कहानी - उस खिड़की में कोई है
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी
क्या आपके साथ कभी ऐसा होता है... कि शहर की किसी सड़क से गुज़रते हुए आपकी नज़र किसी पुरानी इमारत जिसमें सालों से कोई नहीं रहता... उस तरफ उठ जाती हो... और ये महसूस होता हो कि जैसे उस सालों से बंद मकान की खिड़की से कोई आपको देख रहा है। घूरती हुई आंखों से... वो आंखें आपका पीछा करती हैं... वहां तक जहां तक आप उसे देख सकते हैं... या फिर वो आपको.... ऐसी ही था वो हादसा जो मैं कभी नहीं भूल सकता...
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शाहीन बाग, जामिया नगर, हरी कोठी..... हां भाई साहब कहां जाएंगे.... आईये... उस दोपहर भी मैं बस की खिड़की से लगभग लटकते हुए आते-जाते लोगों को देखकर चीख रहा था। ये उन दिनों की बात है जब दिल्ली में ब्लू लाइन बसें चलती थीं। मैं एक बस का कंडक्टर था। मेरा काम था, सवारियों को आज़ देना... उन्हें बैठाना... अंदर खिसकने के लिए कहना... टिकट बनाना और ये देखना कि कोई सवारी बिना टिकट खरीदे ... मैं अपने काम से खुश हूं कम से कम रात को चार पैसे कमा के घर तो ले जाता हूं। वरना मेरे सारे पुराने दोस्त यार तो बेरोज़गार घूम रहे हैं।
मुंझे इस काम में लेकर आए ओमकार उस्ताद ... जो इस बस के ड्राइवर हैं... पिछले कई सालों से वो इस बस को चलाते हैं। उन्हें कोई कंडक्टर या हेल्पर चाहिए था तो उन्होंने मुझे बुला लिया। और तब से मेरी और ओंकार उस्ताद की सुबह से शाम इसी बस में गुज़रती है। ओंकार उस्ताद बढ़िया आदमी थे... पहले किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता हुआ करते थे... उस ज़माने के अखबारों की कटिंग वो आज भी बस में ड्राइवर-सीट के आस-पास चिपकाए थे। उन धुंधली तस्वीरों में वो काफी जवान दिखते थे। बताते थे कि उस ज़माने में वो पॉलिटिक्स में करियर बनाना चाहते थे, पर वो हो न सका...रोज़ी रोटी की फिक्र सर पर आई तो फिर काम धंधे पर लग गए। ख़ैर... अब वो अपने काम से खुश थे।
चलिए उस्ताद... रात के वक्त, ड्यूटी खत्म होने के बाद... मैंने बस का दरवाज़ा बंद करते हुए आवाज़ लगाई तो ड्राइविंग सीट पर बैठे उस्ताद ने हां में सर हिलाया और गियर बदलते हुए गाड़ी बढ़ा दी। रात के अंधेरे में बस मुखर्जी मार्ग से होते हुए सीधे शकरपुर की तरफ चली जा रही थी... बस डीपी की तरफ... लेकिन बड़ा चौराहा पार करते ही मेरा ध्यान न चाहते हुए भी उस्ताद की तरफ जाने लगा। मैंने आहिस्ता से नज़र चुराते हुए उस्ताद का चेहरा देखा.... उनके चेहरे पर एक किस्म की घबराहट दिखाई देने लगी थी। वो इतना डरे हुए थे... जैसे कोई अपनी मौत से डरता है। स्टियरिंग पर कसे हुए हाथ हल्के हल्के पसीजने लगे थे, जिन्हें वो बार बार कंधे पर रगड़कर पोंछते थे।
महीना भर पहले हमारी बस का रूट बदल दिया गया था... और जब से इस रूट पर आए थे... उस्ताद का यही हाल था। दिनभर तो वो बस ठीक ठाक चलाते थे पर जब रात को शिफ्ट खत्म होती थी और वो गाड़ी को डीपो की तरफ लौटाने के लिए बड़े चौराहे को पार करते थे तो मोड़ के बाद... दाईं तरफ एक बिल्डिंग दिखती थी... एक जली हुई बिल्डिंग... जिसमें पिछले कई सालों से कोई नहीं रहता... बस जैसे ही सुनसान इलाके में उस इमारत के सामने से गुज़रती थी... उस्ताद उस तरफ ऐसे देखते थे... जैसे वो ... वो कोई भूत देख रहे हों... और उन्हें एक झटका सा लगता था... घबराहट चेहरे पर साफ दिखती थी...
- उस्ताद आप ठीक हो...
