कहानी | थोड़ी सी थ्रिलर कहानी | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

एक थ्रिलर नॉवेल लिखने वाला शख्स को अजनबी शहर में अचानक पता चलता है कि उसके कोई पुराने रिश्तेदार इसी शहर में रहते हैं। वो मिलना तो नहीं चाहता पर मां के बार-बार फोन आने पर उसे मिलने जाना पड़ता है। जब वो वहां पहुंचता है तो उसे एक 13-14 साल की बच्ची मिलती है जो उसे एक कमरे में बैठने के लिए कहती है। एक कमरा जिसका पीछे का दरवाज़ा जंगल की तरफ खुलता है। खूंटी पर लटकी एक पुरानी हैट और दीवार पर लगी एक बंदूक वाले उस डरावने कमरे में इंतज़ार करते वक्त उसके साथ क्या हुआ... जो वो ज़िंदगीभर नहीं भूल पाएगा।

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Thodi Si Thriller Kahani Thodi Si Thriller Kahani

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • नोएडा,
  • 30 जून 2024,
  • अपडेटेड 3:23 PM IST

कहानी - थोड़ी सी थ्रिलर कहानी
राइटर - जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

उस शाम घर से निकलते ही शुरुआत ख़राब हो गयी थी। मैं अभी कुछ कदम ही चला था कि एक पेड़ के नीचे से गुज़रते हुए मेरे कंधे पर किसी परिंदे ने बीट कर दी। मैं एक तड़प कर रह गया। एक तो नया शहर मैं, किसी को जानता नहीं था... और जिनके यहां जा रहा था वहां भी पहली बार.. क्या इंप्रैशन पड़ेगा... और मेरा महँगा सूट.. जिसे में इतने कायदे से फ्लाइट में हैंड लगेज में रखकर लाया था कि वो मु़ड़े ना... सब ऐसी तैसी में हो गया था। ख़ैर मेरी नज़र फूलों की एक दुकान पर पड़ी और मैंने उससे कुछ पानी मांगा... और कंधा एक तरफ झुका कर धोना शुरु कर दिया... कोट अच्छा खासा एक तरफ से भीग गया... दूसरी तरफ भी पानी के धब्बे आ गए। पर ख़ैर... मैंने सोचा कि चलो कुछ देर में सूख जाएगा। (आगे की कहानी पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें या इसी कहानी को जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से सुनने के लिए ठीक नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें) 

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जैसा कि मैंने बताया कि मैं उस शहर में किसी को नहीं जानता था... और न कोई मुझे... पर पिछले ढाई महीने से... यानि जब से मैं यहां था... मैं इस शहर को थोड़ा थोड़ा पहचान रहा था। मैं एक राइटर हूं... मैं थ्रिलर कहानियां लिखता हूं... ऐसी कहानियां जिनमें रहस्य होता है, थोड़ा डर, थोड़ी हैरानी, खतरे का एहसास, खून, चाकू, साज़िश और कत्ल.... मैं ऐसी ही कहानियां लिखता हूं, मेरे दो नॉवल बेस्ट सेलर थे, एक कहानी पर एक डॉयरेक्टर ने फिल्म बनाने के लिए एडवांस दे चुका था और एक नई कहानी मैं लिख रहा था। और इसीलिए इस अजनबी शहर में आ गया था। 

