ऑडियो कहानी | त्रास: कहानी दिल्ली की एक सड़क की | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

मेरी कार से उस साइकिल सवार की टक्कर हो गयी थी। ग़लती तो मेरी ही थी लेकिन दिल्ली की सड़क पर एक्सीडेंट के बाद बचाव का तरीका यही है कि गुस्सा करते हुए बाहर निकलो, ताकि लगे ग़लती दूसरे की है - सुनिए भीष्म साहनी की कहानी 'त्रास' स्टोरीबॉक्स में जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से

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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • नोएडा,
  • 03 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 3:54 PM IST

कहानी - त्रास
भीष्म साहनी

ऐक्सिडेंट पलक झपकते ही हो गया। और ऐक्सिडेंट की जमीन भी पलक झपकते ही तैयार हुई. पर मैं गलत कह रहा हूँ. उसकी जमीन मेरे मन में सालों से तैयार हो रही थी. हाँ, जो कुछ हुआ वह जरूर पलक झपकते ही हो गया. वह साइकिल पर था और मैं कार चला रहा था. न जाने वह आदमी कौन था. कार के सामने आया तो मेरे लिए उसका कोई वजूद बना, वरना अनगिनत लोगों की भीड़ में खोया रहता जिस पर मेरी तैरती नजर घूमती रहती है. एक्सीडेंट के ऐन पहले उसने अचानक मुड़कर मेरी तरफ देखा और पल-भर के लिए हमारी आँखें मिली. उसकी गँदली-सी आँखें खुद को अचानक उस हालात में पाकर फैल गईं. न जाने उसे मेरी आँखों में क्या नजर आया था (बाकी कहानी नीचे पढ़ें) 

