प्रेम कहानीः ये रिश्ता क्या कहलाता है

उम्र कैसे गुज़र जाती है पता ही नहीं चलता. 25 साल बाद आज उसे देख रहा था. अखबार में तस्वीर छपी थी. वैसे ही थी. गोल चेहरा. भरे-भरे गाल. उनमें पड़ते डिंपल. आंखें काफी बड़ी हैं उसकी.

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प्रतीकात्मक चित्र [ GettyImages ] प्रतीकात्मक चित्र [ GettyImages ]

संजीव पालीवाल

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  • 09 अगस्त 2021,
  • अपडेटेड 3:27 PM IST

उम्र कैसे गुज़र जाती है पता ही नहीं चलता. 25 साल बाद आज उसे देख रहा था. अखबार में तस्वीर छपी थी. वैसे ही थी. गोल चेहरा. भरे-भरे गाल. उनमें पड़ते डिंपल. आंखें काफी बड़ी हैं उसकी. अब चश्मा नहीं लगाती है. शायद कॉटेक्ट लेंस लगाने लगी होगी. मुस्कुराती थी तो साथ खिलखिलाने का मन करता था.

बहुत लंबा वक्त गुज़ारा था उसने माया के साथ. पहली बार मैथ्स की क्लास में उसे देखा था. सबसे आगे की सीट पर बैठी थी. माया को सब कुछ आता था. मैं और रवि भी इत्तिफाक से आगे ही बैठे थे. हमें कुछ नहीं आता था. हम दोनों कुछ बात कर रहे थे, तो टीचर ने टोक दिया.

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हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और क्लास से उठ कर बाहर निकल आये. टीचर हमें भौचक्का देखता रह गये. वैसे हैरान तो हर कोई था कि इतने बदतमीज़ लड़के कौन हैं, जो बीच क्लास से उठ कर जा रहे हैं. खैर उस दिन के बाद हम कभी क्लास में नहीं गये. लेकिन माया में हमारा मन लग गया था.

हमने उस दिन माया के क्लासेज के खत्म हो जाने का इंतज़ार किया. फिर धीरे से अपनी साईकिल उसके रिक्शे के पीछे लगा दी. पहले ही दिन हमारे हाथ में उसके घर का न केवल पता था, बल्कि हम जानते थे कि उसका घर कहां है.

अब यह हमारा नियम बन था कि हर रोज़ हम उसके घर से निकलने का इतज़ार करते. एक दूरी बनाकर उसके पीछे-पीछे चलते रहते. माया भी धीरे-धीरे यह जान गयी थी कि हम उसके पीछे-पीछे चलते हैं. उसे हमारे साथ चलने से कोई दिक्कत है, ऐसा उसने कभी ज़ाहिर नहीं किया.

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एक दिन हमें पता चला कि माया ट्यूशन पढ़ने जाने लगी है. थोड़ी ही देर में हमने पता लगा लिया कि वह रिज़वी साहब के यहां पढ़ने जाती है. मैं और रवि भी ट्यूशन पढ़ने लगे. यह कुदरत का ही खेल था कि रिज़वी साहब ने हमें उसी बैच में बुलाया जिसमें माया जाती थी.

पहले दिन हमें देख कर माया चौंकी तो थी. लेकिन धीरे से एक मुस्कुराहट उसके चेहरे पर आयी थी. वह जानती थी कि हम उसी के लिये रिज़वी साहब के यहां आये हैं. पढ़ाई हमारी प्रॉयोरिटी नहीं है. खैर हम ट्यूशन में साथ पढ़ने लगे और ट्यूशन खत्म होने के बाद हम सब गली से निकल कर रोड तक पैदल आते. वहां से माया रिक्शा लेकर चली जाती. हम अपनी साईकिल पर धीरे-धीरे उसके पीछे चलते रहते. दरअसल अब हमें पीछा करने की ज़रूरत नहीं थी. उसका घर हमारे रास्ते में ही था. तो हम सेफ थे.

लेकिन हर शाम मैं और रवि दोनों घर से पैदल निकलते थे. माया के घर तक जाते थे. माया का घर शहर के सबसे बड़े बाजार की एक गली में था. तो बाज़ार में घूमने का अपना आंनद था. हमारी हरदम कोशिश यही होती कि अगर माया किसी काम से निकलेगी तो बाज़ार में देखने को मिल जायेगी.

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दो साल तक यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहा. रवि को लगता था कि मुझे माया से प्यार है. मैं मानना रहा कि रवि को माया से मुहब्बत है. पर हम दोनों दोस्ती की खातिर एक-दूसरे का साथ देने का फर्ज़ अदा कर रहे हैं. हम दोनों एक-दूसरे से यही सवाल करते रहे कि आखिर हम क्यूं माया के आगे पीछे घूमते रहते हैं.