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उस शाम बादल घिरने लगे थे... अंधेरा छाने लगा था... मैं शहर की सड़क पर चला जा रहा था। - एक्सक्यूज़ मी.. ये विल्सन स्ट्रीट किधर पड़ेगी... उस तरफ.. अच्छा... मैंने रास्ते में मेरे सामने से आ रहे छतरी पकड़े एक शख्स से पूछा तो उसने इशारा करते हुए मुझे बताया। मैंने कहा, अच्छा ये पता देखिए... जानते हैं क्या आप... उस आदमी ने मेरे हाथ से पर्ची ली... और फिर अंग्रेज़ी में कहा... कि आप ऐसा कीजिए.. इधर से जाकर एक अंडर पास मिलेगा.. उसको क्रॉस करके सीधे जाइये... पहली रेड लाइट से दूसरा राइट टर्न लीजिएगा.. जहां जंगल हैं.. उसी जगह कम ही बिल्डिंग्स हैं... उसी में से एक है
मैं शुक्रिया करके चल दिया.. इतनी अच्छे तरीके से पता तो हिंदुस्तान में भी किसी ने मुझे नहीं बताया था। ख़ैर सवाल ये है कि मैं जा कहां रहा था। हुआ यूं कि जब मेरी मम्मी को पता चला कि मैं इस शहर में हूं... तो उनका फोन आया बोलीं.. बेटा, ऐसा करना कि तुम उस शहर में किसी से मिलते आओ... 
- किससे मम्मी? मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि उनके कॉलेज के वक्त की कोई सहेली... उसी शहर में रहती है। वो मम्मी की शादी में भी आई थी.. और एक बार बाद में भी जब मैं तीन साल का था। तब उन्होंने मुझे गोद में खिलाया था। पर उसके बाद उनकी और मम्मी की बात नहीं हुई। दोनों अपनी-अपनी दुनिया और ज़िम्मेदारियों में खो गयी थीं। बीस-पच्चीस साल पुरानी बात हो गयी। मम्मी को बस इतना पता था कि वो इसी शहर में रहती हैं और उनका पता फोन से मंगवा लिया था। बस मेरे पास फरमान आ गया कि जाओ बेटा, उनसे मिलते आना। मैंने भी सर पकड़ लिया कि मुझे भी पूरी दुनिया में यही शहर मिला था। पर क्या कह सकते थे। तो ख़ैर... एक दो दिन तो मैंने मम्मी को टाला ... पर आज निकला ही पड़ गया। हालांकि मैं दिन में जाना चाहता था... पर निकलते निकलते शाम हो गयी थी। देर के बाद मैं मेन रोड से दाईं तरफ उतर कर एक कच्चे रास्ते पर होता हुआ आगे बढ़ा और फिर पूछता-पाछता एक मकान के सामाने पहुंच गया। ये दो मंज़िला मकान था जिसके आसपास आबादी कम थी। घर के आगे की तरफ तो फिर भी कुछ मकान थे लेकिन पीछे के तरफ तो पूरा जंगल था। अंधेरा लगभग हो गया था। मैंने मकान को ग़ौर से देखा... उस पर दर्जनों खिड़कियां थी और वो पुराने ज़माने की बना हुआ लग रहा था। गुबंद और मेहराबें उन पर ढली हुई मूर्तियां.. जैसी ब्रटिशकाल की इमारतें होती थीं। ख़ैर, मैंने लकड़ी के बड़े और भारी से दरवाज़े पर लटकी कुंडी को खटखटाया .. कुछ देर में एक आहट हुई और फिर दरवाज़ा खुला। सामने एक छोटी बच्ची खड़ी थी। उम्र यही कोई 13-14 साल बालों में गुलाबी रिबन आंखे बड़ी-बड़ी उसने नीली लेस वाली एक सफेद फ्रॉक पहनी थी। मैंने ग़ौर से देखा तो उसके माथे पर एक पुराने कट का निशान था... पता नहीं ये कट उसे क्यों लगा होगा... वो कुछ नहीं बोली, बल्कि मेरे बोलने का इंतज़ार करती रही। मैंने कहा, हैलो.. तो उसने कहा, जी बताइये... 
इतने छोटे बच्चे में इतना कॉनफिडेंस देखकर मुझे थोड़ी हंसी आई - मैंने मुस्कुराकर कहा मैं... ... मैं... मैं अपना नाम बताया और कहा कि मुझे... ऱखशंदा आंटी से मिलना है... वो जानती हैं कि मैं आ रहा हूं। 
उसने मुझे एक नज़र ऊपर से नीचे देखा... फिर कहा, हम्म... आइये अंदर आइये... और ये कहते हुए वो दरवाज़ा खुला छोड़कर अंदर जाने लगी। मैं उसके पीछे-पीछे हो लिया। हम लोग एक गैलरी से होते हुए कमरे में पहुंचे... वो एक औसत दर्जे का ग्राउंड फ्लोर वाला मकान था। मैं कमरे में एक तरफ पड़े सोफे पर बैठ गया जहां हवा के झोंके आ रहे थे। क्योंकि कमरे में एक दरवाज़ा था जो घर के पीछे की तरफ खुलता था... वो दरवाज़ा पर्दे से ढका था। पर्दा लगातार हवा से उड़ रहा था। 

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लीजिए पानी पी लीजिए... उस छोटी लड़की की आवाज़ से मैं चौंक गया। 
शुक्रिया... कहते हुए मैंने पानी लिया। पानी का गिलास मेरी तरफ बढ़ाया और फिर बोली... आप बैठिये मैं नानी को बुलाती हूं...मैंने हां में सर हिलाया औऱ कहा, सुनो... मैंन थोड़ा जल्दी में हूं... तो.. 
उसने फिर से हां में सर हिलाया और चली गयी। उसके जाने के बाद पूरा कमरा खामोशी में डूब गया। कमरे की हल्की नीली दीवारें थी और उन पर लगी हुई घड़ी की टिक-टिक मुझे सुनाई दे रही थी। घर के पिछवाड़े में खुलने वाले दरवाज़े पर उड़ता हुआ पर्दा जब जब हवा से उठता तो मैं देखता कि पीछे का जंगल साफ दिखाई दे रहा है। वहां घने पेड़, ऊबड़़ खाबड़ जमीन और बीच बीच में कुछ दूर चीखते जंगली परिंदो की आवाज़ थी। थोड़ी घबराहट तो हो रही थी... ये कैसे लोग हैं... देर शाम, अंधेरे में, इस वक्त ये दरवाज़ा कौन खोलता है भाई... जहां मैं बैठा था मेरे सामने बड़ा सा आईना लगा था, मैंने उसमें खुद को देखा... मेरे कोट पर अब भी कंधे के पास गीला था... जो मैंने रास्ते में धोया था जब किसी चिड़िया ने पेड़ से बीट कर दी थी। मैं कोट के भीगे हिस्से को मैं रुमाल से पोछने लगा। 

