कहानी | पाँच सौ का नोट | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

सात साल की मेरी बेटी त्रिशा दोपहर से लापता थी। मैंने पूरे शहर के कई चक्कर लगा लिये थे लेकिन अब तक उसका कोई पता नहीं चल पाया था। मैं और मेरे पड़ोसी ज़ैदी साहब थक हार कर घर पहुंचे ही थे कि मेरे घर का फोन बजा। पुलिस स्टेशन से कॉल था। उन्होंने बताया कि भगत सिंह चौक पर लगे सीसीटीवी में त्रिशा को देखा गया है। उसके साथ कोई आदमी है। मैं हड़बड़ाया हुआ पुलिस स्टेशन पहुंचा तो उन्होंने मुझे वीडियो दिखायी गयी मैंने देखा कि उस तस्वीर में त्रिशा के साथ जो आदमी था वो कोई और नहीं, गोपाल था। वही गोपाल जो कभी हमारी सोसाइटी में वॉचमैन का काम करता था। सुनिए स्टोरीबॉक्स में नई कहानी 'पाँच सौ का नोट'

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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • नोएडा,
  • 01 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 5:41 PM IST

कहानी - पाँच सौ का नोट
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

 

वो शाम मैं कभी नहीं भूल सकता... कभी भी नहीं। हमारी 6 साल की बेटी त्रिशा दोपहर से गुम थी। पुलिस में कंप्लेंट के बाद मैं और मेरे पड़ोसी श्रीवास्तव साहब... तीन बार पूरे शहर का चक्कर मार चुके थे। पुलिस का कहना था कि वो लोग कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमें उन पर भरोसा नहीं था। मैं और ज़ैदी साहब, हम दोनों शहर का हर कोना ढूंढ चुके थे... पर त्रिशा कहीं नहीं मिली। सात साल की बच्ची अगर खो जाए.. तो आप उसे शहर में कहां ढूंढेंगे। कौन सी जगह है, जहां आपको देखना चाहिए... वो भी तब जब वो स्कूल और ट्यूशन और डांसिंग क्लास के अलावा कहीं और जाती ही नहीं। हमारी कार एक बार फिर से घर के बाहर आकर रुकी। ड्राइविंग सीट पर बैठ श्रीवास्तव साहब और साथ वाली सीट पर बैठा मैं... हमारे चेहरे पर उदासियां लिपटी थी... हम कार से उतरे और हारे हुए कदमों से फिर घर की सीढ़ियां चढ़ने लगे।

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जैसे-जैसे हम दरवाज़े के करीब पहुंचे मुझे मेरी बीवी अल्का की सुबकती हुई आवाज़ फिर से सुनाई देने लगीं। मैं जानता था कि दरवाज़ा खुलते ही वो मेरे ऊपर झपटेगी... पूछेगी कि क्या हुआ... त्रिशा मिली की नहीं... और मैं जब नाउम्मीदी से उसे देखूंगा तो वो एक बार फिर टूट जाएगी। अल्का दोपहर से तीन बार बेहोश हो चुकी थी। ज़ैदी साहब की बीवी उसे किसी तरह संभाल रही थी। मैंने बड़ी हिम्मत करके दरवाज़े को अंदर ढकेला तो अल्का सोफे पर बिखरी सी पड़ी थी और ज़ैदी साहब की बीवी आयशा उसके सर पर हाथ फिरा रही थीं। लेकिन मुझे देखते ही अल्का फौरन उठने की कोशिश करते हुए बोली... वो... वो पुलिस स्टेशन से कॉल आया था...  आप को पूछ रहे थे... ज़रूर कोई बात है... आप फोन कीजिए... अभी... जल्दी कीजिए... मेरी सुस्ती में अचानक तेज़ी शामिल हो गयी। मैं हड़बड़ाया सा किनारे स्टूल पर रखे फोन की तरफ भागा। नंबर मिलाया... जब तक बेल बजी... धड़कने तेज़ी से धड़कती रहीं... हाथ रिसीवर का वज़न संभाले कांप रहा था।

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हैलो पुलिस स्टेशन....

हैलो... इंसपेक्टर साहब... मैं बोल रहा हूं... वो त्रिशा की मिसिंग कंप्लेंट लिखाई

ओह हां... आप ही का इंतज़ार कर रहा था... एक अपडेट है आपके लिए....

क्या हुआ... वो मिल गयी... कहां मिली

आ... नहीं... मिली नहीं है... लेकिन हमने उसे एक सीसीटीवी में देखा है... एक आदमी उसे लेकर जाता हुआ देखा है...

क्या... कौन आदमी... कहां पर ... देखा आपने...

भगत सिंह चौक पर... हमने वहां छानबीन की है... पर अब वो वहां नहीं है... हमने चेक पोस्ट लगा दी हैं

भगत सिंह चौक... वो ... आदमी कौन है... आपने देखा...

हां, उसी की पहचान के लिए आपको बुलाना चाहते थे... आप पुलिस स्टेशन आ जाइये... जल्दी आ जाइये...

ठीक... ठीक है... मैं आता हूं...

कहते हुए मैंने फोन रखा... तो घर में कई आवाज़े गूंजने लगीं। क्या हुआ... क्या कह रहे थे... मिल गयी त्रिशा? कहां जा रहे हैं... अल्का लगभग मुझे जकड़ते हुए पीछे-पीछे चली आ रही थी। मैंने उसे समझाया... पुलिस ने त्रिशा को भगत सिंह चौक के पास किसी आदमी के साथ देखा है...

क्या... अल्का जिसने मेरे हाथों को थामा हुआ था... उस की उंगलियां इतनी ज़ोर से कस गयीं कि लगभग खरोंचते हुए पूछा.... आदमी.... कौन आदमी... किसके पास है त्रिशा... क्या चाहता है वो... अलका बेहोश होने लगी.... मेरी आंखे भी आंसुओं से भीगने लगी। ज़ैदी साहब की बीवी आयशा और मैं... हम दोनों ने अलका को संभालते हुए बिस्तर पर लिटाया... आयशा भी कोई आयत बुदबुतादी हुई उसके सर पर हाथ फेरने लगीं। मैं और ज़ैदी साहब... हम दोनों तेज़ कदमों से बाहर निकल गए। और जल्दी से कार में बैठ कर पुलिस स्टेशन की तरफ चल दिए। इस बार कार मैं चला रहा था। रात के आठ बज गए थे... हमारी तेज़ रफ्तार कार सड़क पर तेज़ी से भागती जा रही थी। त्रिशा रोज़ाना दोपहर दो बजे स्कूल से लौटती थी... चार बजे तक वो घर में खेलती या टीवी देखते हुए डांस करती थी। उसे डांस का बहुत शौक था। साढ़े चार के आसपास वो घर के बाहर ही खेल रही थी। अलका ने उसे देखा भी था, कि वो घर के बाहर वाले लॉन के पास खेल रही थी। तभी अलका का फोन बजा वो एक पल के लिए अंदर गयीं। उसी वक्त घर के ठीक सामने से बैंड बाजे के साथ किसी की बारात निकली... उस बाजे के शोर में अलका को फोन पर बात करना मुश्किल हो रहा था। उसने त्रिशा को आवाज़ भी दी... लेकिन शोर में उसकी आवाज़ दब गयी। वो वापस आईं तो त्रिशा वहां नहीं थी। अलका ने पहले तो ध्यान नहीं दिया... लेकिन शाम को साढ़े पांच बजे जब उसके ट्य़ूशन जाने का वक्त हुआ... तब उन्होंने आवाज़ दी, उसे ढूंढा... पर वो कहीं नहीं थी। और तब से ही उसका कोई अता-पता नहीं था।

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हमारी कार पुलिस स्टेशन के दरवाज़े पर रुकी। मैं और ज़ैदी साहब तेज़ी से स्टेशन में दाखिल हुए। इंस्पेक्टर हमारा इंतज़ार ही कर रहे थे। हमें देखते ही उन्होंने अपनी स्क्रीन पर भगत सिंह चौक पर लगे सीसीटीवी से आई वीडियो हमें दिखाई। मैं उनकी मेज़ पर हाथ टेके अपनी नज़रें उस धुंधली स्क्रीन पर टिकाए था... जहां एक चौराहे पर गाड़ियां आती जाती दिख रही थीं। और किनारे एक फुटपाथ था। ज़ैदी साहब ने ग़ौर किया कि मेरा हाथ कांप रहा है। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए मुझे संभाला। मैंने देखा... सड़क के किनारे उस फुटपाथ पर कई लोग आए और गुज़र गए और फिर ... फिर मुझे त्रिशा दिखी... मेरी धड़कनें बढ़ गयीं। मैं गौर से देख रहा था... एक आदमी भी नज़र आया... उसने त्रिशा का हाथ थामा हुआ था। अभी वो दूर था तो चेहरा नज़र नहीं आ रहा था... लेकिन जैसे जैसे वो कैमरे के पास आया.... मेरे होंठ कांपने लगे और कांपते हुए होंठो पर एक नाम आया - गोपाल...

पुलिस इंस्पेक्टर ने मेरी तरफ देखा और पूछा... कौन है ये... आप जानते हैं इसे.... मैंने कहा, हां..ये ...ये हमारी बिल्डिंग का सिक्योरिटी गार्ड था। दो ढाई महीने पहले मैंने इसे नौकरी से निकाल दिया था। पुलिस इंसपेक्टर ने स्क्रीन ऑफ करते हुए ज़ैदी साहब से इशारा किया कि वो मुझे बैठाएं.... और फिर पूछा... गोपाल के बारे में जो भी जानकारियां आपके पास हो मुझे बताएं। वैसे क्यों नौकरी से निकाला था आपने... उन्होंने पूछा... तो मैंने ग़ौर करते हुए कहा... वो... वो बहुत कामचोर था... उसका मन काम में लगता ही नहीं था... दस में सात बार वो मुझे कभी गेट पर नहीं मिलता था। जब मैं दफ्तर से लौटता था तो खुद कार से उतर कर गेट खोलना पड़ता था... फिर वो भागता हुआ आता था... पता चलता था किसे से फोन पर बात कर रहा है... हर हफ्ते एक न एक करता था... और लगभग रोज़ ही देर से आता था... सौ बहाने थे उसेक पास ... कभी घर कहता था बेटी की तबियत खराब है, उसे अस्पताल लेने जा रहा हूं... कभी उसको अस्पताल में दिखाना है, अब हर चौथे दिन कौन अस्पताल जाता है... मुझे पक्का पता था कि वो झूठ बोलता था... उसकी बेटी वेटी कोई बीमार नहीं थी... सब बहाने थे... कामचोर था वो... बस एक दिन जब उसने फिर से छुट्टी की तो मुझे बहुत गुस्सा आया... मैंने सोच लिया कि कल वो आएगा तो पक्का बाहर निकाल दूंगा... अगले दिन वो आय़ा... तो फिर बेटी की बीमारी का बहाना... मैंने कहा, तुम ऐसा करो कि घर की ही देखभाल करो... यहां हम लोग किसी और को रख लेंगे। बहुत रोया गिड़गिड़ाया लेकिन... मैंने उसे धक्के देकर निकाल दिया था। उसके बाद तो गोपाल कभी नहीं दिखा...

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ज़ैदी साहब और पुलिस इंस्पेक्टर ने एक दूसरे को ग़ौर से देखा... और मैं... बोलते बोलते रुक गया। मेरी आंखे अचानक हैरानी से फैल गयीं। पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा, मुझे लगता है कि गोपाल को आप ने उस दिन जो बेइज़्ज़त करके निकाला... शायद उसी बेइज़्ज़ती का बदला लेने के लिए वो ये सब कर रहा है।

इंस्पेक्टर पर हम अब क्या करेंगे... मैंने हड़बड़ाते हुए पूछा... तो वो बोले... हम ट्रेस करने की कोशिश करेंगे उसे... उसकी जो भी डीटेल्स आपके पास हों...  आप यहां लिख दीजिए... हम पता करते हैं... आप घर जाइये... हम आस पास के सारे सीसीटीवी चेक कर रहे हैं... गोपाल ट्रेस हो जाएगा... फिक्र मत कीजिए...