- हां... हैं कुछ नहीं... वो... बस... ठीक हूं...ऑ
- मैं हर बार उस्ताद से पूछा करता था कि आखिर उस इमारत के पास से गुज़रते हुए उनकी हालत ऐसी क्यों हो जाती है... पर वो हर बार टाल जाते थे। पर उस दिन मैंने ज़िद कर ली… उस्ताद... एक बताइये न... क्या है इस बिल्डिंग में... आप उस पुरानी बिल्डिंग के पास से गुज़रते हुए घबरा क्यों जाते हो.... क्या है वहां पर... बताइये न
- अरे छोड़ न छोटे... कुछ नहीं है...
- कुछ कैसे नहीं है उस्ताद... जब से इस रूट पर आए हैं... रोज़ देखता हूं.. उस घर के सामने से निकलते हुए आप... आप डर जाते हैं... बताइये न... कम से कम कुछ तो पता हो मुझे...
उस्ताद ने पहले टाल-मटोल किया फिर आखिर में जब तक बस डीपो पहुंची और वहां खड़ी कई बसों के बीच में खड़ी कर दी... तो फिर बोले... चल ठीक है... बताता हूं... पर किसी से कहना नहीं
- नहीं उस्ताद.... आफ भरोसा रखिए....
मैंने कहा तो उन्होंने ठीक है में सर हिलाया और फिर गहरी सांस लेते हुए मेरी तरफ देखा। मैंने गौर किया कि उनके चेहरे पर एक अजीब सा ख़ौफ दिखाई दे रहा था। हिचकिचाते हुए बोले तुमने.. तुमने कभी ग़ौर किया है वो जो बिल्डिंग है सड़क किनारे... उसमें एक खिड़की है... जो खुली दिखती है
मैंने कहा, देखा तो है... जिसके पट जले हुए हैं... और बाहर की तरफ खुले रहते हैं... लेकिन उसमें डरने वाली क्या बात है...
वो अपनी आंखे फैलाते हुए बोले... उसमें, उसमें कोई है... जो मुझे देखता है
- क्या... अरे उस्ताद उसमें... कोई कैसे हो सकता है... वो तो सालों से खाली पड़ी है, वीरान है...
- मुझे पता है, वो झुंझलाए... लेकिन ... लेकिन मैं जब वहां से निकलता हूं तो उस खिड़की में मुझे दो आंखें चमकती हुई दिखती हैं... घूरती हैं मुझे... गुस्से में... जैसे ... जैसे मुझे खा जाएगीं....मुझे पता है तुम...तुम यकीन नहीं करोगे... कोई यकीन नहीं करेगा... लोग मुझे पागल कहेंगे... इसलिए मैं ये बात किसी को बताता नहीं... पर पर ये सच है कहते कहते उनके हाथ कांपने लगे... वो बोल रहे थे... उस खिड़की में दो चमकती हुई आंखें हैं... जो... जो मुझे ऐसे घूरती हैं... जैसे मेरी मौत मुझे देख रही हो... वो... अंधेरे से झांकती वो दो आंखें ऐसा लगता है मुझे खा जाएंगी...
मैं उनके चेहरे पर डर देख पा रहा था। मैंने उन्हें नार्मल किया और कुछ देर बाद बस से उतर गया। लेकिन उस रात के बाद जब भी रात को उस्ताद उस रास्ते से निकलते... तो अब उस खिड़की की तरफ मेरी नज़र भी गड़ जाती। कभी मैं उस्ताद को देखता कभी खिड़की को... उस्ताद खिड़की से नज़र बचाते... उधर नहीं देखते... लेकिन फिर उनकी गर्दन घूम ही जाती और एक झटका सा लगता। फिर वो स्टीयरिंग संभालते और कॉनसेंट्रेट करते। जबकि मैं... जब उस खिड़की पर देखता था... तो मुझे सिवाए एक खुली हुई खिड़की के और कुछ नहीं दिखता था। बस... अंधेरा ही अंधेरा वहां...
हालांकि वो घर था डरावना... एक दो मंज़िला मकान था... जिसका रंग किसी ज़माने में पीला रहा होगा... पर अब उस पर काली रंग की पुरानी कालिख... दिखाई देती थी... छत पर कई जंगली पेड़ उग आए थे... जिनसे लटकी हुई बहुत सी जटाएं थीं जो उस घर पर लटक रही थीं। एक खुली हुई खिड़की थी... जिस पर लकड़ी के पट थे जो आधे जले हुए थे... उस घर को देखकर डर तो लगता था पर जो उस्ताद ने कहा, वो बात मुझे कुछ ज़्यादा लगी। मैं श्योर था कि उस्ताद के मन में कोई डर बैठ गया है।
उस्ताद की मैं बहुत इज़्ज़त करता था। वो मेरा ख्याल रखते थे... पर रात के वक्त जब उस घर के सामने से गुज़रते तो मुझे उन पर तरस आता था। एक रोज़ मैंने तय किया कि इतवार के रोज़ जब मेरी छुट्टी होती है, तब मैं जाऊंगा...