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नानी आ रही हैं... थोड़ा टाइम लगेगा... उस लड़की की आवाज़ फिर से गूंजी... तो मैंने चौंक कर देखा... वो वापस आ गयी थी। वो ये कहते हुए मेरे सामने वाले सोफे पर बैठ गयी। मैंने कहा, देखो मुझे न थोड़ा जल्दी निकलना है... मुझे आने में देर हो गयी है... पता है देर क्यों हुई मुझे.. असल में एक इमेरजेंसी हो गयी थी। 
इमरेजेंसी? क्या हुआ... उसने हैरानी से पूछा तो मैंने
अपने गीले कोट की तरफ इशारा करते हुए कहा... ये देख रही हो... ये पता है कैसे हुआ.... 
कैसे हुआ... उसने पूछा.... 
मैंने फौरन कहानी बनाई... कहा...
शायद इस इलाके में पानी की दिक्कत है क्या... क्योंकि मैं जब आ रहा था तो मुझे बहुत सारे वॉटर टैंकर दिखाई दिए... आते वक्त एक टैंकर जो मेरे टैक्सी के आगे चल रहा था उसका पानी लीक हो रहा था... उसकी वजह से सड़क गीली हुई जा रही थी और गील सड़क पर एक छोटी बच्ची साइकल से जा रही थी... तुम्हारी ही उम्र की थी... बहुत प्यारी... उसकी साइकल के आगे लगी बास्केट में कुछ फूल लगे थे। वो जा ही रही थी कि सड़क पर पड़े पानी की वजह से उसकी साइकल स्लिप हो गयी। और वो गिर गयी। मेरे ड्राइवर ने ब्रेक मारा, मैं... जल्दी से कार से निकला और बच्ची को उठाकर उसे कंधे पर लादा... उसके माथे से खून आ रहा था और कपड़ों पर मिट्टी लग गयी थी। मैंने उसे कंधे पर उठाया और अस्पताल की तरफ भागा... क्योंकि कार से वापस जाने में यू टर्न लेना पड़ता और उसमें वक्त बर्बाद होता... मैं उसे कंधे पर लिये लिये पीछे वाले अस्पताल गया और वहां उसे एडमिट कराया...डॉक्टरों ने कहा कि वक्त पर न लाए होते तो मुश्किल हो जाती... पर खैर.. अब वो तो ठीक है... पर मेरे कपड़े खराब हो गए थे। तो आते वक्त मैंने उसे धोया और फिर यहां आया... इसी में बहुत देर हो गयी.. मैं जल्दी वापस जाना चाहता हूं... 
वो लड़की मेरी तरफ इज़्ज़त से देखने लगी। किस्से कह लेना का ये फन तो था मुझमें ... ऐसे ही थोड़ी स्टोरी राइटर कहलाता हूं। मैंने नोटिस किया कि वो बेचारी कुछ गिल्ट में भी आ गयी कि उसने मुझे उतनी अच्छी तरह वेलकम नहीं किया। बोली... ओह आई सी... 
मैं उन्हें जल्दी आने को कहती हूं... कहते हुए वो जाने लगी... तो मैंने कहा, सुनो ये दरवाज़ा... ये बंद कर सकते हैं क्या... हवा आ रही है और वैसे भी इट इज़ नॉट सेफ... उसने काफी रूडली कहा - नहीं, ये बंद नहीं हो सकता। मैं उसके लहजे से हैरान रह गया। मैंने क्या क्यों, क्या हुआ... 
वो बोली, ये दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता... रात को भी नहीं... 
- क्यों..
- है कुछ वजह... मैं उन्हें नानी से कहती हूं थोड़ा जल्दी आ जाएं... 
वो छोटी लड़की जिसका नाम मैंने अबतक नहीं पूछा था, वो फिर अंदर वाले कमरे में चली गयी। और मैं उस कमरे में फिर खाली हो गया। मेरी नज़र पीछे वाले दरवाज़े पर पड़ी जहां से अंधेरे में हवा से झूमती हिलती झाड़ियां दिख रही थीं... हवा की सांय-सांय अंदर गूंज रही थी... अंधेरे की खासियत ये है कि वो आप के तसव्वुर की ताकत को ... आपकी इमैजिनेशन को कई गुना बढ़ा देता है... इसलिए आपको अंधेरे में वो सब दिखता है.. जिसका डर आपको होता है... परिंदों की डरावनी आवाज़ तेज़ होने लगी थी... मैंने कमरे पर फिर एक नज़र डाली तो एक दीवार पर एक भालू की खाल में भूसा भरकर बनाया गयी एक सजावट दिखाई दी... जिसे इस तरह बनाया गया था कि दोनों तरफ होल्डर लगाकर तलवार खोंसी जा सके। पर इत्तिफाक से उसमें एक ही तलवार थी। दूसरी तलवार कहां होगी... शायद खो गयी। कमरे में सामने की तरफ एक दीवार पर खूंटी थी... जिस पर किसी की हैट टंगी थी। अचानक पीछे वाले कमरे में कुछ भारी चीज़ गिरने और किसी के चीखने की आवाज़ आई तो मैं कांप गया... ये...ये क्या था... मैं उठ खड़ा हुआ... लगता है कुछ गड़बड़ था वहां... 

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- आ.. हैलो... कोई है.. सुनिए.... मैंने आवाज़ लगाई। पर दूसरे कमरे में खामोशी हो गयी। मेरा दिल बैठने लगा था... यहां कुछ तो गड़बड़ थी। मैंने सोचा कि उस पीछे वाले कमरे में झांकने की कोशिश करता हूं। मैं गहरी सांस लेता हुआ उस कमरे की तरफ जाने लगा जहां से आवाज़ आई थी... जैसे ही मैं कमरे के पास पहुंचा... अचानक वो छोटी लड़की... दरवाज़े के एक तरफ से झांकते हुए सामने आ गयी... 
- कहां जा रहे थे...
मैं घबरा गया। मैंने देखा कि उसके माथे पर पसीना था। और उंगलियों पर कुछ खून जैसा लाल रंग था, मेरा हलक सूखने लगा... 
- ये... ये आवाज़ कैसी थी... कोई चीखा था... सब ठीक तो है?
- हां... सब ठीक है.. वो नानी थीं... वो थोड़ा प्रॉब्लम है उनके साथ... और फिर आज तो पूरे चांद की रात है इसलिए आज तो उन्हें संभालना थोड़ा मुश्किल होता है... 
- क्या मतलब
मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वो क्या कह रही है... क्या प्रॉब्लम है, पर ये पता था कि वहां कुछ खतरनाक हो रहा था। मैं दरवाज़े पर टिकी उसकी उंगलियां देख रहा था जिसपर कुछ लाल रंग लगा था। उसने मेरी नज़रे पढ़ी और फौरन अपनी उंगली मुंह में डालते हए कहा, सॉस है... डोंट वरी

