घर पहुंची थी इस कारसेवक की मौत की खबर...लेकिन 15 दिन बाद जिंदा लौटे; गोकुल सिंह ने सुनाई 1992 की दास्तां

अपनी मौत की खबर के 15 दिन बाद अपने घर जिंदा लौट कर आए कारसेवक गोकुल सिंह परमार आज पूरे 67 साल के हो चुके हैं. ऐसे में रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा के मौके पर वे 6 दिसंबर के उस दिन को याद करते हैं, जब उन्होंने कारसेवा करते हुए अपने साथियों के साथ बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिरा दिया था.

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कारसेवक गोकुल सिंह परमार. कारसेवक गोकुल सिंह परमार.

हेमंत शर्मा

  • भिंड ,
  • 15 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 5:54 PM IST

बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से लेकर विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन नेता जयभान सिंह पवैया तक के भाषण से कारसेवकों में जोश पैदा नहीं हुआ था, लेकिन जब सातवें नंबर पर साध्वी ऋतंभरा ने अपना भाषण दिया तो कारसेवकों की भुजाएं फड़कने लगीं और कारसेवा शुरू हो गई. अपनी मौत की खबर के 15 दिन बाद अपने घर जिंदा लौट कर आए कारसेवक गोकुल सिंह परमार आज पूरे 67 साल के हो चुके हैं. ऐसे में रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा के मौके पर वे 6 दिसंबर के उस दिन को याद करते हैं, जब उन्होंने कारसेवा करते हुए अपने साथियों के साथ विवादित ढांचे को गिरा दिया था, लेकिन इससे पहले गोकुल सिंह परमार के साथ जो कुछ हुआ वह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था.

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मां से छिपकर ट्रक में सवार होकर घर से निकले थे गोकुल 

गोकुल सिंह ने अपने जीवन के बारे में इस बात का जिक्र किया कि वह 1990 का साल था, जब कारसेवकों को अयोध्या बुलाया जा रहा था. उनकी रगों में नया खून था और नया जोश था, इसलिए वह भी अयोध्या जाना चाहते थे. पिता का तो पहले ही देहांत हो चुका था, लेकिन घर में मौजूद मां लोच कुंवर ने जाने से रोका, पर बेटा तो दृढ़ संकल्प करके बैठे हुआ था था, इसलिए रात के अंधेरे में अपनी मां की नजरों से बचकर घर से पैदल ही अयोध्या के लिए निकल पड़े. गांव से कुछ दूर जाने पर सोनी गांव के पास उन्हें एक ट्रक मिल गया, जिसके बाद वे ट्रक में सवार हो गए और भिंड की सीमा से लगे चंबल नदी के पुल पर पहुंच गए.

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गोलियों और आंसू गैस से बचने के लिए चंबल में उतर गए थे 

जिस वक्त गोकुल सिंह चंबल नदी पर पहुंचे, उस वक्त सैकड़ों की संख्या में कारसेवक चंबल पुल पर मौजूद थे, लेकिन इसके साथ ही इन कारसेवकों को उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने से रोकने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस वाले भी चंबल पुल पर तैनात थे. पुलिस वालों ने चंबल पुल पर एक दीवार भी बना रखी थी. जब कारसेवक आगे की ओर बढ़े तो पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू कर दिया, आंसू गैस के गोले छोड़े और गोलियां भी चलने लगीं. पुलिस से बचने के लिए गोकुल सिंह अपने साथियों के साथ चंबल नदी में उतर गए. गोकुल सिंह ने बताया कि इस दौरान एक कारसेवक को गोली भी लगी थी. जब गोकुल सिंह चंबल में पानी पी रहे थे तो उनके सामने ही आंसू गैस का एक गोला आकार गिरा, इसके बाद उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया और गाड़ी में बिठाकर कानपुर की नौबस्ता जेल ले गए.

लेकिन गोकुल सिंह जिंदा वापस लौटे 

गोकुल सिंह को नौबस्ता जेल में 13 दिन तक बंदी बनाकर रखा गया, इसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया. गोकुल सिंह ट्रेन में सवार होकर अपने घर आ रहे थे तभी ट्रेन बाराबंकी स्टेशन पर रुकी. गोकुल सिंह बताते हैं कि यहां पर दूसरे समुदाय के व्यक्ति ने कोलकाता निवासी एक कार्यकर्ता पर तलवार से हमला करके उनका हाथ काट दिया था. इसके बाद कारसेवकों ने हमलावर का पीछा करते हुए उसको सबक सिखाया, लेकिन इतने में हमलावर के समर्थकों की भीड़ जमा हो गई जिसके बाद सभी कारसेवक वापस लौटकर ट्रेन में आ गए और ड्राइवर से जल्दी ट्रेन चलवा कर हमलावरों से पीछा छुड़ाया. गोकुल सिंह जब घर पहुंचे तो सभी लोग हैरान रह गए. गोकुल सिंह की मां और पत्नी समेत मोहल्ले के लोग खुशी से झूम उठे. गोकुल सिंह ने जब उनकी खुशी का कारण पूछा तो परिजनों ने बताया कि उन्हें इस बात का पता लगा था कि अयोध्या में पुलिस की गोलियों से उनकी जान चली गई है इसलिए घर पर रिश्तेदार फेरा करने आने लगे थे, लेकिन गोकुल सिंह के जिंदा वापस लौटने पर सभी काफी खुश हुए.

