ख़ामोश सा अफसाना
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी
वो नया नया सा सूरज था, नई नई सी सुबह, नई ज़िंदगी, नया घर, नया रिश्ता... किचन की खिड़की से वामिका, कभी सामने उगते हुए सूरज को देख रही थी, कभी अपनी उंगली में पहनी उस पुरानी अंगूठी को, जिसका सुनहरा रंग कुछ-कुछ उतर गया था, किनारे घिस गए थे। उस अंगूठी को उदासी से देखते हुए न जाने क्या सोच रही थी वामिका। बाहर परिंदों का शोर था और दूर सड़क से गुज़रती इक्का-दुक्का गाड़ियां थी.. लेकिन एक खामोशी थी वामिका के मन में और उस घर में भी, जहां शादी के बाद आज उसकी पहली सुबह थी। एक उदास सुबह।
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पानी से भाप उठने लगी तो वामिका चीनी का डिब्बा ढूंढने लगी। उसने बेड रूम में सो रहे ओम की तरफ पलटकर देखा, सोचा कि पूछ ले चीनी कहां है, लेकिन फिर... खुद ही रैक में ढूंढने लगी।
ये रिश्ता अख़बार के मैट्रिमोनियल कॉलम से तय हुआ था। एक बेहद सादे से फैमिली फक्शन में। दूसरी शादी में ज़्यादा धूम-धाम अच्छी भी कहां लगती है। हां, वामिका और ओम दोनों की ये दूसरी शादी थी। बल्कि हकीकत तो ये थी कि दोनों ही दूसरी शादी नहीं चाहते थे, पर परिवार का दबाव था। अब वो पति-पत्नी थे लेकिन उनका रिश्ता बर्फ की तरफ सर्द था।
अरे उठ गईं आप, मुझे उठा लेती.. मैं ... पीछे से ओम की आवाज़ आई तो वामिका हड़बड़ाहट से पलटी– नई इट्स ओके, वो.. बस.....चीनी का डिब्बा.. बिना नज़र मिलाए उसने कहा तो ओम ने ऊपर वाली रैक से डिब्बा निकालकर उसकी तरफ बढ़ा दिया। पहली बार उंगलियों के टकराने पर अजीब सी हलचल हुई थी, वामिका के मन में.. आ..आई एम सॉरी कहकर ओम शर्मिंदा सा लौट गया।
नाश्ता करते वक्त भी दोनों खामोश थे। उनके बीच का फासला उस मेज़ से कहीं ज़्यादा था जिसके आमने-सामने वो बैठे थे। मम्मी ने.. आ.. ये.. टिकट..भेजे हैं एक सफेद लिफाफा ओम ने वामिका की तरफ बढ़ाते हुए कहा वो चाहते हैं, हम...कश्मीर घूम आएं।
कश्मीर का नाम सुन कर वामिका कुछ चौंक सी गई... कश्मीर?.. उसने घबराते हुए दोहराया... तो ओम मुस्कुरा दिया, वो जानता था कि कश्मीर के बारे में वामिका की समझ वही है जो उन लोगों की होती है जो कश्मीर के बारे में कम जानते हैं। ओम कश्मीर के अनंतनाग फुटबॉल अकेडेमी में कोच के तौर पर कई साल गुज़ार चुका था। ये कश्मीर का वो इलाका है जहां फुटबाल को लेकर दिवानगी काफी है।
पर लोग कहां जानते हैं कि न्यूज़ चैनलों पर दिखाए जाने वाला कश्मीर, दरअसल कश्मीर का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख़ की शांत और खूबसूरत वादियों के बारे में वामिका भी कहां जानती थी। ठीक है, चलते हैं .. वामिका ने अधूरे मन से कहा। वक्त इंसान को कितना बदल देता है। ये वही वामिका थी जो कभी ज़िंदगी से भरी हुई थी। ज़िद्दी थी, जो चाहती थी हासिल कर लेती थी। 6 साल पहले घर वालों से झगड़ कर संजय से शादी की थी लेकिन शादी के दो साल बाद ही एक हादसे में संजय गुज़र गया।
