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धर्म

अंतिम संस्कार का हिंदू तरीका अपनाने को क्यों मजबूर हैं पारसी

aajtak.in
  • 20 दिसंबर 2017,
  • अपडेटेड 11:48 AM IST
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जोरोएस्ट्रिनिइजम (पारसी) दुनिया के सबसे पुराने एकेश्वरवादी धर्मों में से एक है. इसकी स्थापना पैगंबर ज़राथुस्ट्र ने प्राचीन ईरान में 3500 साल पहले की थी. एक हजार सालों तक जोरोएस्ट्रिनिइजम दुनिया के एक ताकतवर धर्म के रूप में रहा. 600 BCE से 650 CE तक इस ईरान का यह आधिकारिक धर्म रहा लेकिन आज की तारीख में पारसी धर्म दुनिया का सबसे छोटा धर्म है. हालांकि पारसी धर्म के सामने केवल घटती आबादी ही एक चुनौती नहीं है...



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पारसी करीब 1000 साल पहले ईरान में इस्लाम के उभार के बीच भागकर भारत आ गए. पारसी भारत के समृद्ध समुदायों में से एक है. पारसी अहुर मज्दा भगवान में विश्वास रखते हैं.

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दुनिया भर में अंतिम संस्कार के कई तरीके अपनाए जाते हैं. जिस तरह हिन्दू और सिख धर्म में शव का दाह-संस्कार किया जाता है, इस्लाम और ईसाई धर्म के लोग शव को दफनाते हैं, वैसे ही पारसी धर्म, जिन्हें भारत के बाहर जोरास्ट्रियन्स धर्म कहा जाता है, को मानने वाले लोग मृतक के शव को गिद्धों का भोजन बना देते हैं.

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पिछले करीब तीन हजार वर्षों से पारसी धर्म के लोग दोखमेनाशिनी नाम से अंतिम संस्कार की परंपरा को निभाते आ रहे हैं. भारत में अधिकांशत: पारसी महाराष्ट्र के मुंबई शहर में ही रहते हैं, जो टॉवर ऑफ साइलेंस पर अपने संबंधियों के शवों का अंतिम संस्कार करते हैं. टावर ऑफ साइलेंस एक तरह का गार्डन है जिसकी चोटी पर ले जाकर शव को रख दिया जाता है, फिर गिद्ध आकर उस शव को ग्रहण कर लेते हैं. अब यह कहा जाने लगा है कि शवों को सुखाने के लिए सौर संकेन्द्रक के उपयोग और उनके मांस को चील-कौए के लिए छोड़ने वाली तमाम प्रक्रियाएं गिद्धों के बगैर पूरी तरह बेकार हो गई हैं.

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पारसी समुदाय के काइकोबाद रुस्तमफ्रैम हमेशा यही सोचते आए थे कि जब वह मरेंगे तो पारसी धर्म की परंपरा के अनुसार गिद्ध उनके शव को ग्रहण करेंगे लेकिन अब भारत के आसमान से यह पक्षी लगभग गायब हो चुका है और ऐसे में पारसियों के लिए अपनी सदियों पुरानी परंपरा को निभाना भी बहुत मुश्किल हो चला है.

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90 साल के काइको ने जब आखिरी सांस ली तो आकाश के गिद्धों के हवाले करने के बजाए उनके शव को जलाकर अंतिम संस्कार संपन्न किया गया. मुंबई में बसे पारसी समुदाय के कई लोग अब दोखमेनाशिनी के बजाए विद्युत दाह गृहों का विकल्प चुन रहे हैं. पारसी समुदाय का सदियों पुराना अंतिम संस्कार का तरीका अब गिद्धों के बिना कारगर नहीं रहा. इस मजबूरी में उन्हें अपनी पुरानी परंपरा को छोड़कर दूसरे धर्मों के तौर-तरीके अपनाने पड़ रहे हैं.

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भारत की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में भारत के ज्यादातर पारसी रहते हैं. रुस्तमफ्रैम की पत्नी खोर्शेद ने अपने पति की मौत के बाद उनका दाह संस्कार किया. वह कहती हैं, जबसे उन्होंने सुना था कि गिद्धों के ना बचने से अंतिम संस्कार का पारसी तरीका अब कारगर नहीं रहा, तब से वह क्रीमेशन (दाह संस्कार) के तरीके से ही अपना अंतिम संस्कार करवाना चाहते थे.

