कहानी | छुट्टी का एक दिन | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद कमर सिद्दीक़ी

उस कड़कड़ाती ठंड की सुबह, स्कूल में बतौर टीचर पढ़ाने वाले एक साहब जब स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे कि तभी उन्हें रेडियो पर खबर मिली कि सर्दी की वजह से आज डीएम साहब ने पूरे ज़िले में दसवीं तक के स्कूलों की छुट्टी कर दी है। वो मारे खुशी के उछल पड़े लेकिन तभी उनके दिमाग में आयी एक शरारत... - सुनिए 'छुट्टी का एक दिन' स्टोरीबॉक्स में जमशेद कमर सिद्दीक़ी से

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Storybox - Chutti Ka Ek Din Storybox - Chutti Ka Ek Din

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • नोएडा,
  • 24 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 1:29 PM IST

कहानी - छुट्टी का एक दिन 
जमशेद कमर सिद्दीक़ी

 

एक इंसान होश कब संभालता, कब वो मैच्योर माना जाता है... इस सवाल के यूं तो कई जवाब हो सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि इसका सबसे सही जवाब ये है कि आदमी तब मैच्योर हो जाता है जब वो सर्दी के मौसम में ये बता सके... कि इस बार की सर्दी ने कितने सालों का रिकॉर्ड तोड़ा है। जिस तरह हर गांव में एक ऐसा बूढ़ा होता है जिससे किसी न कि    सी भूत ने बीड़ी मांग के पी होती है... उसी तरह हर खानदान में एक आदमी ऐसा होता है जो इतना तजुर्बेकार होता है कि बता सके कि इस बार की सर्दी ने कितने साल का रिकॉर्ड तोड़ा है। और ऐसे ही तजुर्बेकार आदमी थे ओंकार नाथ पांडे.. जिन्हें पूरा मुहल्ला – ताऊ जी कहता था। तो कड़कड़ाती सर्दियों की सुबह थी। ताउ जी ग़ुसलखाने में नेकर पहनकर पटरी पर बैठे थे। और सामने रखे गर्म और ठंडे पानी की दो बाल्टियों को तीसरी बालटी में ऐसे डाल रहे थे जैसे कोई साइंटिस्ट लैब में कोई बहुत बड़ा एक्सपैरिमेंट कर रहा हो। दो मग्गे पानी डालते और फिर हाथ गड़ाप से पानी में डालते और भंवे ऊपर करके अंदाज़ा लगाते कि इतने गर्म पानी में खाल झुलस तो नहीं जाएगी... या थोड़ा सा और ठंडा पानी मिलाया जाए... वो ये सब कर ही रहे थे कि ठीक उसी वक्त आंगन से ताई जी की आवाज़ गूंजी.... 
– अरे सुनते हो... हो कि नाली से बह गए नहाते-नहाते? ... आ रहे हैं अभी...  (बाकी की कहानी के लिए नीचे स्क्रॉल करें। या अगर इसी कहानी को ऑडियो में सुनना है तो ठीक नीचे Spotify या Apple Podcast का लिंक दिया है) 