उस शाम कश्मीर के लिए पैकिंग करते हुए वामिका, फिर देर तक उसी अंगूठी को देखती रही, जो कभी संजय ने उसे पहनाई थी। उसकी आंखों के किनारों में नमी थी और ज़हन में संजय की याद। वो जानती थी कि अब उसे अंगूठी उतारनी होगी। उसने कांपती उंगलियों से, कस चु mmकी उस आंगूठी को खींचा और आंसू पोंछते हुए एक डिब्बे में रखकर अलमारी में दबा दिया। अंगूठी अब उंगली पर नहीं थी, लेकिन एक निशान था। वामिका जानती थी कि इस धंसे हुए निशान को जाने में अभी वक्त लगेगा।
कुछ घंटों की फ्लाइट और फिर कार के सफर के बाद वामिका और ओम, कश्मीर की उस बर्फ से ढकी सफेद ज़मीन पर थे जिसे दुनिया की जन्नत कहते है।
उनके बीच की खामोशी तो अब भी वैसी ही थी लेकिन वो मौसम बात कर रहा था। पहाड़ों से घिरे गुलमर्ग के उस इलाके में नज़र की हद तक बर्फ से ढके चिनार के पेड़ थे। नीला-खुला आसमान और ज़मीन ऐसी जैसे बादल उतर आए हों, आसमान से रुई के फाहे की तरह गिरती बर्फ थी। वो मंज़र इतना खूबसूरत था कि उसमे हर ग़म भुलाया जा सकता था।
आप लोग स्की करेंगे क्या? कश्मीर का रवायती लिबास ‘फिरन’ पहने हुए एक शख्स ने ओम से कहा तो उसने वामिका से पूछा विल यू? वामिका ने एक नज़र स्कींइग कर रहे लोगों को देखा, वो पैरों के नीचे स्केट्स लगाकर, मज़े से बर्फ पर फिसल रहे थे। ओम ने वामिका से कहा, ट्राई करना हो कर लो, गुलमर्ग देश का सबसे बड़ा स्कींइग रिजार्ट है, I think u’ll like it वामिका ने न में सर हिला दिया।
शाम के वक्त जब ओम होटल के बिस्तर पर सफर की थकान मिटा रहा था तब बालकनी से बाहर देखते हुए वामिका वो नज़ारा देख रही थी जो अबतक उसने सिर्फ किस्सों-कहानियों में सुना था। न वहां कोई डर था, न कोई अविश्वास.. नज़र की हद तक सिर्फ खूबसूरती ही खूबसूरती थी। वो नहीं जानती थी कि पहाड़ इतने खूबसूरत होते हैं। उसे यकीन हो रहा था कि उसकी एक कॉलेज फ्रेंड सोनल, सही कहती थी कि कश्मीर की खूबसूरती का अंदाज़ा बिना कश्मीर आए नहीं लगाया जा सकता। हवा जब वामिका के जिस्म के रोए छू कर निकलती तो लगता था जैसे उसकी रूह को कोई हल्के-हल्के सहला रहा हो। लीजिए मैडम, कहवा पीजिए, कश्मीर का फेमस काहवा साफा बांधे वेटर ने टेबल पर टिकोज़ी से ढकी हुई केतली और कप रखते हुए कहा, साहब को भी बोल दिया है, आ रहे हैं। वामिका मुस्कुरा दी। वेटर काहवा निकालने लगा, इतने में ओम भी वहां आ गया। ओम को देखकर वामिका तकल्लुफ से मुस्कुराई। फिर कुछ देर की खामोशी रही। ओम ने खामोशी तोड़ने के लिए वेटर से पूछा –पहाड़ पर तो बड़ी बर्फ है, इस बार बर्फबारी ज़्यादा हुई क्या? वेटर ने वामिका की तरफ कप बढ़ाते हुए जवाब दिया, जी सर, हम तो चाहते हैं और ज़्यादा हो, पहाड़ भी तभी अच्छे लगते हैं जब बर्फ हो। ओम मुस्कुरा दिया और वामिका दूर तक फैली उस जन्नत को नज़रों से छूने लगी। वेटर ने ट्रे में समान रखते हुए आगे कहा हमारी एक कश्मीरी कहावत है सर, कहते हैं मियां-बीवी को बर्फ और पहाड़ की तरफ होना चाहिए। उनमें दूरी न हो, एक दूसरे को यूं ढक ले जैसे बर्फ पहाड़ को ढकती है, दोनों तभी खूबसूरत लगते हैं। वो ये कहता हुआ चला गया। लेकिन वामिका और ओम उसकी बातों में खुद को देर तक ढूंढते रहे।
