Basant Panchami 2026: बसंत पंचमी पर दिल्ली में निजामुद्दीन की दरगाह पर क्यों चढ़ाई जाती है पीले रंग की चादर? जानें...

Basant Panchami 2026:बसंत पंचमी को वसंत ऋतु की शुरुआत माना जाता है और पीला रंग इस ऋतु का प्रतीक है. यही कारण है कि इस दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है. दिल्ली की निज़ामुद्दीन दरगाह पर यह परंपरा करीब 700–800 साल पुरानी मानी जाती है.

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दिल्ली की दरगाह पर बसंत पंचमी के दिन चढ़ाई जाती है पीली चादर दिल्ली की दरगाह पर बसंत पंचमी के दिन चढ़ाई जाती है पीली चादर

चंद्र प्रकाश कुमार

  • नई दिल्ली,
  • 22 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:12 PM IST

Basant Panchami 2026: माघ के महीने में शुक्ल पक्ष के शुरुआती 5वें दिन को बसंत पंचमी कहा जाता है और बसंत पंचमी सुनते ही हमारे और आपके दिमाग में एक ही चीज याद आती है और वो है सरस्वती पूजा , क्योंकि इस दिन सनातन धर्म को मानने वाले लोग विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा करते हैं. इस पूजा को अक्सर पढ़ने वाले विद्यार्थी और पढ़ाने वाले शिक्षक अपने गुरुकुल और शैक्षणिक संस्थानों में बड़े धूम धाम से मनाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे देश की राजधानी दिल्ली में मुस्लिम समुदाय के लोग भी बसंत पंचमी को एक त्योहार के रुप में मनाते हैं. जी हां राजधानी दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया के दरगाह पर बसंत पंचमी के दिन मुसलमानों की तरफ से इसे एक त्योहार के रुप में मनाया जाता है. जिसमें दूर-दराज से आए हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग हर्षों उल्लास के साथ इस  त्योहार में शिरकत करते हैं. 

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बसंत पंचमी के दिन हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर हिंदू मुस्लिम एकता, अखण्डता और भाईचारे के साम्प्रदायिक सौहार्द का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है क्योंकि इस दिन दोनों समुदाय के लोग पीले फूलों की होली खेलकर माहौल को गंगा-जमुनी तहजीब से सराबोर कर देते हैं. इस दिन हजरत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की मजार पर पीले रंग की चादर चढ़ाई जाती है और दरगाह को पीले रंग के फूलों से सजाया जाता है. अक्सर हम देखते हैं कि दरगाहों पर हरे रंग की चादर और गुलाब के फूल चढ़ाया जाता है लेकिन इस दिन यहां पर पीले रंग की चादर के साथ साथ पीले रंग के गेंदे के फूल चढ़ाए जाते हैं.

आखिर क्यों खास है ये परंपरा?
इतिहासकारों  के अनुसार ये परंपरा लगभग 700 से 800 साल पुरानी है.  इसके पीछे एक बेहद ही दिलचस्प कहानी है. कहा जाता है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया की कोई संतान नहीं थी और वो अपने बहन के लड़के यानी अपने भांजे को ही अपनी संतान मानते थे और हजरत औलिया को अपने भांजे तकिउद्दीन से बहुत लगाव था लेकिन किसी गंभीर बीमारी के कारण औलिया के भांजे की मृत्यु हो गई. इसके बाद से  हजरत निजामुद्दीन काफी उदास रहने लगे. उनके चेहरे से मानो एक दम से मुस्कान ही चली गई. औलिया की ये हालत देखकर उनके अनुयायी (शिष्य) अमीर खुसरो भी बेहद परेशान रहने लगे. अमीर मन ही मन ये सोचता रहता था कि आखिर कुछ ऐसा करिश्मा हो जाए जिससे हमारे गुरु के चेहरे पर मुस्कान आ जाए.

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अमीर खुसरो ने की थी शुरुआत

एक दिन खुसरो ने कुछ महिलाओ को पीले रंग के वस्त्र पहने हुए और सरसों के पीले फूलों के साथ हंसते खेलते और गाते हुए देखा. तभी खुसरो ने उन महिलाओं से पूछा कि आप पीले रंग के कपड़ों में इतने खुश क्यों हो और क्या करने जा रहे हो? तो उन महिलाओं ने कहा कि हम पीले वस्त्र पहनकर मंदिर में अपने भगवान को पीला फूल चढ़ाने जा रहे हैं. जिसके बाद खुसरो ने पूछा कि क्या ऐसा करने से भगवान खुश होते हैं तो उन महिलाओं ने कहा कि हां भगवान खुश होते हैं.जिसके बाद अमीर उन महिलाओं की बातों से प्रेरित होकर हजरत निजामुद्दीन को खुश करने के लिए पीली साड़ी पहनकर और सरसों के पीले फूल लेकर हजरत निजामुद्दीन के पास पहुंच गया और 'सकल बन फूल रही सरसों’ गाते हुए नृत्य करने लगे. खुसरो को इस तरह नृत्य करते हुए और गाते हुए देख हजरत निजामुद्दीन मुस्कुराने लगे और तभी से देश की राजधानी दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन के दरगाह पर बसंत पंचमी का पर्व मनाया जाने लगा.

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