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 अरे कहां जा रही हो... ताऊ जी गुसलखाने में पानी मग्गे से फर्श पर फेंकते हुए पूछा ताकि आवाज़ से लगे कि वो नहीं रहे हैं। ताई जी ने कुड़ के कहा - शॉपिंग करने जा रहे हैं। ऐं नहीं तो... अरे कहां जाएंगे ब्रेड लेने जा रहे हैं और कुछ है हमाई किस्मत में। बर्बाद हो गए इस भटियारे खानदान में शादी करके... प्राइमरी स्कूल में टीचर की नौकरी करने वाले ताऊ जी की शादी को 12 साल हो गए थे... ये बाइस साल कैसे गुज़र गए पता ही नहीं चला। वो कभी कभी सोचते थे कि शुरुआत के साल कितने अच्छे थे जब वो रात को घर लौटते वक्त छेना रसगुल्ले का डिब्बा और दो बढ़िया वाले पान प्लास्टिक की थैली में छुपा ताई जी के लिए लाते थे... ताकि अम्मा या बाउजी न देख ले... पैकेट लिए सीधे अपने कमरे में लुप्प से घुस जाते थे। उन दिनों में उनकी सरकारी नौकरी नहीं लगी थी... तब वो किसी प्राइवेट कंपनी में काम करते थे... पर उस वक्त की अपनी अलग मौज थी। शादी के शुरु के दिनों में वो कभी कबार की वो शरारतें कितनी अच्छी थीं कि जब उन दोनों को बाहर घूमना होता था तो अम्मा-बाउजी से झूठ बोल देते थे कि ताइजी के खानदान में किसी की अचानक तबियत बिगड गयी है... फौरन निकलना होगा। बाउजी कहते, हां हां बेटा... जाओ... संभाल कर जाना... बस फिर क्या... पुरानी स्कूटर पर पीछे बैठी ताई जी और हैंडल संभाले ताऊ जी फिर शांतनू टॉकीज़ में बैठ कर फिल्म देखते और फिल्म के बाद साउथ इंडियन रेस्टोरेंट में खाना खाते और देर रात घर लौटते... 
कैसी तबियत है अब उनकी – जब वापसी पर अम्मा पूछती तो ताऊजी कहते... आ...हां... अब तो.. अब तो ख़ैर ठीक है... जॉनडिस बताया है डॉक्टर ने.... बता रहे हैं कि तबियत धीरे-धीरे संभलेगी... देखो कहीं एक दो दिन में फिर से न जाना पड़ जाए.... 
उनके ये कहते ही सामने अलमारी से कुछ निकाल रही ताऊजी चौंक कर उनकी तरफ देखती और अपनी हंसी रोक लेतीं। 
ये शुरु शुरु की शरारतें, ये मस्ती... सब बाउजी और अम्मा के जाने साथ ही जैसे चला गया। अब तो बस एख दूसरी की जैसे आदत हो गयी थी। ताइ जी बस पूरे दिन बोलती रहतीं कि उनकी ज़िंदगी अज़ाब बन गयी है... खुशी का कोई मौका नहीं है... न कोई उमंग है न ज़िंदगी का रंग.... पर ताऊ जी को भी जैसे आदत हो गयी थी। एक कान से सुनते थे और दूसरे से निकाल देते थे। हालांकि ताई जी को अब भी शौक था घूमने-फिरने का शॉपिंग का.... वो तो बल्कि अब भी नौकरी की कोशिश कर रही थीं। पिछले कुछ दिनों से वो बीएड कोर्स करने का मन बनाए थी। चाहती थीं कि वो भी बीएड करके सरकारी टीचर की नौकरी के लिए अप्लाई करेंगी ताकि वो भी ताऊजी की तरह सुबह सुबह तैयार होकर बिना रसोई की फिक्र किये... काम पर जा सके। क्योंकि ज़िंदगी में कोई रंग बचा ही नहीं था... ले दे के एक इतवार आता था... उसमें भी ये महा-बोरिंग आदमी दरवाज़े के कब्ज़ों में तेल डालते हुए गुज़ार देता था।  
ख़ैर.... हू-हू करते हुए ताऊ जी तौलिया लपेटे ग़ुसलखाने से बाहर आए तो पहले तो दरवाज़ा बंद किया। फिर रेडियो ऑन किया और अलमारी के सामने खड़े होकर स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगे। अभी पैंट की एक पायचे मे पैर डाला था कि रेडियो पर आ रही ख़बर से उनका दूसरा पैर हवा में ही रुक गया। शीतलहर का प्रकोप देखते हुए, ज़िलाधिकारी के आदेश से आज शहर के 12वीं तक के सभी स्कूल-कॉलेज बंद रहेंगे। चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई, तभी किसी ने बाहर वाला दरवाज़ा भड़भड़ाया- अरे काहे कस लेते हो दरवाज़ा, कौन सा अंदर तुमा खानदानी खजाना भरा है... खोलो। ताऊ जी एक पायचे में पैर डाले और दूसरा हाथ में थामें हुए दरवाज़े की तरफ भागे... दरवाज़ा खोला। ताई जी खड़ी थीं। ताऊ जी का मूड छुट्टी की वजह से अच्छा हो चुका था... दिल्लगी करते हुए बोले, अरे कहां इतनी ठंड में अकेले-अकेले घूमा करती हो... हमें बता देती... हम ला देते सामान