मैंने उस दिन अपना वज़न इससे ज़्यादा कभी महसूस नहीं किया था। मेज़ पर हाथ टेकते हुए मैं बामुश्किल उठा और पुलिस स्टेशन के दरवाज़े से बाहर निकल गया। कुछ देर में हमारी कार घर की तरफ आ रही थी। हम घर पहुंचे तो अल्का अब होश में आ चुकी थी लेकिन अब तक उसकी आंख से बहते हुए आंसू रुके नहीं थी। ज़ैदी साहब की बीवी आयशा उसे किसी तरह संभाले हुए थीं। और आस पास के रिश्तेदारों का बार-बार फोन आ रहा था, जिसे मैं कट कर दे रहा था।

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क्या बताया उन लोगों ने.... क्या हुआ... उस आदमी का कुछ पता चला.... अलका ने मुझे देखा तो बिस्तर से खिसकते हुए उतर कर मेरी तरफ आते हुए पूछा... मैंने उसे पकड़ा और लड़खड़ाते हुए कहा... वो ... वो आदमी ... गोपाल है
गोपाल.... उसने हैरानी से नाम दोहराया
मैंने कहा, पुलिस को लगता है कि क्योंकि हमने गोपाल को नौकरी से निकाल दिया तो... तो वो गुस्से में... हमसे बदला ले रहा है और इसीलिए उसने.... उसने त्रिशा को...
अलका के आवाज़ घर में गूंज गयी... वो मुझसे लिपट कर सुबकने लगी। मैंने उसे संभाला
तुम... तुम बिल्कुल परेशान मत हो... पुलिस कह रही कि वो उसे.. उसे ढूंढ निकालेगी... सारे सीसीटीवी तैमरा लगे हैं उस रोड पर... एक टीम उसके घर भी गयी है... वो पकड़ा जाए... कुछ नहीं होगा हमारी त्रिशा को... कुछ नहीं होगा
अलका ने मेरी आंखों में देखा औऱ कहा, अगर त्रिशा को कुछ हुआ... मैं... मैं तुम्हे कभी माफ नहीं करूंगी...
कुछ नहीं होगा... मैं... मैं वादा करता हूं तुमसे...

हमारी बात हो रही थी कि घर का फोन फिर से घनघनाया। पुलिस स्टेशन से ही कॉल था। इंस्पेक्टर ने बताया कि पुलिस गोपाल के बताए पते पर गयी थी... लेकिन पता चला कि वो पता तो बहुत पुराना है। गोपाल वो घर छोड़कर कहीं और रहने लगा था। उसके नये वाले घर का पता ढूंढने की कोशिश हो रही है...मैंने हां में सर हिलाया और हम लोग उसी करे में बैठ गए। रात के पौने दस बज गए थे। दिन भर की खाक छानने के बाद हम लोग आखिरकार थक हार कर घर में बैठ गए थे। और कर भी क्या सकते थे सिवाए ऊपर वाले से दुआ के। अलका सोफे पर बैठी आयशा जी के कंधे पर सर टिकाए... सो गयी। मैं उसके पैर को थपथपाते हुए सोफे से लगी हुई बिछी कालीन पर बैठ गया।