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मुंबई में हर दिन औसतन एक पारसी की मृत्यु होती है. पारसियों के लिए अपनी घटती आबादी के साथ-साथ एक चिंता गिद्धों की घटती संख्या भी है क्योंकि इससे उनके अंतिम संस्कार की परंपरा पर भी खतरा मंडरा रहा है. गिद्धों की घटती संख्या के बीच पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार कराने के पारंपरिक तरीके पर एक नई बहस शुरू हो चुकी है. बॉम्बे पारसी पंचायत के पूर्व ट्रस्टी दीनशॉ टैम्बली कहते हैं, 'कौए और चील मुर्दों में सिवाय चोंच मारने के अलावा कुछ नहीं करते हैं. दखमा में शव करीब 6 से 8 महीने तक गर्मी में पड़े रहते हैं. दखमा के नजदीक बसे लोग दुर्गंध की भी शिकायत करते हैं.'

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सुधारवादी पारसी जहां शवों को जलाए जाने के तरीके से अंतिम संस्कार कराने के पक्ष में हैं वहीं परंपरावादी पारसी आज भी दोखमा के सिवा किसी भी अन्य तरीके को अपनाने के खिलाफ हैं. मुंबई में जोरास्ट्रियन स्टडीज़ इंस्टीट्यूट के संस्थापक जहांगीर पटेल का कहना है कि हजारों खामियों के बावजूद पारसियों को अंतिम विदाई देने का तरीका पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूल है. इससे किसी भी तत्व को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. परंपरावादी पारसी यह भी कहते हैं कि यह तो कुछ ऐसा है जैसे कोई किसी मुस्लिम को यह कहे कि वह अपने परिजन के शव को दफनाए नहीं बल्कि जला दे.

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वहीं, सुधारवादी पारसियों का कहना है कि यह बिल्कुल भी अच्छा विचार नहीं है कि अपने प्रियजनों के शव को महीनों तक ढेर में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाए. समय के साथ पारसियों को भी अपने पारंपरिक तौर-तरीकों में कुछ बदलाव करना ही होगा.

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लेकिन परंपरावादी पारसियों को ये सुधारवादी तर्क बिल्कुल भी मंजूर नहीं हैं. वह पारसियों के शवों को जलाकर अंतिम संस्कार करने को बहुत गलत मानते हैं. एक परंपरावादी विद्वान खोजेस्टे मिस्त्री शवों जोर देकर कहते हैं कि आसमान में शवों का अंतिम संस्कार करना आज भी कारगर है भले ही गिद्धों के बिना यह प्रक्रिया थोड़ी धीमी पड़ गई है. वह इस बात से भी इनकार करते हैं कि टावर ऑफ साइलेंस से दुर्गंध आती है.

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मिस्त्री कहते हैं कि मुर्दों को आसमान में खुले में छोड़ देना पारसियों का एक मात्र तरीका है क्योंकि पारसियों का दृढ़ विश्वास है कि मृत शरीर अशुद्ध होता है. पारसी पर्यावरण प्रेमी भी है इसलिए वह शरीर को जला नहीं सकते हैं क्योंकि इससे अग्नि तत्व अपवित्र हो जाता है. पारसी शवों को दफना भी नहीं सकते हैं क्योंकि इससे पृथ्वी प्रदूषित हो जाती है और पारसी शवों को नदी में बहाकर भी अंतिम संस्कार नहीं कर सकते हैं क्योंकि इससे जल तत्व प्रदूषित होता है. पारसी धर्म में पृथ्वी, जल, अग्नि तत्व को बहुत ही पवित्र माना गया है. जो लोग शवों को जलाकर अंतिम संस्कार करना चाहते हैं, करें लेकिन धार्मिक नजरिए से यह पूरी तरह अमान्य और गलत है.

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वह कहते हैं कि आज भी पारसियों की बड़ी आबादी पारंपरिक तरीके से अंतिम संस्कार करने के पक्ष में है. भले ही शवों के दाह संस्कार करने वालों की संख्या भी बढ़ रही है फिर भी यह समुदाय का एक छोटा हिस्सा ही है.

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पारसी समुदाय की मैगजीन पारसियाना के संपादक जहांगीर पटेल बताते हैं, मुंबई में होने वाले दाह संस्कारों में 15 प्रतिशत पारसियों का दाह संस्कार भी शामिल है. दाह संस्कार का विकल्प चुनने वाले पारसियों की संख्या की बात करें तो यह करीब 45,000 है. प्रेयर हॉल खोले जाने से पहले की तुलना में यह 6 प्रतिशत ज्यादा है.



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सुधारवादी नैवेल सर्टी और उनकी पत्नी ने पहले से ही अपने बच्चों को अपनी इच्छा बता दी है कि उनका अंतिम संस्कार जलाकर ही किया जाए. उनका कहना है कि वे केवल व्यावहारिक बात कर रहे हैं. वे कहते हैं, 'अगर गिद्ध अब भी आसमान में उड़ रहे होते तो बात अलग थी लेकिन अब शरीर के अंतिम संस्कार का यही तरीका सबसे सही है.'

(तस्वीरें: रॉयटर्स)

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