कोई भी चुनाव राजनीति में एक दिलचस्प जंग की तरह है. जैसा कि दिल्ली विधानसभा चुनाव ने एक बार फिर दिखाया है कि जंग लड़ने और जीतने का सबसे अच्छा तरीका एक ठोस रणनीति बनाना और उसे जंग के मैदान में सटीकता और दक्षता के साथ लागू करना है. एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी ने संकेत दिया है कि जब ठोस रणनीति को लागू करने की बात आती है, तो नरेंद्र मोदी युग में बीजेपी का कोई मुकाबला नहीं है.
साल 1998 से ही 'दिल्ली दूर अस्त' पार्टी के लिए एक गंभीर चेतावनी बन गया था. अमित शाह की ओर से चलाए जा रहे चुनावी महासमर के दौरान भी दिल्ली में चुनावी जीत बीजेपी के लिए एक मायावी सपना बनी रही, क्योंकि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी यहां लगातार शानदार जीत दर्ज कर रही थी.
वोट शेयर में 15% इजाफे का टारगेट
लगातार चुनावी हार झेलने के बाद बीजेपी असमंजस में थी. क्योंकि लोकसभा चुनाव में दिल्ली के करीब 55 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को चुना था. लेकिन जब विधानसभा चुनाव की बात आती है, तो इस ग्रुप का 15 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा AAP की ओर चला जाता है. यही दुविधा बीजेपी की रणनीति का आधार बनी और इसी 15 प्रतिशत वोट को पार्टी के साथ बने रहने के लिए राजी करने में बीजेपी जुट गई. दूसरे तरीके से देखें तो रणनीति सीधी थी कि AAP के वोट शेयर में करीब 10 प्रतिशत की कमी लाना और बीजेपी के वोट शेयर को इसी अनुपात में बढ़ाना.
कागज़ पर किसी के पास भी एक ठोस रणनीति हो सकती है. उदाहरण के लिए, कांग्रेस की रणनीति दिल्ली में राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए डबल डिजिट का वोट शेयर हासिल करना था. 54 प्रतिशत वोट शेयर (जैसा 2015 और 2020 में) सुनिश्चित करने की AAP की रणनीति काफी हद तक बरकरार रही. फिर भी दोनों विफल रहे जबकि दिल्ली में बीजेपी की रणनीति जादू की तरह काम आई. कुछ लोग मोदी-शाह के साथ अन्य नेताओं की रणनीति को श्रेय देने से इनकार करते हैं. लेकिन 2014 के बाद से देशभर में कई चुनावों में मिली जीत किसी भी निष्पक्ष टिप्पणीकार के लिए राजनीतिक दलों को बीजेपी द्वारा अपनाई गई रणनीति को फॉलो करने की सलाह देने के लिए मजबूर करेगी.
साल 2024 के लोकसभा चुनावों में वोटर्स ने बीजेपी को कम सीटें देकर सचेत किया था और इसके एक साल से भी कम समय में कहानी कैसे बदल गई. तब से बीजेपी तीन असंभव लगने वाली जीत हासिल की हैं जिनमें हरियाणा, महाराष्ट्र और अब दिल्ली शामिल है. वहीं, झारखंड में हार ने बीजेपी को याद दिलाया है कि कोई भी व्यक्ति या संगठन अचूक नहीं है.
बीजेपी ने एक-एक कर बढ़ाए कदम
सफल रणनीति के लिए कुछ चीजों की जरूरत होती है. जैसे सही समय पर इस्तेमाल किए जाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, सैनिकों, जनरलों और स्टाफ अधिकारियों का एक अनुशासित और प्रतिबद्ध समूह, युद्ध चरम पर होने के दौरान आश्चर्यजनक हथियारों का इस्तेमाल और तैनाती. सबसे महत्वपूर्ण बात, रणनीति को तुरंत बदलने की क्षमता.
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दिल्ली विधानसभा चुनावों में इन सभी फैक्टर्स ने मिलकर अच्छी तरह से काम किया. वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता बीजेपी के लिए लंबे समय से कोई चुनौती नहीं रही है. जरूरत पड़ने पर इसके पास किसी भी प्रतिद्वंद्वी से ज्यादा खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा है. लेकिन जैसा कि भाजपा को चुनावों में मिली कुछ असफलताओं, खासकर 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान मिली असफलताओं से पता चला है, चुनाव जीतने के लिए बहुत सारा पैसा खर्च करना पर्याप्त नहीं है.
सहयोगी संगठनों को काम पर लगाया
सफल रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है प्रतिबद्ध सैनिकों को तैनात करने की क्षमता. यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां कोई भी अन्य पार्टी संघ परिवार के संसाधनों और जनशक्ति का उपयोग करने वाली बीजेपी की क्षमता से मेल नहीं खा सकती. 2024 के लोकसभा कैंपेन की तैयारी में अहंकार से भरे दिन बहुत पहले चले गए हैं. जब पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अनजाने में यह धारणा दी थी कि भविष्य के लिए तैयार इस बीजेपी को RSS के कैडर की ज़रूरत नहीं हो सकती है.
हरियाणा, महाराष्ट्र और अब दिल्ली में नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से सुनिश्चित किया कि नाराज़ कार्यकर्ता सड़कों पर वापस आएं, दरवाज़े खटखटाएं, बूथों पर जाएं और विश्वास बनाए रखते हुए संदेश को चुपचाप फैलाएं. दिल्ली के इस कैंपेन में ऐसा लगता है कि आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने छोटे-छोटे समूहों के साथ 50 हजार से ज़्यादा संवाद सेशन आयोजित किए हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बजरंग दल, भारतीय मज़दूर संघ और अन्य सहित संघ परिवार के सभी अन्य संगठनों को अपने टारगेट ग्रुप पर लगातार फोकस रखने का काम सौंपा गया था.
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यह सुनिश्चित करने के लिए कि संगठन अपने मकसद को भटक न जाए, बीजेपी ने एक अच्छी तरह से तैयार टीम की तरह, अपने नेताओं को पहले से तय क्षेत्रों में ले जाने के लिए स्टाफ अधिकारियों को तैनात किया. बजरंग दल जैसे संगठन का संचालन करने वाले लोगों को पता था कि इस संगठन की उपस्थिति और बयानबाजी कहां काम करेगी और कहां यह उलटी पड़ सकती है. बीएमएस के सदस्यों को कारखानों और अन्य मजदूरों से भरे क्षेत्रों में तैनात किया गया था जो अरविंद केजरीवाल के कट्टर समर्थक बन गए थे.
बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं की रैलियां
इसी तरह रोजाना कम से कम एक दर्जन वरिष्ठ बीजेपी नेता दिल्ली में सक्रिय रूप से प्रचार कर रहे थे, जुलूसों का नेतृत्व कर रहे थे, रैलियां आयोजित कर रहे थे और कई बैठकों को संबोधित कर रहे थे. दिल्ली एक शहर होने के कारण भाजपा के लिए यह काम आसान हो गया था. प्रचार के दौरान यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, तेलंगाना, तमिलनाडु और ओडिशा के बड़े बीजेपी नेता अलग-अलग इलाकों में प्रचार करते रहे थे. सफल रणनीति का एक बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व वह चपलता है जिसके साथ सेना के शीर्ष अधिकारी उग्र युद्ध के बीच रणनीति बदल सकते हैं. इसी तरह कैंपेन के शुरुआती चरण के दौरान, भाजपा का ध्यान अरविंद केजरीवाल और उनके कथित 'शीश महल' के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर था और यह पार्टी का मुख्य फोकस बन गया.
'शीश महल' से शिफ्ट किया फोकस
लेकिन जनवरी की शुरुआत में ही सर्वे और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से आंतरिक फीडबैक आना शुरू हो गया कि भ्रष्टाचार के आरोप निम्न वर्ग और गरीब मतदाताओं को प्रभावित करने में विफल रहे हैं जो AAP के प्रति प्रतिबद्ध और वफादार बने हुए हैं. फीडबैक साफ था कि सिर्फ केजरीवाल और AAP को भ्रष्ट करार देने से भाजपा के वोट शेयर में 10 प्रतिशत की वृद्धि नहीं होने वाली थी. कुछ ही दिनों में रणनीति बदल गई और ध्यान सड़क-पानी जैसे मुद्दों पर चला गया. बेशक, कुछ नेताओं ने 'शीश महल' की बयानबाजी जारी रखी. लेकिन कार्यकर्ताओं और नेताओं दोनों ने सड़कों की खराब हालत, कूड़े के ढेर, खुली पड़ी सीवर लाइन, साफ पानी की कमी, यमुना में प्रदूषण जैसे मुद्दों को उठाना शुरू कर दिया.
साथ ही जमीनी और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं ने यह मैसेज फैलाया कि कैसे एमसीडी पर AAP का कंट्रोल है. दिल्ली के नागरिक लंबे समय से परेशान थे और हालात ऐसे हो गए थे कि बेचैनी गुस्से में बदल रही थी. यह गुस्सा निम्न वर्ग के वोट के एक हिस्से को भाजपा की ओर मोड़ने के लिए पर्याप्त था. जैसा कि अंतिम वोट शेयर टैली से पता चलता है, बीजेपी ने AAP पर लगभग तीन प्रतिशत वोट शेयर की बढ़त हासिल की, जो इस उबलते गुस्से के कारण कुछ मिडिल क्लास वोटर्स की भी वफादारी बदलने का नतीजा था.
'इनकम टैक्स में छूट का ब्रह्मास्त्र'
आखिर में एक सफल रणनीति का मतलब यह भी है कि सेना के शीर्ष अधिकारियों के पास युद्ध के चरम के दौरान इस्तेमाल करने के लिए एक गुप्त और घातक हथियार हो. इस अंतिम हमले के लिए नरेंद्र मोदी की ओर से चुनी गईं सेनापति निर्मला सीतारमण थीं. समय अनुकूल था क्योंकि दिल्ली में वोटिंग केंद्रीय बजट के एक सप्ताह से भी कम समय बाद होने वाली थी. बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती, जैसा कि लोकसभा चुनावों के दौरान भी देखा गया, मिडिल क्लास वोटर्स में निराशा और मोहभंग की भावना थी. सर्वे में सी-वोटर ने इस धारणा को उजागर किया कि मिडिस क्लास अपने जीवन स्तर से खुश नहीं था और अपने भविष्य के बारे में बहुत आशावादी नहीं था. फिर भी भाजपा के इस वोट बेस को चुनावों के दौरान बड़ी संख्या में सामने आने की जरूरत थी.
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वित्त मंत्री सीतारमण की ओर चलाया गया ब्रह्मास्त्र इनकम टैक्स था, जिसमें 1 लाख रुपये प्रति माह तक कमाने वाले सभी नागरिकों को इनकम टैक्स में पूरी छूट देना था. यह दिल्ली में एक सपने के पूरे होने जैसा था, जहां लाखों लोग केंद्रीय और राज्य सरकारों के साथ-साथ निजी क्षेत्र में सैलरी क्लास के तौर पर काम करते हैं. टैक्स छूट ने उन्हें उत्साहित किया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि भाजपा का वोट शेयर 10 प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य काफी हद तक हासिल हो गया.
अगर बाकी सियासी दल दिल्ली चुनाव से यह नहीं सीखते कि सटीक रणनीति कैसे बनानी है और उसे कैसे लागू करना है, तो वे बीजेपी को अपने ऊपर हावी बना रहने देंगे. जिस बजट में इनकम टैक्स छूट की घोषणा की गई थी, उसी में बिहार के लिए भी कई तरह की सौगातें थीं. दिल्ली में अब चुनाव खत्म हो चुका है. बीजेपी की चुनावी मशीनरी अब नवंबर 2025 में बिहार में अपनी सत्ता कायम रखने की रणनीति पर काम कर रही है.
यशवंत देशमुख / सुतानु गुरु