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मेरे ज़हन में बार बार गोपाल का चेहरा घूम रहा था। पांच फुट दस इंच का वो गोपाल जो मुस्कुराता हुआ सुबह आता था तो आर्मी वालों की तरह सलाम करते हुए पैर पटकता था। वक्त इंसान से क्या कुछ करवा देता है। उसे देखकर कभी लगा ही नहीं कि वो ऐसा काम भी कर सकता है। कितना सीधा लगता था वो। दिवाली की रात को जब उसकी ड्य्टी लगी थी तो हमने उसे जब मिठाई दी थी तो उसने कहा था कि ये मुझे पैक कर के दे दीजिए... घर ले जाऊंगा। लिफ्ट जब खराब थी तो त्रिशा के स्कूल से लौटने पर वो उसका हाथ पकड़कर ज़ीने पर संभालकर लाता था। संडे को कार की सफाई अंदर से करने के लिए सुबह सुबह चाभी मांगने आता था... लेकिन कार में रखा सामान कभी गायब नहीं हुआ... एक बार तो वॉलेट भी छूट गया था। .... वाकई वक्त इंसान को कितना बदल देता है। लोग सही कहते हैं इन छोटे लोगों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए.... ये लोग मौका पाते ही आप को धोखा दे देते हैं... इन सब पर नज़र रखनी चाहिए.... ये छोटे लोग हमेशा छोटे ही होते हैं। मैंने सोचा कि एक बार बस त्रिशा मुझे मिल जाए... फिर मैं इस दुनिया में कभी किसी पर भरोसा नहीं करूंगा... कभी भी नहीं। मैं सोच ही रहा था कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी। ज़ैदी साहब ने मुझे इशारा किया कि मैं देखता हूं। वो उठे और बाहरी कमरे की तरफ चले गए। मेरे फोन में रिश्तेदारों की कॉल्स लगातार बजे जा रही थीं। सैकड़ों मिस्ड क़ॉल्स थीं।

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अरे... त्रिरशा...

बाहरी कमरे से ज़ैदी साहब की हैरान सी आवाज़ आई तो मैं चौका... आयशा जी के कंधे पर सर टिकाए अलका फौरन उठ गयी... हम सब बाहरी कमरे में बेतहाशा भागे ... और दरवाज़े के पास पहुंचे तो देखा कि दरवाज़े पर त्रिशा खड़ी है। और उसके ठीक पीछे खड़ा है गोपाल...

नमस्ते भैय्या.... उसने उसी जानी पहचानी मुस्कुराहट के साथ कहा, लेकिन किसी ने उसका जवाब नहीं दिया। अलका ने लगभग दौड़कर त्रिशा को गोद में उठा लिया... त्रिशा बोली, मम्मी मैं... मैं खो गयी थी... वो तो गोपाल भैय्या मिल गए तो वो मुझे घर ले आए। गोपाल अब तक खामोश ही था... त्रिशा ने बताया कि वो घर के पास खेल रही थी... कि तभी सड़क से किसी की बारात निकली... बारात में लोग डांस कर रहे थे... वो भी डांस करने लगी... और डांस करते हुए वो कुछ आगे चली गयी। फिर उसे ख्याल आया कि उसे वापस जाना चाहिए। वो वापस आने लगी... लेकिन वापसी में किसी गलत सड़क पर मुड़ गई और फिर सही रास्ते की तलाश में पता नहीं कहा से कहां होते हुए वो बहुत दूर चली गयी। आंसू भरे हुए त्रिशा रोते-रोते पता नहीं कैसे भगत सिंह चौक के पास पहुंच गयी... इत्तेफाक से उसे वहां पर गौपाल भैय्या मिल गए... फिर वो उसे घर लाए... 

सबकी आंखें गोपाल की तरफ चली गयीं। वो अभी भी बिल्कुल शांत खड़ा था। तुम वहां क्या कर रहे थे...
साहब, हम काम पाने के लिए खड़े थे... दिन की मजदूरी खत्म करके आए थे... सोचा डबल शिफ्ट कर लें...  नाइट शिफ्ट के लिए मज़दूर वहां खड़े होते हैं... तो हम भी...