उनके एक तरफ खिसकाते हुए ताई बोलीं, अरे हटो रास्ते से.. दांत किटकिटा गए, इनको मसखरी सूझ रही है. यहां मरते-खपते रहो, किसी को परवाह नहीं हमाई। तभी दूसरे पैर में पैंट चढ़ाते हुए ताऊ की आंखों में शरारत चमकी। उनके पीछे पीछे रसोई में आए और कुछ सोचकर बोले - सुनो, ऐ, सुना ना। सच्ची कितना काम करती हो तुम... चलो आज तुम्हाए लिए, सिर्फ तुम्हाए लिए छुट्टी कर लेते हैं। दोनों, घर पर पूरा दिन साथ बिताएंगे। हल्की धूप निकल आए तो चलो छत पर, दोनों लोग मगरमच्छ की तरह लंबे लंबे पूरे दिन पड़े रहेंगे... क्या ख़्याल है
ताई जी मुस्कुराईं। पलट कर बोलीं... सच? सच मैं छुट्टी लोगे तुम.... 
इन्होंने किसी हीरो की तरह कहा...  हां क्यों नहीं, तुम्हारे लिए इतना तो कर ही सकते हैं... 
वो बेलन एक तरफ रखते हुए बोलीं... तो फिर एक काम करते हैं... घर में नही बैठते। बीएड वाला फॉर्म जमा कर आते हैं डिग्री कॉलेज।
ताऊ जी अब फंस गए। ये कह नहीं सकते थे कि आज सारे कॉलेज बंद है। अगर बताते कि बंद हैं तो बात फिर दूर तक निकलती... फिर ये भी भंडा फूट जाता कि इनके स्कूल की छुट्टी है। लिहाज़ा अब ये एक ऐसी सिचुएशन में फंस गए थे... जिसमें न निगलते बन रहा था न उगलते। 
आ.... हां... मतलब चल सकते हैं... लेकिन... मतलब... ठीक है... ताऊ जी से कुछ कहते नहीं बन रहा था। लेकिन तभी उन्हें एक तरीका सूझा। स्कूल तो सिर्फ 12वीं तक ही बंद हैं इसलिए उन्होंने तरकीब सोची... कि ऐसा करेंगे कि किसी डिग्री कॉलेज जाएंगे... वो तो खुला होगा और फॉर्म तो वहां भी जमा हो जाएंगा.... 
एक मोटी स्वेटर, ऊपर से जैकेट गर्दन पर मोटा सा मफलर लपेटे ताऊ जी.... स्कूट पर भर्र से चले जा रहे थे और पीछे बैठी ताई जी... अपना नया वाला गुलाबी स्वेटर पहने और मेरठ वाली शादी में खरीदा पर्स कंधे पर टांगे... बड़ी अदा से उनके कंधे पर हाथ जमाए थीं। 
ताऊ जी मन ही मन अपने दिमाग पर नाज़ कर रहे थे, खुद को बहुत शातिर समझ रहे थे कि वाह क्या दिमाग पाया है मैंने....ऐसी चाल चली की मैडम को ज़रा खबर नहीं हुई... कि ये छुट्टी का दिन हमारी नहीं, सरकार की तरफ से मिला है... 
स्कूटर के हैंडल पर कसी उंगलियों पर ठंडी हवाएं टकरा रही थी... लेकिन वो चले जा रहे थे... कि तभी चौराहे से थोड़ा पहले ताई जी ने गला खंखारा, और ताऊ जी की पीठ में उंगली कोंचते हुए कहा... अए रुको... ज़रा .. ऐ... सुनो.. 
क्या हुआ... ताऊ जी स्कूटर आहिस्ता करते हुए बोले
वो बोलीं, मैसेज पर शालिनी से बात हो रही थी.. 
ताऊ जी ने स्कूटर किनारे लगाई ... एक पैर से टेकते हुए बोले... शालिनी... क्या कह रही है 
ताई बोलीं - वो यहीं पास वाले मॉल में है... बता रही है कि आज तो सारे कॉलेज बंद है। ताऊ जी के कान गर्म हो गए... फौरन अंदर के एक्टर को बाहर निकालते हु बोले,.. 
-    क्या.. अरे.. ये तो अजीब इत्तिफाक हो गया... हैरानी दिखाने के लिए ताई जी के हाथ से उनका मोबाइल लेते हुए बोले, दिखाओ... अरे  ओहोहोहो... खबर पढ़ते हुए बोले... मतलब.. हेहेहे... यकीन नहीं हो रहा.. बताऊ.... मतलब आज ही मैंने छुट्टी का मन बनाया और आज ही... देखो पूरी कायनात चाहती थी कि मैं तुम्हारे साथ बाहर निकलूं... हेहे... तो चलो फिर वापस घर चलते हैं। ताऊ जी ने निहायत घटिया एक्टिंग करते हुए कहा। वो बोलीं
-    अरे रुको, फिर कुछ सोच कर कहा, सोच रहे हैं कि जब आए हैं तो शालिनी से ही मिल लेते हैं... मॉल की तरफ ही मोड़ लो
अब और कोई चारा तो था नहीं ताऊ जी के पास... मोड़ दी स्कूटर... मॉल पहुंचते ही ताई जी गाड़ी से निकलकर फुर्ती से मॉल के अंदर चली गई। ताऊ जी स्कूटर पार्किंग वाले से पर्ची लेने में लग गए। स्कूटर खड़ी करके मॉल में जाते हुए उनका फोन बजा... चौंक कर देखा कि ताई जी का मोबाइल तो उन्हीं के पास रह गया था... जब उन्होंने मोबाइल ताई के हाथ से लिया था। मोबाइल वापस जेब में रखने ही वाले थे कि तभी कुछ सोच कर मैसेज पर टैप किया। और जो पढ़ा वो पढ़ कर वो बीच सड़क पर रुक गए.... दो गाड़ियां लड़ते लड़ते बचीं।

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to be continued

 

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