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1992 में अयोध्या में फिर एकजुट हुए थे कारसेवक 

गोकुल सिंह बताते हैं कि साल 1992 में एक बार फिर से सभी कार्यकर्ताओं को अयोध्या पहुंचने का फरमान आया. इसके बाद वे अपने एक अन्य साथी पुरुषोत्तम दास के साथ अयोध्या पहुंच गए. गोकुल सिंह ने बताया कि अयोध्या में आरएसएस द्वारा कारसेवक पुरम बसाया गया था, जहां रात भर हजारों की संख्या में कारसेवक ठहरे और इसके बाद 6 दिसंबर की सुबह अनाउंसमेंट करके सभी कारसेवकों से कहा गया कि सभी लोग सरयू नदी में स्नान करने के बाद वहां से रेत लेकर आएं और चबूतरे के पास उसे डाल दें.

आडवाणी और पवैया रहे बेअसर तो ऋतंभरा के भाषण ने भर दिया जोश 

गोकुल सिंह बताते हैं कि मंच सजा हुआ था और मंच पर लालकृष्ण आडवाणी समेत जयभान सिंह पवैया एवं अन्य नेता मौजूद थे. सभी लोग भाषण देकर कारसेवकों में जोश भर रहे थे लेकिन कारसेवकों में जोश नहीं आ रहा था, तभी सातवें नंबर पर साध्वी ऋतंभरा ने अपना भाषण शुरू किया और ऋतंभरा का भाषण सुनते ही कार्यकर्ताओं की भुजाएं फड़कने लगीं. गोकुल सिंह ने बताया कि जैसे ही ऋतंभरा ने कहा, "जिस हिंदू की भुजा ना फड़के, खून ना खौले सीने का, वह भारत मां का लाल नहीं, वह होगा किसी कमीने का", यह सुनते ही कार्यकर्ता जोश में भर गए और 'जय जय श्री राम' के नारे लगाते हुए बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को तोड़ने के लिए टूट पड़े.

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गोकुल सिंह की आंखों के सामने ही पुरुषोत्तम दास की चली गई थी जान 

गोकुल सिंह ने बताया कि जब सभी कारसेवक बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिरा रहे थे तभी भिंड से उनके साथ गए उनके साथी पुरुषोत्तम दास पर गुंबद का एक हिस्सा आकर गिरा, जिससे वह लहू लुहान हो गए. उन्हें एंबुलेंस में रखकर तुरंत फैजाबाद ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी. इसके बाद पुरुषोत्तम दास का सरयू नदी के तट पर अयोध्या में ही अंतिम संस्कार किया गया.

अब हमारा जीवन धन्य हो गया 

22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है. यह खबर इन दोनों गोकुल सिंह लगातार टीवी पर देख रहे हैं. गोकुल सिंह का कहना है कि यह दिन देखने के लिए ही हम जीवित हैं. उन्होंने कहा कि अब हमारा जीवन धन्य हो गया है, हमने इसी काम के लिए जन्म लिया था जो अब पूरा हो रहा है.

आज मां जिंदा होती तो रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा को देखकर खुश होती 

गोकुल सिंह के दो बेटे और एक बेटी है. बड़े बेटे का नाम जंडेल सिंह है और छोटे बेटे का नाम शिवराज सिंह है, जबकि बेटी का नाम कल्पना है. बेटी की शादी हो चुकी है और वह अपनी ससुराल में है जबकि दोनों बेटे अपने पिता गोकुल सिंह के साथ हैं. रामलला की प्रतिष्ठा के बारे में जब गोकुल सिंह के बेटे शिवराज सिंह से बात की गई तो उन्होंने बताया कि उनकी मां विमला देवी दो बार उस वक्त रामलला के दर्शन करने पहुंची थीं, जब टेंट में रामलला की मूर्ति रखी हुई थी, अब अगर आज उनकी मां जिंदा होती तो वह रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा को देखकर बेहद खुश होतीं. 

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