कहानी : बोहनी... प्रेम चंद के पान की | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

मैंने पान वाली से कहा, "ज़रा एक पानी बना दो, कथ्ता ज़्यादा, चूना कम" उसने सुना लेकिन अनसुना कर दिया। मैं अकेला ग्राहक था पर वो दूसरी तरफ देख रही थी। "अरे क्या हुआ, पान क्यों नहीं देती" मैंने पूछा तो बोली, "कोई और ग्राहक आ जाने दीजिए साहब, आपके हाथ की बोहनी ठीक नहीं है। कल सुबह आपने बोहनी की थी तो दिनभर में सिर्फ दो रुपए बने" सुनिए प्रेमचंद की लिखी कहानी 'बोहनी' स्टोरीबॉक्स में, जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से

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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • नोएडा ,
  • 13 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 1:49 PM IST

कहानी - बोहनी 
 मुंशी प्रेमचंद 
 


उस दिन जब मेरे मकान के सामने सड़क की दूसरी तरफ एक पान की दुकान खुली तो मैं खुशी का ठिकाना नहीं था। इधर एक फर्लांग तक पान की कोई दुकान जो नहीं थी और इसीलिए मुझे एक पान खाने के लिए सड़क के मोड़ तक कई चक्कर करने पड़ते थे। कभी तो वहां कई-कई मिनट तक दुकान के सामने खड़ा रहना पड़ता था। भीड़ भाड़ अलग। चौराहा है, तो गाहकों की हमेशा भीड़ रहती थी। और यह इन्तजार मुझको बहुत बुरा लगता था। पान की लत मुझे कब पड़ी, और कैसे पड़ी, यह तो अब याद भी नहीं आता लेकिन अगर कोई बना-बनाकर गिलौरियां देता जाय तो शायद मैं कभी इन्कार न करूं। आमदनी का बड़ा हिस्सा नहीं भी, तो एक छोटा हिस्सा जरूर पान की भेंट चढ़ जाता है। कई बार इरादा भी किया कि पानदान खरीद लूंगा लेकिन पानदान खरीदना कोई खाला जी का घर तो है नहीं। और फिर मेरे लिए तो हाथी खरीदने से किसी तरह कम नहीं है। 

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खैर, तीन-चार दिन के बाद एक दिन मैं सुबह के वक्त तम्बोलिन की दुकान पर गया और पान मांगा... अरे भई एक पान खिला दो... मैंने कहा, उसने मेरी तरफ नज़र की... पर कोई हड़बड़ाहट नहीं दिखाई। अपने काम में लगी रही। एक मिनट तक तो पान फेरती रही, फिर अन्दर चली गयी और कोई मसाला लिये हुए निकली। मैं दिल में खुश हुआ कि आज बड़ी तैयारी से गिलौरियां बना रही है। मगर अब भी वह सड़क की ओर इंतज़ार की आंखों से ताक रही थी... जैसे उसे किसी और पान के शौकीन ग्राहक का इंतज़ार है, औऱ मैं जो खड़ा था... मेरी तरफ उसका ध्यान ही नहीं था। मैं भी तो ग्राहक ही था... लेकिन वो मेरी तरफ देख ही नहीं रही थी। न जाने किसका इंतज़ार कर रही थी। मुझे ज़रा बुरा लगा। मैंने झुंझलाकर कहा— मैं कितनी देर से खड़ा हूं, नज़र नहीं आता क्या तुमको... 

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तम्बोलिन ने माज़रत भरी आवाज़ में कहा - हां बाबू जी, आपको देर तो बहुत हुई लेकिन एक मिनट और ठहर जाइए। बुरा न मानिएगा बाबू जी, आपके हाथ की बोहनी अच्छी नहीं है। 
हैं... बोहनी अच्छी नहीं है। सुनकर मैं चौक गया। वो बोली
कल दुकान में सबसे पहला पान आप ने खरीदा था... बोहनी आप से ही हुई थी... लेकिन उसके बाद पूरे दिन में सिर्फ छ: आने की बिक्री हुई।
मैं उसकी तरफ हैरानी से देख रहा था.... वो बोले जा रही थी। 

ये तो कल की बात हुई, परसो भी आप ही की बोहनी थी, आठ आने के पैसे दुकान में आये थे। अरे इसके पहले दो दिन पंडित जी की बोहनी हुई थी, दोपहर तक ढाई रूपये आ गये थे। फिर वो मुझे ही दिलासा देते हुए बोली, लेकिन कोई बात नहीं बाबूजी, होता है. कभी किसी का हाथ अच्छा नहीं होता... वो इस तरह कह रही थी जैसे ये मेरी कोई कमी है और मुझे इसके लिए शर्मिंदा होना चाहिए। अजीब बात ये थी कि मैंने भी महसूस किया कि मुझे बिला वजह पंडित जी से जलन होने लगी, जब कि मेरा कोई लेना देना नहीं था। ऐसा लग रहा था कि मुझे गाली पड़ रही है। 

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मुझे अपने किस्मत वाला होने का कोई दवा नहीं है, मुझसे ज्यादा बदकिस्मत लोग दुनिया में नहीं होंगे। इस साम्राज्य का अगर में बादशाह नहीं भी, तो कोई ऊंचा मंसबदार जरूर हूं। लेकिन यह मैं कभी गवारा नहीं कर सकता कि मनहूसियत का दाग बर्दाश्त कर लूं। कोई मुझसे बोहनी न कराये, लोग सुबह को मेरा मुंह देखना अपशगुन समझे, यह तो बडी बेइज़्ज़ती की बात है। अरे तौबा। 

मैंने पान तो ले लिया लेकिन दिल में पक्का इरादा कर लिया कि इस नहूसत के दाग को मिटाकर ही छोडूंगा। भारी कदमों से कमरे की तरफ आ गया। अभी आ कर बैठा ही था कि मेरे एक दोस्त आ गये। बाज़ार से सब्ज़ी लेने जा रहे थे। अजीब हाल था मैं ये सोचने लगा कि अगर मैं इन साहब को तंबोलिन की दुकान पर भेज दूं पान खाने के लिए तो मुझ पर से मनहूस होने का दाग मिट जाएगा। मैंने कहा, सुनो यार... पान बहुत शानदार बनाती है, अरे पास में ही है दुकान... तंबोलिन की... मैंने उनसे तम्बोलिन की तारीफ भी की। वो यूं भी शक्ल ओ सूरत की अच्छी थी है और ये साहब जरा सैंदर्य-प्रेमी भी थे। मिसकीन सूरत बनाकर बोले, अच्छा इस वक्त तो भाई, मेरे पास पैसे नहीं हैं और वैसे... अभी पान खाने का मन भी.... 
- अरे पैसे की क्या बात करते हो... मैंने उनकी बात काटी... पैसे मुझसे ले लो।
मैंने उनकी नज़रों में लालच देखी... उन्हें लगा कि जब ये उधार देने को उतना उतावला हो ही रहा है तो क्यों उधार मांफ भी करवा लें... बोले...
'अच्छा.... चलो तुम इतना कह रहे हो ... तो मंजूर है, लेकिन सुनो... कभी तकाजा मत करना... मुझे तकाज़ा बिल्कुल भी... '
हां हां ठीक है... समझ गए... जाओ... ये लो 
मजबूर होकर उन हज़रत को एक ढोली पान के दाम दिये। सड़क पर चलते हुए कभी ऐसा हुआ है आपके साथ कि आप के बगल में चलता हुआ अजनबी... जिसे आप जानते तक नहीं... वो ज़रा आपसे आगे निकला तो आप बेवजह उससे रेस करने लगते हैं। आप को लगता है वो तेज़ चलकर, आप से आगे निकलकर आपको नीचा साबित करना चाहता है... आप रफ़्तार बढ़ा देते हैं... हांफने लगते हैं लेकिन तेज़ चाल चलते रहते हैं। मेरे साथ वही हो रहा था। 
उन हज़रात को भेजने के बाद... मुझे अजीब सनक हो गयी... कुछ दिन तक जो भी मुझसे मिलने आए... मैं इधर उधर की बात के बाद कहूं, “अरे वो दुकान देखी है पान की... तम्बोलिन वाली... क्या पान बनाती है... मज़ा आ जाती.... खाएंगे आप... खा कर आएये...” बातों बातों में मैं तम्बोलिन की तारीफ भी कर देता... तो धीरे-धीरे मेरे दोस्त यार मेरा मज़ाक उड़ाने लगे। मुझे ख्याल ही न रहा कि इसका कोई और मतलब भी निकल सकता है। 
दोस्त फबतियां कसते, 'छिपे रुस्तम’, 'भगतजी हम्म’ और न जाने क्या-क्या नाम दिये गये लेकिन मैंने सारी आफतें हंसकर टालीं। क्योंकि यह दाग मिटाने की मुझे धुन सवार हो गयी थी। पर कुछ भी कहिए साहब.... क़िला तो मैंने फतह कर ही लिया था। और इसका सबूत ये है कि कुछ दिन के बाद जब मैं तम्बोलिन की दुकान पर गया तो उसने फौरन पान बनाये और बहुत अदब से मुझे देती हुई बोली, साहब, आप ने रोज़ बोहनी करा दिया करो बस। 
उसके बोले इस जुमले की मेरी ज़िंदगी में कोई अहमियत नहीं थी... पर फिर भी मुझे लगा कि मैंने कोई बड़ी डिग्री हासिल कर ली... मैं जीत गया हूं। 

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कई दिन लगातार मैंने दोस्तों से सिफारिशें कीं, तम्बोलिन की स्तुति गायी और अपनी गिरह से पैसे खर्च करके सुर्खरुई हासिल की। लेकिन इतने ही दिनों में मेरे खजाने में इतनी कमी हो गयी कि खटकने लगी। यह नाटक अब ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता था, इसलिए मैंने इरादा किया कि कुछ दिनों उसकी दुकान से पान लेना छोड़ दूं। जब मेरी बोहनी ही नहीं होगी, तो मुझे उसकी बिक्री की क्या फिक्र होगी। दूसरे दिन हाथ-मुंह धोकर मैंने एक इलायची खा ली और अपने काम पर लग गया। लेकिन मुश्किल से आधा घण्टा बीता हो, कि किसी की आहट मिली। आंख ऊपर को उठाता हूं तो तम्बोलिन गिलौरियां लिये सामने खड़ी मुस्करा रही है। मुझे इस वक्त उसका आना जी पर बहुत भारी गुजरा लेकिन इतना बेमुरौवती भी तो नही हो सकता था कि दुत्कार दूं। मैंने बोला, अरे तुमने बेकार तकलीफ की, मैं तो आ ही रहा था।

तम्बोलिन ने मेरे हाथ में गिलौरियां रखकर कहा—आपको देर हुई तो मैंने कहा मैं ही चलकर बोहनी कर आऊं। दुकान पर ग्राहक खड़े हैं, मगर किसी की बोहनी नहीं करने दी मैंने... 

मैं मुस्कुराया, पता नहीं क्यों एक गर्व की अनूभूति सी हुई। मैंने बहुत अदब से गिलौरिया खायीं और बोहनी करायी। लेकिन जिस फिक्र से मैं आज़ाद होना चाहता था वह तो फन्दे की तरह गर्दन पर चिपटी हुई थी। मैंने सोचा था, मेरे दोस्त कुछ दिन उसके यहां पान खायेंगे तो फिर खुद ही खाने लगेंगे और मेरी सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मगर तम्बोलिन के पान मंहगे थे, इसलिए एक बार जो उसकी दुकान पर गया, दुबारा नहीं गया। एक-दो रसिक किस्म के नौजवान अभी तक आते थे, वह लोग एक ही हंसी में पान और उसके रूप-दर्शन दोनों का आनन्द उठाकर चलते बने थे। आज मुझे अपनी साख बनाये रखने के लिए फिर पूरे डेढ़ रुपये खर्च करने पड़े, बधिया बैठ गयी।
दूसरे दिन मैंने दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया, मगर जब तम्बोलिन ने नीचे से चीखना, चिल्लाना और खटखटाना शूरू किया तो मजबूरन दरवाजा खोलना पड़ा। आंखें मलता हुआ नीचे गया, जिससे मालूम हो कि आज नींद आ गयी थी। फिर बोहनी करानी पड़ी। और फिर वही बला सर पर सवार हुई। शाम तक दो रुपये का सफाया हो गया। अब मैं इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए तरकीबें लगाने लगा। बहुत कोशिशें की... लेकिन आखिर में यही हल निकला कि वो घर छोड़ दूं। 
मैंने वहां से दो मील पर एक अनजान मुहल्ले में एक मकान ले लिया और रातो-रात अपना सामान वगैरह उठवाकर वहां जा पहुंचा। वह घर छोड़कर मैं जितना खुश हुआ शायद कैदी जेलखाने से भी निकलकर भी उतना खुश नहीं होता होगा। रात को खूब गहरी नींद सोया, सुबह हुआ तो मुझे उस पंछी की आजादी का अनुभव हो रहा था जिसके पर खुल गये हैं। बड़े इत्मीनान से सिगरेट पी, मुंह-हाथ धोया, फिर अपना सामान ढंग से रखने लगा। खाने के लिए किसी होटल की भी फिक्र थी, मगर उस हिम्मत तोड़नेवाली बला से फतेह पाकर मुझे जो खुशी हो रही थी, उसके मुकाबले में इन चिन्ताओं की कोई गिनती नहीं थी। मुंह-हाथ धोकर नीचे उतरा। आज की हवा में भी आजादी का नशा था हर एक चीज मुस्कराती हुई लगती थी। खुश-खुश एक नई दुकान पर जाकर पान खाये और ज़ीने पर चढ़ ही रहा था कि देखा तो तम्बोलिन इधर लपकी आ रही थी। अरे कुछ न पूछो, उस वक्त दिल पर क्या गुजरी। बस, यही जी चाहता था कि अपना और उसका दोनों का सिर फोड़ लूं। मुझे देखकर वह ऐसी खुश हुई जैसे कोई धोबी अपना खोया हुआ गधा पा गया हो। और मेरी घबराहट का अन्दाजा बस उस गधे की दिमागी हालत से कर लीजिए! उसने दूर ही से आवाज़ लगाई – अरे वाह भई वाह, आप तो ऐसा भागे कि किसी को पता भी नहीं लगा। मैं घबराया सा रुक गया... वो पास आकर बोली अरे मुझसे कहा तो होता कि उस घर में कोई दिक्कत है। उसी मुहल्ले में एक से एक अच्छे घर खाली हैं। बल्कि मेरे घर के पीछे ही एक बड़े आराम का मकान था। मैं बस अरे वो... कुछ नहीं बस वो.. हे हे हे करता रहा। वो ऐसे अपने पल से बोली, चलिए मैं अब आपको यहां नहीं रहने दूंगी। जिस तरह हो सकेगा, आपको उठा ले जाऊंगी। कितना किराया है इस घर का 
मैंने रोनी सूरत बना कर कहा—दस रुपये।
अब बात ये है कि किराया था बीस रुपए लेकिन मैंने कहा दस.. ताकि ये दलील उसके हाथ से निकल जाय कि घर तो बहुत महंगा है। लेकिन तम्बोलिन इस चकमे में नहीं आई। तुनक कर बोली – हैं.. इस जरा-से घर के दस रुपये! आप आठ ही दीजियेगा और घर इससे अच्छा न हो तो जब भी जी चाहे छोड़ दीजिएगा। चलिए, मैं उस घर की कुंजी भी ले आई हूं, ये देखिए... कहते हुए उसने कुछ चाभियां दिखाईं। चलिए फिर अभी इसी वक्त आपको घर दिखा देती हूं... वो इतनी बेसब्र हो गयी थी कि उसने मेरा हाथ पकड़ कर चलना ही शुरु कर दिया। बल्कि कुछ कदम तो मैं चल भी दिया। फिर मुझे गुस्सा आया... मैंने हाथ झटका और कहा, अरे छोड़ो... कमाल करती हो मैंने त्योरी चढ़ाते हुए कहा आज ही तो इस घर में आया हूं, आज ही छोड़ कैसे सकता हूं। एडवांस दे चुका हूं... ऐसे कैसे... हैं.. मतलब... 
 

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क्रमश:

(पूरी कहानी सुनने के लिए Spotify या Apple podcast के ऊपर दिए लिंक पर क्लिक करें। या फिर सर्च करें Storybox with Jamshed Qamar Siddiqui) 

 

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