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(बाकी कहानी यहां से पढ़ें) ऐन हादसे के लम्हें तक पहुँचते-पहुँचते मेरा दिमाग धुँधला जाता है, मेरी चेतना दाएँ पैर के पंजे पर आकर लड़खड़ा जाती है और सारा मंज़र किसी टूटते घर की तरह दरहम-बरहम हो उठता है क्यों कि मैंने उस लम्हें ब्रेक को दबाने की बजाय, ऐक्सीेलरेटर को दबा दिया। रफ्तार धीमी करने की बजाय और तेज कर दिया था. मैंने ऐक्सी लरेटर को ही नहीं दबाया, उसके पीछे गाड़ी को थोड़ा मोड़ा भी, जब वह मेरे सामने से रास्ताे काटकर लगभग आधी सड़क लाँघ चुका था तभी उसने घबराकर मेरी तरफ देखा. फिर खटाक् की आवाज़ हुई, और कोई चीज उछली थी, जैसे चील झपट्टा मारती है.
जब पहली बार मेरी नजर उस पर गई तो वह मेरे आगे सड़क के किनारे-किनारे बाएँ हाथ बढ़ता जा रहा था. तब भी मेरे मन में उसके प्रति नफरत थी. वह थुल-थुल-सा ठिगने कद का आदमी लगता था, क्यों कि उसके पैर मुश्किल से साइकिल के पैडलों तक पहुँच पा रहे थे. टखनों के ऊपर लगभग घुटनों तक उठे हुए उसे पाजामे को देखकर ही मेरे दिल में नफरत उठी थी या उसकी काली गर्दन को देखकर. अभी वह दूर था और आसपास चलती गाड़ियों की ही तरह मेरी नज़र के दायरे में आ गया था। फिर वह अचानक अपना दायाँ हाथ झुला-झुलाकर मुड़ने का इशारा करते हुए सड़क के बीचोबीच आने लगा था, जैसे जैसे मुझे ललकार रहा हो। तभी मेरे अंदर चिंगारी-सी फूटी. अब भी याद आता है तो सबसे पहले उसका घुटनों तक चढ़ा हुआ पाजामा और काली गर्दन आँखों के सामने आ जाते हैं. वह आदमी दफ्तर का बाबू भी हो सकता था, किसी स्कूल का टीचर भी, या छोटा-मोटा दुकानदार भी हो सकता था... लेकिन वो उनमें से कुछ नहीं था। सुअर का पिल्ला, देखूँ तो कैसे मोड़ काट जाता है. यह भी कोई तरीका है सड़क पार करने का? उसी लमहे-भर में मैंने ऐक्सी.लरेटर को दबा दिया था और कार को थोड़ा मोड़ दिया था. तभी उसने हड़बड़ाकर पीछे की ओर देखा था....
वह लम्हा सुकून का लम्हा था, ज़हर भरा हुआ सुकून. सुअर का बच्चा , अब आए तो मेरे सामने. लेकिन 'खटाक्' शब्द, के साथ ही एक हड़बड़ाती आवाज-सी उठी, और एक पुंज-सा जमीन पर गिरता आँखों के सामने कौंध गया, कुछ वैसे ही जैसे कोई चील झपट्टा मारकर पास से निकल गई हो.
पर इस लम्हें का अहसास होते देर नहीं लगी और मेरा मन लड़खड़ा-सा गया. यह मैं क्याट कर बैठा हूँ? किसी बात को चाहना एक बात है और सचमुच कर डालना बिल्कुयल दूसरी बात. कहीं कोई चीज टूटी थी. यह मैं क्या  कर बैठा हूँ? चलते-चलाते मैंने बखेड़ा मोल ले लिया है.
मैंने ऐक्सीालरेटर को फिर से दबा दिया. हड़बड़ाते ज़हन से आवाज आई, निकल चलो यहाँ से; पीछे मुड़कर नहीं देखो और निकल जाओ यहाँ से. जल्दी
पर मेरा सब काशियस माइंड ज्या दा कॉनशियस था. उसका बैलेंस अभी नहीं टूटा था. सालों पहले किसी ने कहा था कि ऐक्सिडेंट के बाद भागने से रिस्क बढ़ता है, बखेड़े उठ खड़े होते हैं. मेरा पैर ऐक्सी लरेटर पर से हट गया, टाँगों में कंपन हुआ और कार की रफ्तार धीमी पड़ गई. कार रुक गयी। लेकिन तभी जैसे जैसे मेरी टाँगों में पानी भर गया और सारे बदन पर ठंडा पसीना-सा आता महसूस हुआ. यह मैं क्याे कर बैठा हूँ. 
सड़क पर शाम के हल्के-हल्की साए उतर आए थे, वह समय जब अँधेरे के साथ-साथ झीना-सा परायापन सड़कों पर उतर आता है, जब चारों ओर हल्की-हल्की धूल-सी उड़ती लगती है और आदमी अकेला और झेंपा और बेसहारा सा महसूस करने लगता है. सड़क पर आमदरफ्त कम हो चुकी थी. बत्तियाँ अभी नहीं जली थीं. मैं कार का दरवाजा खोलकर नीचे उतर आया. दो-एक कारें उसी तरफ आती हुई धीमी हुई. सड़क के पार पटरी पर कोई औरत चलते-चलते रुक गई थी और इस ओर देखे जा रही थी. उसका हाथ थामे एक बच्चाु भी था.
मैंने उतरते ही सबसे पहले आगे बढ़कर कार का बोनट देखा, लाइट देखीं, पहलू को ऊपर से नीचे तक देखा कि कहीं कोई निशान तो नहीं पड़ा, कहीं रंग तो नहीं उधड़ा। नहीं, कहीं कुछ टेढ़ा नहीं हुआ था। फिर मैं तेवर चढ़ाए पीछे की ओर घूमा, जहाँ सड़क के बीचोबीच वह आदमी गठरी- सा बना पड़ा था, और उसकी साइकिल का पिछला पहिया टेढ़ा होकर अभी भी घूमे जा रहा था.
बचाव का एक ही साधन है, हमला. फटकार से बात शुरू करो. अपनी घबराहट जाहिर करोगे तो मामला बिगड़ जाएगा, लेने-के-देने पड़ जाएँगे.
‘यह क्या  तरीका है साइकिल चलाने का? चलाते-चलाते मुड़ जाते हो? अगर मर जाते तो क्या होता...?’ 
इधर हाथ देते हो, उधर मुड़ जाते हो.’

न हूँ, न हाँ! धूप में झुलसा चौड़ा-सा चेहरा और उड़ते खिचड़ी बाल. उसके लिए उठ बैठना कठिन हो रहा था. शायद जान-बूझकर हिल-डुल नहीं रहा था. मेरे सबकॉनशियस ने फिर मुझे उसकी ओर धकेला, इसकी बाँह थामकर इसे उठा दो. हालात सँभालने का यही तरीका है. मैंने आगे बढ़कर साइकिल को उस पर से हटाया और उस मैले कपड़ों वाले गरीब को गर्दन के नीचे हाथ देकर बैठा दिया. उसने फटी-फटी आँखों से मेरी ओर देखा. उसकी नजर में अब भी पहले-सी शक और त्रास यानि डर था और वह बेसुध हो रहा था. जैसे भूचाल के बाद जैसे कोई आँखें खोले और समझने की कोशिश करे कि कहाँ पर पटक दिया गया है. खून की बूँदें उसके खिचड़ी बालों में कहीं से निकल-निकलकर उसके कोट के कॉलर पर गिर रही थीं.. सड़क पार की ओर से किसी के चिल्लाकने की आवाज आई :
‘ऐसा तेज चलाते हैं जैसे सड़क इनके बाप की है. आदमी को मार ही डालेंगे...’
पटरी पर घाघरे वाली औरत अपनी बच्ची के का हाथ थामे खड़ी चिल्ला रही थी. मेरे दाएँ हाथ की पटरी पर एक आदमी ठिठककर खड़ा हो गया. हैरान होकर। मैंने घूमकर देखा... कोई बूढ़ा था, सूट-बूट पहने, छड़ी डुलाता पटरी पर ठिठका खड़ा था. मेरे देखने पर, पटरी पर से उतर आया.
‘सभी ऐक्सिडेंट साइकिल वाले करते हैं, वह.... इन्हें  बड़ी सड़कों पर आने की इजाजत ही नहीं होनी चाहिए’
वो अंग्रेज़ी में गालियां दे रहा था। तौर-तरीके से भी अँगरेजों के जमाने का रिटायर्ड अफसर लग रहा था। मेरा हौसला बढ़ गया और कहा 
‘अरे भाई साहब बस ये समझ लीजिए... कि .. मैंने कार रोक ली तो बच गया, नहीं तो इसका भुर्ता बन गया होता.’
मैंने ऊँची आवाज में कहा और मेरे जिस्म. में कॉनफिडेंस की हल्की -सी लहर दौड़ गई. उसी पल मुझे जगतराम सुपरिनटेंडेंट का भी ख्याल आया. मेरे भाई का साढ़ू है, पुलिस का अफसर है. मामला बिगड़ गया तो उसे फोन भी कर दूंगा। वो सब संभाल लेगा। 
इधर उधर देखा और फिर मैं वहाँ से चलने को हुआ. मैंने दोनों हाथ पैंट की जेबों में डाल लिए और चलने लगा। सूट-बूटवाला बुजुर्ग मेरे पास आ गया था और फुसफुसाकर बोला:
‘इसे अस्पताल में छोड़ आओ. जैसे भी हो यहाँ से हटाओ. पुलिस आ गई तो मामला बिगड़ जाएगा। वहाँ पर कुछ दे दिला कर मामला निबटा लेना..’
पुलिस के नाम पर फिर मेरी आँखों के सामने जगतराम सुपरिनटेंडेंट का चेहरा घूम गया. फिर से बदन में एक लहर सी दौड़ गई. मैंने आँख घुमाकर उस ज़ख्मी शख्स की तरफ देखा. वह दोनों हाथों में अपना सिर थामे वहीं का वहीं बैठा था. खून की बूँदें रिसना बंद हो गई थीं और कालर पर चौड़ा-सा खून का पैबंद लग गया था. मैंने सोचा, कोई क्लंर्क है शायद. कितने पैसे देने पर मान जाएगा? 
तभी सड़क पार से फिर से चिल्ला ने की आवाज आई :
‘अरे नहीं भई, हमारे सामने पीछे से टक्कर मारी है. हमने अपनी आँखों से देखा है.... ये .. ये ऐसे आए और यूं... यू ही घुसा दी’ औरत की आवाज़ थी। उसने रास्ते से जाते तीन आदमी घेर लिए थे, और अब वो सब मुझे घूरे रहे थे.
‘अगर पुलिस आ गई तो कार यहीं पर छोड़कर जाना पड़ेगा. ख्वामहमख्वा ह का पचड़ा खड़ा हो जाएगा, बरखुरदार....’ सूट-बूटवाले सज्जखन ने बड़ी सधी हुई आवाज में राय दी। 
मैं फिर ऊँची आवाज में सड़क के पार खड़े लोगों को सुनाने के लिए बोला :
‘जिस तरह तुम अचानक से मुड़ गए थे टक्कनर तो होनी ही थी। शुक्र मनाओ कि मैंने गाड़ी रोक ली वरना तुम्हाुरी हड्डी-पसली नहीं बचती. अगर इसी तरह साइकिल चलाओगे, तो किसी-न-किसी दिन जान से हाथ धो बैठोगे....’
मेरी आवाज में समाजसेवा की गूँज आ गई थी और मुझे इस बात का यकीन होने लगा था कि मैंने सचमुच इस आदमी को बचाया है. इसे गिराया नहीं. उस आदमी ने सिर ऊपर उठाया. उसकी आँखों में अभी भी त्रास छाया था, लेकिन मुझे लगा जैसे उसकी आँखें दिमाग में छिपे मेरे इरादों को देख रही है. 
 ‘मेरी मानो, इसे अस्पताल पहुँचा दो.’ बुजुर्ग ने फिर कहा लेकिन मेरा कोई इरादा उसे अस्पताल पहुँचाने का नहीं था. मेरे भाई का हमजुल्फ़ यानि साढ़ू जगतराम है ही। बस उसे एक कॉल करने की देर है.
अधेड़ उम्र के उस घायल शख्स के बालों से खून रिसना बंद हो गया था. वो उम्र बड़ी खतरनाक होती है, बुरी तरह से घायल होने के लिए भी और दूसरों को परेशान करने के लिए भी.
मैंने फिर से हाथ जेब में डाला, जिसमें दो नोट रखे थे, एक पाँच रुपये का, दूसरा दस रुपये का. जैसे-जैसे मेरा डर कम होता जा रहा था। जेब में से पाँच रुपये का नोट निकालने से पहले मैंने मुड़कर देखा. सूट-बूटवाला बुजुर्ग जा चुका था. मुझे अकेला अपने हाल पर छोड़कर। मुझे धोखा दे गया था. मैं अकेला, दुश्मनों से घिरा महसूस करने लगा. क्योंकि दो छोटे-छोटे लड़के भी मेरी बगल में आकर खड़े हो गए थे, और उन्हों ने ज़मीन पर बैठे थुलथुल शख्स को पहचान लिया था.
‘ये तो .,.. गोपाल के बापू हैं. हैं ना!’ एक ने दूसरे से सहमी-सी आवाज में कहा. मगर ये दोनों दूर ही खड़े रहे, और थुलथुल को देखते रहे, कभी उसकी ओर देखते, कभी मेरी तरफ। मैं अभी पाँच का नोट अंगुलियों में मसल ही रहा था कि तभी... तभी पुलिस आ गई। कोई आदमी चिल्लाुया: ‘पुलिस. पुलिस आ गई है.’
अरे यार... मैंने सोचा... मैं चूक गया हूँ. उस वक्ती निकल जाता तो निकल जाता. अब तो यह आदमी भी तेज हो जाएगा. बवाल मचाएगा, पुलिस को अपने जख्म दिखाएगा. साइकिल का टेढ़ा पहिया दिखाएगा. भीड़ इकट्ठी कर लेगा. मुझे परेशान करेगा. पटरी पर वह औरत अभी भी खड़ी थी और उसकी बच्ची  रोए जा रही थी.
जगतराम सुपरिन्टेंटडेंट का नाम पुलिस के आते ही कह देना होगा. वरना उन्हों ने अगर चालान लिख दिया तो फिर उसे नहीं फाड़ेंगे – मैंने सोचा। 
लोग नजदीक आने लगे थे. घेरा-सा बनने लगा था. तभी मैं लपककर घायल शख्स के ऊपर झुक गया था और उसे सहारा देकर उठाने लगा। 
‘चलो भई, तुम्हें अस्पलताल पहुँचा आऊँ. अरे उठो, देर नहीं करो....’ मैंने इस तरह सहारा दिया कि आस-पास के लोग देख लें कि मुझे उस आदमी के साथ हमदर्दी है, पुलिसवाले भी देख लें कि मेरे मन में कोई बुरा ख्याल नहीं है.

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