अचानक ऐसा लगा जैसे हम सब लोगों पर किसी ने मनों मिट्टी डाल दी हो और हम किसी गहरे गड्ढे में दब कर रह गए हों। ज़ैदी साहब और मैं एक दूसरे की तरफ शर्मिंदगी से देख रहे थे। गोपाल आगे बोला, त्रिशा बिटिया को घर लाना था... मगर पैसे नहीं हमारे पास ... तो पैदल ही आना पड़ा... इसलिए टाइम लग गया... मुझे पता था आप लोग परेशान होंगे

मेरे चेहरे और मन में गोपाल के लिए जो गुबार भरा था... वो अब एक ऐसी शर्मनाक आइने में बदल गया था जिसमें हम अपनी सूरत देख रहे थे।

कमरे में एक अजीब सी खामोशी थी... वो खामोशी मेरे और अलका के सीने को चीरती चली जा रही थी। मैंने एक गहरी सांस ली और थोड़ा आगे बढ़ते हुए कहा, आ... बहुत... बहुत बहुत शुक्रिया तुम्हारा। हम लोग वाकई बहुत परेशान थे। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। तो... तुम अभी मज़दूरी करते हो...

जी साहब... कुछ तो करना ही था... नौकरी नहीं तो... यही करने लगे...

हम्म... आ... हमने किसी और को रख लिया है लेकिन ... मैं मैं... बात करूंगा कि... तुम... तुम वापस....

गोपाल बिना कुछ बोले.... बस मेरी तरफ देखता रहा... जिससे मैं कुछ और अनकंफर्टेबल होने लगा।

मैंने... उस पल अपनी झेंप मिटाने के लिए अपनी जेब से बटुआ निकाला और पांच सौ के दो नोट निकालकर उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा... ये... ये रख लो... फिलहाल... तुमने बहुत मदद की हमारी...

अरे नहीं साहब.. क्या कर रहे हैं आप... मदद की क्या बात...बिटिया दिखी तो लाना ही था... नहीं इसकी ज़रूरत नहीं है... आप रखिए इसको...

ऐसा लगा जैसे मेरे मुंह पर एक तमाचा पड़ा... उसकी सौम्यता या शराफत बार बार मुझपर खामोशी से कोड़े चला रही थी। अलका, ज़ैदी साहब और आयशा जी मेरी तरफ इस तरह देख रहे थे जैसे मैं गोपाल की हर बात से ज़लील हो रहा था। खामोशी से।

मैंने अपने बड़प्पन को बचाने के लिए कुछ आवाज़ कड़क करते हुए और एक नोट वापस लेते हुए कहा, अरे कोई बात नहीं... चलो ये तो ले लो.... अपनी बेटी के लिए मिठाई ले लेना... लो...

मैंने ज़बरदस्ती उसके हाथ में एक पांच सौ का नोट कुछ ताकत से थमा दिया... तो वो एक पल नोट देखता रहा... फिर उसने चेहरा उठाया तो आंखों में पानी था... बोला...साहब... मिठाई अब किसके लिए ले जाऊं.... बिटिया अब नहीं रही... वही दिन जब हम अस्पताल में थे... नौकरी छूटने के बाद... दो दिन बाद ही वो चल बसी....

उसकी कांपती आवाज़ जैसे ही कानों में पड़ी दिल किया कि मैं अभी सड़क पर चीखते हुए दौड़ना शुरु कर दूं और किसी ऊंची पहाड़ी से कूद कर सब खत्म कर लूं... कुछ नहीं था मेरे पास कहने के लिए... और कुछ भी कहना फज़ूल था। मैं बस उसे देखता रहा... वो मेरी तरफ आया.... उसकी आंखों से आंसू टपककर गालों पर लकीर बना रहे थे। उसने मेरी हथेली पकड़ी और मेरे हाथ पर वो मुड़ा हुआ नोट रखकर... वापस जाने लगा। आहिस्ता कदमों से दरवाज़े से निकलकर उसने पलटकर नहीं देखा।

वो जा चुका था... सब लोग अंदर वाले कमरे में चले गए। मैं वहीं खड़ा रहा... ऐसा लग रहा था जैसे आज मेरा कद अचानक बहुत कम हो गया... उस रात गोपाल बड़ा हो गया था और मैं छोटा... मेरा वजूद उसी मुड़े हुए पांच सौ के नोट की तरह मेरी हथेली में चुभ रहा था।

---- समाप्त ----

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