इतना वक्त गुज़ारने के बाद भी माया और हमारे बीच अब तक कोई बातचीत नहीं हुई थी. जबकि हम रोज क्लास जाते थे और बगैर कोई बातचीत किये उठ जाते थे. फिर अपना-अपना रास्ता पकड़ लेते थे. एक रोज़ मैं और माया बराबर यानी अगल-बगल बैठे हुए थे. मुझे लगा कि मेरा पैर किसी से टकरा गया है. मैंने डर कर अपना पैर दूर कर लिया. फिर थोड़ी देर बाद लगा कि किसी का पैर टकराया है. वह पैर माया का था. उस दिन हम लोग कुछ ज़्यादा करीब बैठे थे. हम दोनों के पैर टकरा रहे थे. माया को कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन मैं अचकचा रहा था. मैं बार-बार पोजीशन बदल लेता था कि मेरे पैर ना टकरायें. मैं समझ रहा था कि वह मेरी उलझन का आनंद ले रही है. उसने अपना पैर हटाने की कोई कोशिश नहीं की. वह इत्मीनान से ट्यूशन पढ़ती रही. मैं भटकता रहा.

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फिर अचानक कई दिन तक माया ट्यूशन पढ़ने और कॉलेज नहीं आयी. तो हम परेशान हो उठे. आस पड़ोस से पता किया तो उसकी कहानी जानकार हमारे आश्चर्य की सीमा ना रही. पता चला कि माया का एक बॉय फ्रेंड है. उसका एक्सीडेंट हो गया है. वह दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में भर्ती है. माया इस बात से परेशान है. कई दिनों से वह अपने घर से नहीं निकली थी.

माया का बाय फ्रेंड है, यह बात हमारे गले से ही नहीं उतर रही थी. ज़ाहिर है हम यह बात स्वीकार करने को तैयार नहीं थे. हमें लगता था कि माया को हमसे प्यार होगा. वह हमारे प्रति आकर्षित होगी. और यहां माया....

मैं और रवि दोनों ही उस दिन काफी देर तक पैदल घूमते रहे. हमारे बीच चर्चा सिर्फ माया की थी, उस लड़के की थी जिससे माया प्यार करती थी.  लड़के का पता हम लगा चुके थे. दोनों की जाति अलग थी. माया बनिया थी तो उसका प्रेमी ब्राह्मण था. वैसे मैं और रवि दोनों ही ब्राह्मण हैं. इसलिए फिलहाल हमारे लिये तसल्ली की बात बस यही थी कि चलो हमें न सही, कम से कम माया ने अपना दिल एक ब्राह्मण को ही दिया था.

लगभग हफ्ते भर के बाद माया दमकती हुई ट्यूशन क्लास में वापस आ गयी. उसके बरताव से ऐसा कुछ लगा ही नहीं कि कुछ हुआ है. ना हमने कुछ पूछा ना उसने कुछ बताया.

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फिर वक्त बीता हम सबने कॉलेज पूरा कर लिया. सभी पास हो गये. अपने अपने काम में बिज़ी हो गये. मैं दिल्ली आ गया. रवि मिश्रा कॉलेज में लेक्चरर हो गया. और माया गुप्ता ने शादी कर ली. हमें लगा था कि वह अब माया त्रिपाठी बन गयी होगी. अपने बॉय फ्रेंड सतीश त्रिपाठी से शादी कर चुकी होगी.

एक दिन मैं शहर वापस आया तो रवि ने कहा कि चल एक जगह लेकर चलता हूं. मुझे लेकर वो एक गारमेंट शोरूम के बाहर आ गया. शहर के सबसे नये नवेले मार्केट का सबसे बड़ा गारमेंट शोरूम. रवि ने उधर इशारा किया. मेरी नज़र काउंटर पर बैठ लड़की पर पड़ी. मैं चौंक गया.

अरे यह तो माया है. वही माया जिसने बीएससी फर्स्ट डिवीजन से पास किया. हम तो मुश्किल से सेकेंड डिवीजन में पास हो पाये थे. वही माया अब माया गुप्ता से माया अग्रवाल बन चुकी थी. अपने तब के बॉयफ्रेंड से उसकी शादी नहीं हुई. वह रिश्ता नहीं बना. पता चला कि बॉय फ्रेड की मां ने रिश्ते से इनकार कर दिया. बॉयफ्रेंड सतीश त्रिपाठी ने मां की बात मानना अपना फर्ज़ समझा. माया के प्यार को उसने ठुकरा दिया.

शहर के एक व्यापारी के बेटे से फिर माया की शादी हो गयी. अब वह शो रूम संभालती थी. मेरी हिम्मत नहीं हुई उसके सामने जाने की. अच्छा नहीं लगा था यह जानकर कि माया अपने मन से अपना जीवन साथी नहीं चुन पायी.

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यह सारी कहानी माया की तस्वीर देखते-देखते याद आ गयी. रवि ने एक अखबार से ये तस्वीर खींच कर भेजी है. अखबार में एक छोटा सा विज्ञापन छपा था. शोक सभा. माया अग्रवाल का निधन हो गया है.
 
मेरा दिल बैठ गया. इतनी जल्द क्यों चली गयीं माया. अभी तो हमें बातें करनी थीं. हमने तो कभी हैलो भी नहीं कहा था एक-दूसरे को. कभी आंख भर कर एक-दूसरे को देखा नहीं था. एक गहरी सांस लेकर मैंने फोन रख दिया.  
 
आखिर क्या रिश्ता है मेरा माया से. क्या नाम देगा कोई इस रिश्ते को?

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