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धर्म

बरसाने में मनाई गई लट्ठमार होली, इस वजह से पुरूषों को पड़ती हैं लाठियां

मंजू ममगाईं/aajtak.in
  • 19 मार्च 2019,
  • अपडेटेड 2:47 PM IST
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राधा नगरी बरसाने में विश्वप्रसिद्ध लट्ठमार होली इस बार 16 मार्च को मनाई गई. हर बार की तरह इस बार भी यहां की होली को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक पहुंचे हुए थे. यहां पहुंचे लोग खुद को यहां बजने वाले होली गीतों पर थिरकने से रोक नही पाए। होली का असली मजा तो तब आया जब चटख रंग के लहंगे पहनकर लंबे घूंघट में महिलाओं ने पुरूषों पर लाठियां बरसानी शुरू की. आइए जानते हैं आखिर कैसे हुई लट्ठमार होली खेलने की शुरूआत.

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रंग से होली तो सभी खेलते हैं लेकिन ब्रज की होली की बात ही निराली है. यहां होलाष्टक लगते ही होली का जश्न शुरू हो जाता है. ब्रज में होली को कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़ कर देखा जाता है. होली में हिस्सा लेने के लिए नंदगांव के पुरूष और बरसाने की महिलाएं भाग लेती हैं. इस उत्सव को मनाने के पीछे बताया जाता है कि कृष्ण नंदगांव के थे और राधा बरसाने की थीं.

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नंदगांव से जब पुरूषों की टोलियां पिचकारियां लेकर बरसाना की महिलाओं को भिगोने पहुंचती हैं तो वहां कि महिलाएं उन पर खूब लाठियां बरसाती हैं. पुरुषों को इन लाठियों से बचना होता है और साथ ही महिलाओं को रंगों से भिगोना होता है. लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है.

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लट्ठमार होली खेलने की शुरुआत भगवान कृष्ण और राधा के समय से हुई थी. हिंदू मान्यता के अनुसार कृष्ण अपने मित्रों के साथ होली खेलने बरसाना जाया करते थे, लेकिन राधा और उनकी सखियों के साथ ठिठोली करने की वजह से राधा उनसे नाराज होकर अपनी सभी सखियों के साथ मिलकर ग्वालों पर डंडे बरसाया करती थीं. उनके लाठियों के वार से बचने के लिए कृष्ण और उनके दोस्त ढालों और लाठी का प्रयोग करते थे. वक्त के साथ होली खेलने का ये तरीका धीरे-धीरे परंपरा बन गया. इस होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग बरसाना आते हैं.

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होली खेलने के लिए पहले दिन वृंदावन के लोग बरसाना की महिलाओं के साथ होली खेलने आते हैं. इसके बाद अगले दिन ही बरसाना के पुरूष वृंदावन की महिलाओं के संग होली खेलने जाते हैं.

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ये होली बरसाना और वृंदावन के मंदिरों में खेली जाती है. लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि होली में हिस्सा लेनी वाली ये महिलाएं अपने गांव के लड़को के साथ भी इसी तरह होली खेलती हैं तो ऐसा बिलकुल नहीं है. ये औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं.

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बरसाने की लट्ठमार होली.

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बरसाने की लट्ठमार होली.

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