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पर पता नहीं क्यों... मुझे लग रहा था कि वो ... वो सॉस नहीं था। क्योंकि जब वो दो मिनट में आई कह कर गयी तो बाथरूम में उसके कुल्ली करने की आवाज़ आ रही थी। मेरी हालत खराब हो गयी थी। दिल किया कि फौरन भाग लूं वहाँ से... पर जैसे ही मैं उठने लगा वो आ गयी... बैठिये....उसने कहा तो मैं बैठ गया
-
बस आ ही गयीं... नानी की तबियत कुछ ठीक नहीं है.. चलने में प्रॉब्लम है.. पर वो आपके बारे में जानकर बहुत खुश हैं... आ रही हैं...
मैंने कहा, बाई दा वे... एक बात बताओ... तुमने ये क्यों कहा था कि ये दरवाज़ा कभी नहीं बंद होता... क्यों... ये खुला क्यों रहता है... 
उसने मेरी तरफ देखा... और बोली, नानी की वजह से। नानी को लगता है कि नाना इसी दरवाज़े से एक दिन वापस आएंगे... 
- क्या... मतलब... मुझे घबराहट होने लगी थी... मैंने पूछा... वापस आएंगे.. कहां गए हैं वो?
- गए हैं नहीं... गए थे... छ साल पहले... ऐसी ही पूरे चांद की रात थी... नाना को शिकार करना पसंद था। उन्होंने कई जंगली भालुओं को मार गिराया था। 
मेरी नज़र दीवार पर लगी उस भालू की खाल पर गयी... जिस पर एक बंदूक लगी थी। दूसरी गायब थी। बोली... नाना और उनके छोटे भाई, जिन्हें मैं छोटे नाना कहती थी... इसी दरवाज़े से गए थे... हाथ में बंदूक लिए हुए... उनके साथ हमारा पालतू कुत्ता लूफ़ी भी था। उस दिन नाना अपनी शिकारी हैट ले जाना भूल गए थे। मैंने दीवार पर टंगी हैट को देखा... पर उस दिन वो लोग गए तो थे ये कहते हुए कि भालू का शिकार करके जल्दी आ जाएंगे.... लेकिन... लेकिन वो लोग नहीं लौटे... 
- नहीं लौटे मतलब? 
- हां, नहीं लौटे... पीछे वाले जंगल में आदिवासी मानते हैं कि ये जंगल हर साल पूरे चांद की रात में ज़िंदाहारी हो जाता है
- ज़िंदाहारी... ये क्या होता है?
- हां ज़िंदाहारी... यानि चांद की रौशनी जिस भी ज़िंदा शय पर पड़ती है... ये जंगल उसे निगल जाता है... इसीलिए सब लोग घर में ही रहते हैं... नाना, उनके छोटे भाई औऱ हमारा लूफ़ी... कहां गया... कोई नहीं जानता... उनकी बॉडी भी आजतक किसी को नहीं मिली... कोई कहता है कि ज़मीन फटी और वो अंदर चले गए... कोई कहता है कि वो लोग ऐसी ही पूरे चांद की किसी रात को लौट आएंगे.. ज़मीन से निकलकर... नानी भी यही मानती है... उनका दिमागी तवाज़ुन बिगड़ गया है... कहती हैं उनको मरे हुए लोग दिखते हैं और वो कहती हैं कि नाना और उनके छोटे भाई और लूफी एक दिन इसी दरवाज़े से आएंगे... इसीलिए ये दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है। एक बार मैंने बंद करने की कोशिश की तो नानी ने मेरे सर पर हथौड़े से वार कर दिया... उसने अपने माथे पर निशान दिखाते हुए कहा... 
मैं तो कांप ही गया। ये कहां आ गया मैं... अच्छा भला... अपना काम निपटा रहा था होटल में.. यहां फंस गया। मैंने फैसला किया कि अब मैं... चलना चाहिए... मैं जैसे ही उठा... कि तभी सामने एक बुज़ुर्ग औरत आंखे फैलाए हाथ में हथौड़ी लिए खड़ी थी...