वो दिन आ भी गया। इतवार की दोपहर थी। मैं वक्त निकाल कर उसी डरावने मकान के पास पहुंचा। देखने में तो वैसे डरावना ही था... पुरानी दीवारें, टूटे रौशनदान, जले दरवाज़े और अंधेरी खिड़की। मैं उस घर को ग़ौर से देखने लगा।
वो डरावना घर ऐसा लगता था जैसे कोई डरावनी कहानी सुना रहा हो... .कुछ तो हुआ था उस घर में... कुछ ऐसा जो नहीं होना चाहिए था। क्या थी कहानी उस घर की... मुझे जानना था।
मैंने आसपास नज़र दौड़ाई तो पास में जो दूसरी बिल्डिंग थी... उसके बाहर मुझे एक बूढ़ा चौकीदार दिखाई दिया। मैं उनके पास गया।
अरे काका... बिंल्डिंग के गेट पर बैठे बूढ़े चौकीदार ने मेरी तरफ देखा। वो आहिस्ता कदमों से करीब आये, काका ये.. ये वाला जो घर है.. ये किसका है, मैंने पूछा तो वो मेरी तरफ देखने लगे।
- क्यों क्या हुआ... क्यों जानना है तुम्हें
- बस यूं ही... काफी सुना है इसके बारे में कुछ लोग कहते हैं... भूत वूत है.. तो यहां से गुज़र रहा था.. सोचा...
- इसकी कहानी तो खत्म हो गई बेटा उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा तो मैं चौंका।
- मतलब? मैंने पूछा। वो अपनी कुर्सी पर बैठते हुए बोले... हां बेटा... मैं तो पिछले तीस सालों से यही नौकरी कर रहा हूं। कभी वो घर बहुत गुलज़ार हुआ करता था। घर में किलकारियां गूंजती थीं। ये जो खुली हुई खिड़की है न... मैं जब भी यहां बैठता था तो उस खिड़की में एक छोटी प्यारी सी बच्ची भी दिखाई देती थी। उसीक उम्र साल के आसपास होगी... मैं उसका नाम नहीं जानता था... पर हम दोनों इशारे इशारे में एक दूसरे से बात करते थे। हम कभी मिले भी नहीं... पर दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते थे। दोस्ती सी हो गयी थी हमारी... लेकिन फिर एक रोज़ इस शहर की शांति को किसी की नज़र लग गयी। शहर में दंगे हो गए। लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए। कोई नहीं जानता था कि कोई किसी को क्यों मारना चाहता है... वो बस एक नशा था... जिसे नेता लोग आम जनता में फैला रहे थे। पूरा शहर जल रहा था... भगवान, खुदा... गॉड पता नहीं कहां जाकर छुप गए थे। कोई नहीं था उस रात... जब कुछ दंगाई... उस घर में घुसे... और नफरती नारे लगाते हुए घर में घुसे और इस इलाके में रहने वाले लोगों से चुन चुन के कहने लगे... सब लोग घर खाली करके चले जाओ... तुम लोग इस इलाके में नहीं रह सकते... सुबह तक खाली कर देना... सुबह आग लगा दी जाएगी
- फिर ... फिर क्या हुआ... मैंने हैरानी से पूछा तो वो बोले ...सुबह होते ही इलाके के बहुत से लोग मकान छोड़कर चले गए। अगली रात खाली घरों में लगा दी गई, इस घर में भी... ताकि कोई वापस न आ सके। लेकिन जानते हो... जब इस घर में आग लगी तो... तो वो सात साल की बच्ची ... उस घर के अंदर ही थी।
उफ्फ, मैं कांप गया... मैं बुज़ुर्ग की कांपती हुई झुर्रियों को देख पा रहा था। वो उस वक्त महसूस कर पा रहे थे कि वो दर्द जो आग की लपटों में घिरी उस बच्ची ने महसूस किया होगा... तो काका... फिर उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवई हुई? वो पकड़े गए या नहीं... कौन थे वो लोग? मैंने पूछा तो बुज़ुर्ग अपनी कुर्सी पर पीछे हुए और गहरी सांस लेते हुए बोले.... हां सुनते तो हैं, लेकिन क्योंकि वो आग लगाने वाले एक राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता थे इसलिए जल्दी छूट गए। अब कौन कहां है, क्या कर रहा है, क्या पता। हां कोई बता रहा था कि उनमें से एक आदमी अब बस ड्राइवर बन गया है... कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाया...
बस ड्राइवर.... मेरे होंठों पर हल्की सी आवाज़ गूंजी... और उस्ताद का डरा हुआ चेहरा आंखों के सामने कौंधने लगा। मेरा जिस्म कांप रहा था, नज़र अंधेरी खिड़की पर थी... जहां अब कोई नहीं था।
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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी