भारत की क्रिकेट यात्रा में कुछ जीतें केवल स्कोरबोर्ड तक सीमित नहीं रहतीं, वे बहस बन जाती हैं. ऑस्ट्रेलिया में 2018-19 की टेस्ट सीरीज जीत भी ऐसी ही एक कहानी है- जिसे किसी ने ऐतिहासिक कहा, किसी ने अतिरंजित. सवाल आज भी जिंदा है- क्या यह जीत वाकई उतनी महान थी, जितनी बताई गई?
सात दशक से ज्यादा समय तक भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया जाती रही, कड़ी टक्कर दी, यादगार टेस्ट जीते, लेकिन सीरीज जीत हमेशा फिसल जाती थी. जब 2018–19 में आखिरकार यह सपना पूरा हुआ, तो जश्न स्वाभाविक था. इसे इतिहास का सुधार कहा गया.
दरअसल, आज ही के दिन (7 जनवरी, 2019) भारत ने ऐतिहासिक सीरीज जीत हासिल की थी. सिडनी में खेले गए चौथे टेस्ट के आखिरी दिन लगातार बारिश के कारण खेल संभव नहीं हो सका और इसी के साथ ऑस्ट्रेलिया में भारत की पहली टेस्ट सीरीज जीत तय हुई. बारिश ने भारत को उस जोरदार 3–1 के नतीजे से वंचित कर दिया, जो लगभग तय दिख रहा था. खासकर तब, जब ऑस्ट्रेलिया को घरेलू सरजमीं पर 1988 के बाद पहली बार फॉलो-ऑन खेलने पर मजबूर किया गया था.
इस जीत के बाद भाषा बदल गई. विराट कोहली की टीम को भारत की सर्वकालिक महान टेस्ट टीम बताया जाने लगा. फिटनेस, आक्रामकता, तेज गेंदबाज़ी की गहराई- सब कुछ इस एक सीरीज़ से जोड़ दिया गया.
पुजारा: दीवार, जो नहीं टूटी
इस कहानी के केंद्र में थे चेतेश्वर पुजारा.521 रन, 1258 गेंदें, 30 घंटे क्रीज पर. पुजारा ने ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजों को न सिर्फ थकाया, बल्कि उनकी धार भी कुंद कर दी. यह रन नहीं थे, यह धैर्य का प्रदर्शन था.
जब भावनाएं शांत हुईं, तो एक ठंडा विश्लेषण सामने आया. क्या यह भारत की सबसे कठिन विदेशी जीत थी? या फिर परिस्थितियां भारत के पक्ष में ज्यादा थीं?
वॉर्नर-स्मिथ का सच
सच से शुरुआत जरूरी है. इस पूरी सीरीज में ऑस्ट्रेलिया अपने दो सबसे बड़े स्तंभों- स्टीव स्मिथ और डेविड वॉर्नर के बिना खेल रहा था. सैंडपेपर कांड के बाद लगा प्रतिबंध ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी के लिए गहरा झटका था. आलोचकों के लिए यही निर्णायक तर्क है- भारत ने सर्वश्रेष्ठ ऑस्ट्रेलिया को नहीं हराया.
यह बात सही है, लेकिन अधूरी भी.कमजोर मेजबान को हराना भी आसान नहीं होता. इतिहास गवाह है कि कई टीमें मौके मिलने के बावजूद चूक गई हैं. असली सवाल यह है कि क्या भारत ने सिर्फ फायदा उठाया, या अपनी श्रेष्ठता थोप दी?
पहली बार सीरीज पर पकड़
भारतीय क्रिकेट ने विदेशों में कई महान टेस्ट जीते हैं. 2003 एडिलेड, 2008 पर्थ, 2010 डरबन, 2014 लॉर्ड्स. लेकिन ये जीतें अकेली थीं, सीरीज में बदल नहीं पाईं.
2018–19 अलग था
भारत ने पहला टेस्ट जीता, पर्थ में करारी हार झेली और फिर मेलबर्न में जवाब दिया. यह एक मैच की कहानी नहीं थी, यह निरंतर नियंत्रण की कहानी थी.
मयंक अग्रवाल और हनुमा विहारी की ओपनिंग साझेदारी, लंबी बल्लेबाजी और फिर जसप्रीत बुमराह की घातक गेंदबाजी- भारत हर विभाग में योजना के साथ खेल रहा था.
सिडनी में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को फॉलोऑन कराया- 31 साल में पहली बार.
बारिश न होती, तो स्कोरलाइन 3-1 भी हो सकती थी.
तेज गेंदबाजी: असली फर्क
इस सीरीज की आत्मा भारत की तेज गेंदबाजी थी. बुमराह, शमी और ईशांत- पूरक नहीं, आधार थे. पहली बार भारत विदेश में गेंद से मैच जीत रहा था, बल्लेबाजी के सहारे सिर्फ टिक नहीं रहा था.
पहले की भारतीय टीमें बावजूद गेंदबाजी के जीतती थीं. यह टीम गेंदबाजी की वजह से जीती. यही बदलाव इस जीत को खास बनाता है.
क्या पिचें भारत के अनुकूल थीं?
यह तर्क भी दिया गया कि ऑस्ट्रेलियाई पिचें भारतीय बल्लेबाजों को सूट करती हैं.सच है- यहां उछाल है, लेकिन इंग्लैंड जैसी स्विंग नहीं.पर पिचें जीत नहीं दिलातीं. दक्षिण अफ्रीका को छोड़ दें, तो बाकी टीमें भी इन हालात में असफल रही हैं.
भारत ने अनुशासन से खेला, दबाव में बिखरा नहीं, और योजनाओं पर टिके रहा.
2018–19 बिना 2020–21 संभव नहीं
इस जीत को 'ओवररेटेड' कहने की वजह मैदान से ज्यादा उसका महिमामंडन है. जब किसी जीत को मिथक बना दिया जाता है, तो प्रतिक्रिया आना तय है.
2018-19 कोई चमत्कार नहीं था. यह पहले की पीढ़ियों की उपलब्धियों को छोटा भी नहीं करता. इसकी असली अहमियत कुछ और है.
इसने साबित किया कि भारत का रास्ता सही था- तेज गेंदबाजी, फिटनेस और विदेशी तैयारी.
2020–21 में कोहली के बिना 36 ऑलआउट के बाद भारत ने फिर ऑस्ट्रेलिया में सीरीज जीती. वह जीत कल्पना से नहीं आई थी. उसकी नींव 2018–19 में रखी जा चुकी थी. 2018–19 की ऑस्ट्रेलिया जीत ओवररेटेड नहीं थी. वह आधारशिला थी.उसकी असली कीमत जश्न में नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वास में दिखी, जिसने भारत को अगली बार और भी ऊंचा उठाया.
किंशुक कुसारी