 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने बुनियादी जातीय समीकरण सहेजने में ऐसी उलझी हैं कि वे राज्यसभा चुनाव में एक अदद मुसलमान उम्मीदवार के लिए जगह नहीं बना सकीं. 2012 के विधानसभा चुनाव में पहली बार यूपी में सर्वाधिक 64 मुसलमान विधायक बने (देखें बॉक्स) पर दो साल बाद लोकसभा चुनाव में कोई भी मुसलमान उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका. अगर जारी चुनाव प्रक्रिया को भी शामिल कर लें तो पिछले लोकसभा चुनाव के बाद यूपी की 21 राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव में जीतने वाले मुसलमान उम्मीदवारों की संख्या 2 ही रहेगी (नवंबर, 2014 में सपा से जीते थे). जाहिर है, बराबरी का दावा करने वाली सियासी पार्टियां यूपी की कुल आबादी में 19.3 फीसदी (स्रोतः 2011 जनगणना) हिस्सेदारी वाले मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व देने में नाकाम साबित हुई हैं. मुसलमान मतदाताओं के मुद्दे और पहचान को लेकर उपजे संकट के बीच उनके वोटों की सियासत दोराहे पर आ खड़ी हुई है. इससे असम के विधानसभा चुनाव की तरह यूपी में भी मुसलमान वोटों में बंटवारे की पटकथा तैयार होती दिखती है.
2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीतने वाली बीएसपी ने अपने मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पश्चिमी यूपी की कमान सौंपकर दंगा पीड़ित मुसलमानों की रहनुमाई शुरू कर दी थी. सिद्दीकी ने पीड़ित मुसलमानों से लगातार संपर्क कर न सिर्फ उन्हें मायावती के सुशासन की याद दिलाई बल्कि उस नाराजगी को भी कम करने की कोशिश की जो मुजफ्फरनगर के दंगे के बाद बीएसपी की उपेक्षा से उपजी थी. वे मुसलमान बहुल जिलों (देखें ग्राफिक्स) समेत पश्चिमी यूपी की 60 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर सभाएं कर मुसलमान उम्मीदवारों की घोषणा कर चुके हैं. मुसलमानों में बीएसपी की बढ़ती पैठ से निबटने के लिए सपा ने पिछले साल मुसलमान धर्मगुरुओं से करीबी रखने वाले मुरादनगर के आशु मलिक को विधानपरिषद सदस्य बनाया और बाद में अमरोहा के कमाल अख्तर को कैबिनेट मंत्री बना सपा सरकार में मुसलमान मंत्रियों की संख्या 11 तक पहुंचा दी. इसके बावजूद मुसलमान बहुल देवबंद और मुजफ्फरनगर सीट पर विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद उसके लिए खतरे की घंटी बज चुकी है. मुलायम उलेमा के साथ बैठकें कर सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू करने, आतंकवाद के नाम पर बंद बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई जैसे चुनावी वादों के पूरा न होने पर सफाई दे रहे हैं. इसके आगे सपा सरकार मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए संविधान संशोधन करने का एक प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजने जा रही है. वहीं कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने भी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से पूर्व विधायक इमरान मसूद को पश्चिमी यूपी में पार्टी का चेहरा बनाने की मांग की है. 2014 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर से कांग्रेसी उम्मीदवार रहे मसूद को नरेंद्र मोदी के खिलाफ विवादास्पद भाषण देने के आरोप में जेल की हवा खानी पड़ी थी.
आने वाला विधानसभा चुनाव यूपी की मुस्लिम राजनीति में दो सूरमाओं के कौशल की भी परीक्षा लेगा. बीएसपी के मुस्लिम चेहरे और राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी प्रदेश की दरगाहों और मुसलमान धर्मगुरुओं से संपर्क साधकर उन्हें मायावती के शासनकाल की याद दिलाकर समर्थन बटोर रहे हैं. वे अगर संगठन के माहिर खिलाड़ी के तौर पर उभरे हैं तो सपा ने एक बार फिर आजम खान को आगे कर विधानसभा चुनाव में समर्थन बटोरने की तैयारी की है. मार्च में गवर्नर राम नाईक के साथ विवाद में जिस तरह से सपा के शीर्ष नेता आजम के साथ खड़े दिखे, उसमें रामपुर के इस कद्दावर नेता के सहारे मुसलमान वोट साधने की ही मंशा थी. अपनी तल्ख और बेबाक बयानबाजी के लिए मशहूर आजम के जरिए सपा की कट्टर बयानबाजी करने वाले आल इंडिया मजलिस-ए-इतिहादुल मुस्लिमीन (एमआइएम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी को यूपी में प्रभावहीन करने की रणनीति है. आजम और ओवैसी की कट्टर बयानबाजी के बीच बीजेपी भी मुसलमानों में होने वाले पार्टी विरोधी ध्रुवीकरण को थामने की रणनीति पर काम कर रही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी इंद्रेश कुमार की सरपरस्ती में बने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने पिछले एक साल में यूपी में डेढ़ दर्जन से ज्यादा उलेमा कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया है. आगामी रमजान के महीने में संघ ने रोजा इफ्तार पार्टी के बहाने मुसलमानों से भाईचारा बढ़ाने की तैयारी की है. वहीं केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने पहले चरण में देश में सबसे अधिक यूपी में डेढ़ दर्जन से अधिक मदरसों में स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोल मुसलमानों को बीजेपी के विकास एजेंडे से जोडऩे की कोशिश की है.
बरेलवी—देवबंदी में रस्साकशी
दरगाहों के शहर बरेली में प्रतिष्ठित कुतुबखाना मस्जिद पर मालिकाना हक को लेकर पिछले एक साल से देवबंदी और बरेलवी मसलक के बीच विवाद है. मामला वक्फ बोर्ड में लंबित है और मस्जिद पर ताला लटक रहा है. सपा सरकार को किसी एक समुदाय के पक्ष में फैसला होने पर दूसरे के नाराज हो जाने का डर सता रहा है और इसी वजह से मामले को लटकाकर रखा गया है. रुहेलखंड इलाके में शाहजहांपुर, पीलीभीत और बरेली शहर बरेलवी मसलक के गढ़ हैं जबकि रामपुर, मुरादाबाद में देवबंदियों का प्रभाव है. बरेलवी इमाम की तैनाती के बाद से चर्चा में आए कुतुबखाना मस्जिद प्रकरण में राज्य सरकार के ढुलमुल रवैए से बरेलवी सपा सरकार से नाराज हैं. सपा के खिलाफ बरेलवी समुदाय में बढ़ती नाराजगी को 'कैश' कराने के लिए बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी 2 फरवरी को दरगाह आला हजरत पर हाजिरी लगाने पहुंचे. तो सपा ने भी उर्दू के मशहूर शायर वसीम बरेलवी को विधान परिषद सदस्य मनोनीत कर मुसलमानों के बीच पनप रही नाराजगी को दूर करने के लिए अपना चिरपरिचित दांव चल दिया. उधर शिया मुसलमानों की अच्छी-खासी तादाद वाले लखनऊ में शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने वक्फ संपत्तियों पर हो रहे कब्जे के विरोध में सपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में शिया मुसलमानों ने लखनऊ लोकसभा सीट से तत्कालीन उम्मीदवार राजनाथ सिंह को समर्थन दिया था. सांसद बनने के बाद भी राजनाथ ने लगातार शिया कार्यक्रमों में जाकर उनका समर्थन बटोरने की कोशिशें जारी रखी हैं.
बड़ों का खेल बिगाड़ेंगे छोटे
पूर्वांचल में मुस्लिम राजनीति में सपा, बीएसपी जैसे दलों की वैसी धमक नहीं सुनाई दे रही है जैसी कि पश्चिमी यूपी में है. पूर्वांचल में सपा का मुसलमान चेहरा आंबेडकर नगर से आने वाले कैबिनेट मंत्री अहमद हसन हैं तो बीएसपी ने कभी पश्चिमी यूपी में पार्टी की मुसलमान राजनीति को परवान चढ़ाने वाले मुनकाद अली को पूर्वी जिलों की कमान सौंपी है. हकीकत यह है कि अहमद हसन और मुनकाद अली पूर्वांचल के मुसलमानों में अपनी पैठ नहीं बना पाए हैं और इसी ने यहां छोटे दलों को पांव पसारने का मौका दिया है. पूर्वांचल में बुनकरों की बेहतरी के लिए काम कर रहे स्वयंसेवी अरशद मंसूरी बताते हैं, ''पूर्वी जिलों में मुसलमानों का पिछड़ापन मुख्य मुद्दा है. यूपी में सक्रिय बड़े सियासी दल मुसलमानों से संवाद स्थापित करने में फिलहाल नाकाम साबित हुए हैं. इसी खालीपन ने छोटे मुस्लिम दलों के लिए जगह बनाई है.'' एमआइएम ने इसी जगह को भरने में पूर्वांचल में पूरी ताकत झोंक दी है. फरवरी में हुए बीकापुर, फैजाबाद के विधानसभा उपचुनाव में 12,000 से ज्यादा वोट बटोरने वाली एमआइएम को राजनैतिक विश्लेषक 'वोट कटवा' के रूप में देख रहे हैं, जो बड़े दलों का खेल बिगाड़ सकते हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल की कई सीटों पर सपा के साथ नजदीकी मुकाबले में बीएसपी को पीस पार्टी की उपस्थिति अखर गई थी. इसी तरह अगले विधानसभा चुनाव में सपा को ओवैसी की पार्टी नुक्सान पहुंचा सकती है.
30 अप्रैल को विधानभवन में विधान परिषद सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद राजनीति और मुसलमानों से जुड़े एक सवाल पर वसीम बरेलवी ने फौरन चंद लाइनें सुना दीं: हमको महसूस किया जाए है खुशबू की तरह, हम कोई शोर नहीं हैं जो सुनाई देंगे. विडंबना यह कि राजनैतिक पार्टियां मुसलमानों को अब भी महज वोट बैंक की तरह ही महसूस कर रही हैं.
आशीष मिश्र