अरे... बैठो... बैठो.. .कहां चल दिए... ऐसे थोड़ी जाने दूंगी.. बैठो... 
रखशंदा आंटी की बात सुनकर घिग्गी बंध गयी। मैं बैठ गया। उन्होंने हथोड़ी किनारे रखते हुए कहा... अरे कितने सालों बाद देख रही हूं तुम्हें... इतने से थे तुम.. जब मिले थे... 
-    जी... मैं.. वो बस... थोड़ा जल्दी में हूं तो... कहते हुए मैंने उस लड़की की तरफ देखा... 
-    हां, हां.. भई बिज़ी तो होगे.. सभी बिज़ी हैं। लेकिन इतने सालों बाद मिले हो... और आज की रात बहुत खास है... फिर मेरे करीब आकर बोलीं... मैं तो कहती हूं थोड़ी देर और रुक जाओ... इसके नाना, उनके भाई, और हमारा प्यारा लूफी... बस आते ही होंगे... आज आना है उन्हें... आएंगे न वो... उन्होंने लड़की की तरफ देखकर कहा... 
वो बोली... जी आएंगे... आज ही तो आना है उन्हें... 

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मेरी हालात खराब हो रही थी। किस घड़ी में यहां आकर फंस गया मैं... तो बेटा... अम्मी कैसी हैं तुम्हारी... 
- हां वो.. वो ठीक हैं... 
- तो यहां कहां रुके हो... तुम यही रह जाओ... यहां तुम्हें अच्छा लगेगा... 
- नहीं आंटी वो... वहीं ठीक है... वो मैं होटल में.... असल में ठीक रहता है क्योंकि अपना सोने-उठने का वक्त थोड़ा अलग है.. इसलिए आपको मैं परेशान नहीं.... कहते कहते मैंने देखा कि रखशंदा आंटी मेरी तरफ नहीं देख रही हैं... वो दरवाज़े की तरफ देख रही हैं... और धीरे धीरे उनके चेहरे पर मुस्कुराहाट आ रही है...वो बुदबुदाईं... वो आ रहे हैं... आ रहे हैं... 
मैंने आहिस्ता से पलट कर देखा... तो जो देखा ... वो देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए... मिट्टी में सने दो लोग... हाथ में बंदूक पकड़े... दरवाज़े की तरफ चले आ रहे थे... मेरे हाथ कांपने लगे... उनके पीछे उनका कुत्ता भी था 
वो लोग दरवाज़े के करीब आए और सीधे अंदर आ गए। मैं इकदम भाग खड़ा होने वाला था.. कि तभी उनमें से एक बोला... 
हैलो... यंग मैन
रखशंदा आंटी ने कहा, अरे ये मेरी सहेली का बेटा है... बताया था ना... 
हां हां, समझ गया... मिल कर खुशी हुई। आज मैं अपनी हैट भूल गया था... तो धूप काफी लगी... ये लो ये बंदूक उधर टांग दो... उन्होंने अपने छोटे भाई की तरफ बंदूक बढ़ाते हुए कहा... उसने बंदूक भालू की खाल के दूसरी तरफ बंदूक लटका दी। 
फिर वो मेरे करीब बैठे... माफ करना... कपड़ों पर मिट्टी है.. शिकार करने में ऐसा हो जाता है... तो यहां कहां रह रहे हो... 
मैं... आ.. .वो... मैं...
क्या हुआ... उन्होंने पूछा तो मैंने उस छोटी बच्ची की तरफ देखा... उसकी हंसी बता रही थी कि उसमें मुझे बेवकूफ बना दिया था। 
आपकी उंगली में क्या हुआ... अंदर से आप चीखी क्यों थीं... मैंने रखशंदा जी से कहा तो वो बोलीं... हां... वो किचन की रैक ठीक कर रही थी। हथोड़ी हाथ पर लग गयी थी। क्यों
आ... कुछ नहीं... वो... 
वो छोटी लड़की मुंह पर हाथ रखे हंसी रोक रही थी। मैं सारा खेल समझ गया था। मैंने कहा, आपकी बेटी बहुत शरारती है... 
हां, ये राइटर है... इसे कहानियां लिखने का शौक है... तुम क्या करते हो... उन्होंने पूछा... 
मैं कुछ जवाब देता.. उससे पहले ही वो बोल पड़ी... ये रास्ते में एक्सीडेंट में चोट खाने वाले बच्चों को अस्पताल पहुंचाते हैं... 
मैंने एक नज़र उसकी तरफ देखा... और फिर हम दोनों ज़ोर से हंसे.... 


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