उसी फिज़ा की सर्द हवा खूबसूरत थी, लेकिन एक सर्द रिश्ते के दो सिरे थामे, ओम और वामिका अब तक एक दूसरे के लिए अजनबी थे। ये रिश्ता उन्हें थमाया गया था लेकिन वो अपने गुज़र चुके हिस्से की ज़मीन किसी और को नहीं देना चाहते थे।
अगली सुबह वामिका की आंख खुली तो उबासी के बाद उसकी नज़र पैरों पर पड़ी। जेंट्स मोज़े थे। वो हैरानी से देखने लगी आई एम सॉरी, वो..मैंने पहनाए... आपको रात में ठंड लग रही थी तो... कमरे के किनारे अपना बैग ठीक करते हुए ओम ने कहा.. वो शर्मिंदा सा था, वामिका ने भी बिना नज़र मिलाए ओके कहा और मोज़े उतारकर दूसरे कमरे में जाने लगी। आ.. तैयार हो जाइये, ग्यारह बजे ट्राली की बुकिंग है ओम ने वामिका से कहा तो उसने हा में सर हिला दिया। उनके ट्रैवल पैकेज में गुलमर्ग से कुंगडूर तक की ट्राली का सफर भी था। ट्रॉली यानि एक केबिल कार जो तार के ज़रिये ऊपर ही ऊपर सफर तय करती है। उसमें बैठकर दूर तक फैली वादी का नज़ारा लिया जाता है।
वामिका और ओम ज़मीन से कई फीट उपर उस ट्राली में आमने-सामने बैठे थे। दूर तक सफेदी फैली थी, जहां तक नज़र जाती थी, खूबसूरती ही खूबसूरती थी। पेड़ एक तरतीब में नज़र आ रहे थे औऱ दूर एक झील दिख रही थी।
ट्राली चलना शुरु हुई, तो वामिका के चेहरे पर थोड़ी घबराहट थी। जंगलों के ऊपर से गुज़रते हुए वामिका को लग रहा था जैसे वो आसमान की सैर कर रही हो। उसकी उदासी आहिस्ता-आहिस्ता पिघल रही थी। खुशी, ग़म और हल्का सा डर, तीनों का मिला-जुला रंग उसके चेहरे पर था। पहली बार ओम और वामिका ने एक दूसरे की आंखों में गहराई तक देखा।
ओम उठ कर उसके साथ वाली सीट पर आ गया। और उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उस सर्द मौसम में भी वामिका का हाथ पसीजने लगा। ओम बोला, ये उंगली पर जो गहरा सा निशान है न, अच्छा नहीं लगता .. लगता है जैसे कुछ कम है ... वामिका की आंखें नम हो आई। फिर ओम ने जैकेट की जेब से एक डिब्बा निकाला और उसे खोला तो एक वही अंगूठी थी जो वामिका छोड़ आई थी.. ये तुम वहीं छोड़ आई थी वामिका, इसे पहन लो। अगर तुमको लगता है कि तुम्हारा ये अंगूठी पहनना मुझे बुरा लगेगा तो ऐसा नहीं है ... जो गुज़र चुका है उसकी याद कितनी कीमती होती है मैं समझता हूं। इसे हमेशा पहनना.. कहते हुए ओम ने वो अंगूठी वामिका की उंगली में पहना दी। उंगली पर वो धंसा हुआ निशान, वापस भर गया था। ट्राली ज़मीन की जन्नत पर बर्फ से ढके खूबसूरत चिनार के पेड़ों के ऊपर से गुज़र रही थी। ओम और वामिका के दरमियां, रिश्ते की बर्फ आहिस्ता-आहिस्ता पिघल रही थी।
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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी