Ravi Pradosh Vrat Katha: रवि प्रदोष व्रत के दिन पढ़ें ये कथा, सभी मनोकामनाएं होंगी पूरी

Ravi Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव का पूजन किया जाता है. जो कोई भी व्यक्ति सच्चे दिल से प्रदोष व्रत करता है भगवान शिव उस व्यक्ति की सभी मनोकामना को पूरा करके उसके सभी दुःख और पाप दूर करते हैं. प्रत्येक माह में दो प्रदोष व्रत होते हैं.

Advertisement
प्रदोष व्रत कथा प्रदोष व्रत कथा

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 10 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 7:00 AM IST

Ravi Pradosh Vrat Katha: शास्त्रों में प्रदोष व्रत भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद प्राप्ति का दिन है. रवि प्रदोष के दिन भगवान सूर्य और भोलेनाथ की विशेष पूजा अर्चना की जाती है जिससे हमें उत्तम स्वास्थ्य का वरदान मिलता है. हर महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है. किसी भी प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा शाम के समय सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक होती है. इस बार रवि प्रदोष व्रत 10 दिसंबर यानी आज मनाया जा रहा है. कहते हैं कि इस दिन प्रदोष व्रत की कथा सुनने से सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं. 

Advertisement

रवि प्रदोष व्रत कथा

स्कंद पुराण की कथा के अनुसार, पुराने वक्त की बात एक गांव में गरीब विधवा ब्राह्मणी और उसका एक पुत्र रहा करते थे. जो भिक्षा मांग कर अपना भरण-पोषण करते थे. एक दिन वह दोनों भिक्षा मांग कर वापस लौट रहे थे तभी उन्हें अचानक नदी के किनारे एक सुन्दर बालक दिखा. विधवा ब्राह्मणी उसे नहीं जानती थी. की वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार, धर्मगुप्त है. और उस बालक के पिता विदर्भ देश के राजा है ,जो की युद्ध में के दौरान मारे गए  थे और उनके सारे राज्य पर दुश्मनों ने कब्जा कर लिया था.

जिसके बाद पति के शोक में धर्मगुप्त की माता का भी निधन हो गया, और अनाथ बालक को देख ब्राह्मण महिला को उसपर बहुत दया आई और वह उस अनाथ बालक को अपने साथ ले आई और अपने बेटे के सामान ही उस बालक का भी पालन-पोषण करने लगी. और फिर एक दिन बुजुर्ग महिला की मुलाकात ऋषि शाण्डिल्य से हुई, उन्होंने उस बुजुर्ग महिला और दोनों बेटों को प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी, और इस प्रकार दोनों बालकों ने ऋषि के द्वारा बताए गए नियमों के अनुसार ब्राह्मणी और बालकों ने अपना व्रत सम्पन्न किया जिसके कुछ दिन बाद ही दोनों बालक जंगल में सैर कर रहे थे तभी उन्हें दो सुंदर गंधर्व कन्याएं दिखाई दी. 

Advertisement

जिनमें से एक कन्या जिसका नाम अंशुमती था उसे देखकर राजकुमार धर्मगुप्त आकर्षित हो गए. और फिर गंधर्व कन्या अंशुमती और राजकुमार धर्मगुप्त का विवाह सम्पन्न हो गया. जिसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने पूरी लगन और मेहनत से दोबारा गंधर्व सेना को तैयार किया, और अपने विदर्भ देश पर वापस लौटकर उसे हासिल कर लिया. और सब कुछ हासिल होने के बाद धर्मगुप्त को यह ज्ञात हुआ की आज उसे जो कुछ भी हासिल हुआ है वो उसके द्वारा किए गए प्रदोष व्रत का फल है, जिसके बाद हिन्दू धर्म में यह मान्यता हो गई कि जो भी इंसान  पूरे विधि-विधान से प्रदोष व्रत करके  व्रत कथा सुनेगा उसके आने वाले हर जन्म में किसी भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा और वो सभी सुखों को भोगने वाला होगा. 

रवि प्रदोष व्रत पूजन विधि

प्रदोष व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाना चाहिए. इसके बाद स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनने के बाद मंदिर या पूजा वाली जगह को साफ कर लें. इस दिन की पूजा में बेल पत्र, अक्षत, धूप, गंगा जल इत्यादि अवश्य शामिल करें और इन सब चीजों से भगवान शिव की पूजा करें. इस व्रत में भोजन बिल्कुल भी नहीं किया जाता क्योंकि यह व्रत निर्जला किया जाता है. इस तरह पूरे दिन उपवास करने के बाद सूर्यास्त से कुछ देर पहले यानी शाम के समय दोबारा स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें. दोबारा पूजा वाली जगह को शुद्ध करें. इसके बाद उत्तर पूर्व दिशा की तरफ मुंह करके कुशा के आसन पर बैठें और भगवान शिव के मंत्र ऊं नमः शिवाय का जाप करते हुए भगवान शिव को जल चढ़ाएं. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement