राधा को फिर से लिखने की जरूरत क्यों पड़ी? लेखिका नीलिमा डालमिया ने बताई वजह

साहित्य आजतक 2024 के तीसरे और अंतिम दिन रविवार को भारत के अतीत और वर्तमान के बीच जो विरासत रूपी तार है. उनका हमारे आज पर क्या प्रभाव है. क्या वह सही रूप में आगे बढ़ रहा है? या फिर हमें कुछ और पहल करनी चाहिए. इन बिंदुओं पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया. इसमें देश की चोटी की लेखिकाओं ने अपने विचार और अनुभवों को रखा.

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विरासत और हमारा आज- साहित्य आजतक विरासत और हमारा आज- साहित्य आजतक

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 8:05 PM IST

Sahitya AajTak 2024: दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में चल रहे साहित्य आजतक 2024 के अंतिम दिन रविवार को कई सत्रों का आयोजन हुआ. इनमें कई विशेषज्ञों, साहित्य से जुड़े विद्वत जनों और अन्य जानी-मानी हस्तियों ने शिरकत की. इनमें से ही एक सत्र 'अतीत, विरासत और हमारा आज' पर भी इस विषय से जुड़ी प्रोमिनेंट लेखिकाओं नीलिमा डालमिया अदार, लक्ष्मी एम पुरी और अनामिका ने कुछ जरूरी बिंदुओं को उठाया और उसमें अपने रोचक अनुभवों और विचारों को जोड़ा.

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लेखिका नीलिमा डालमिया ने चर्चा की शुरुआत करते हुए बताया कि आज का जो टॉपिक है- 'अतीत, विरासत और हमारा आज' मैं अपने आप को इसका जीता-जागता प्रतीक मानती हूं. मेरे पिता जी पिछली सेंचुरी के सबसे बड़े उद्योगपति रहे. मैं अपने आप को पिछली शताब्दी से जोड़ती हूं. मुझे जो ऊर्जा मिली है वो उस वक्त से ही मुझमें आई है. विरासत में मुझे जो मिला, आज मैं जो कुछ भी हूं चाहे मेरा हाड़ मांस का शरीर हो, मेरा व्यक्तित्व हो, मेरी सोच और यहां तक की नाम तक सब मेरी विरासत का प्रतीक है.

उन्होंने कहा कि मेरा जो आज है वो आप सबके सामने है. इसलिए मैंने जो कुछ भी अपनी किताब में जोड़ा है, वो अतीत में शुरू हुई और मेरे आज में आई विरासत के रूप में. मैं पहले अपनी पृष्ठभूमि बता दूं. मैं अपने पिता की छठी पत्नी की चौथी संतान हूं और हमलोग 18 भाई बहन थे. आज के समय में 'अतीत, विरासत और हमारा आज' का इससे अच्छा उदाहरण और कुछ नहीं होगा. 

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राधा को फिर से लिखने की जरूरत क्यों पड़ गई?
नीलिमा डालमिया ने बताया कि राधा एक शख्सियत है. उन्हें हमनें खूब पढ़ा. मैं उससे हटकर अपने आप में उन्हें ढूंढ रही थी. मैं राधा के मानवीय शख्सियत को ढूंढ रही थी. जिसने तब शादी के नियमों का उल्लंघन करके एक नाजायज रिश्ता कायम किया. अपने ही पति के बहन के बेटे के साथ, जो उम्र में उनसे 13 साल छोटे थे. 

राधा मेरा एक सपना था. मैं एक ऐसा पात्र ढूंढ रही थी, जिसमें नारी भी है, सशक्तिकरण हो, आत्मनिर्भरता भी और उसमें वो हर बात हो जो आज की स्त्री में जो कुछ हट के होता है. ऐसी शख्सियत मुझे राधा में दिखाई दी. मैंने राधा को एक सपने में देखा और ऐसी ही राधा को महसूस किया.

क्या राधा नारी सशक्तिकरण का प्रतीक है? 
नीलिमा ने बताया कि राधा आखिर किस शक्ति के बलबूते पर उन्होंने इतना बड़ा नियम तोड़ा. उनके पति एक यादव ट्राइब के मुखिया थे. राधा शादी करना चाहती नहीं थी. इसलिए उनको धक्का लगा.  क्योंकि राधा को बचपन से ये आभास था कि उनका पति तो सांवले रंग का एक नटखट बालक जैसा होगा. तो आखिर वो क्या शक्ति थी, जिसने उन्हें शादी को तोड़ने को प्रेरित किया और फिर वह खुलेआम शादी तोड़कर अपने से 13 साल छोटे लड़के के प्रेम में पड़ गई. इसलिए पता नहीं मेरी किताब में राधा में ये शक्ति कहां से आई. मुझे लगता है कि मेरी किताब की राधा में जो शक्तियां दिखती है,  हो सकता है वो मुझसे ही आई हो. 

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'मेरी किताब एक समय यात्रा है'
लेखिका और डिप्लोमैट लक्ष्मी एम पुरी ने विरासत और आज के बारे में बात करते हुए कहा कि मेरे भी पिता अपने समय में भारत का संविधान बनाने में सहयोग किया था. मेरी मां भी महिला शिक्षा में अग्रदूत थी. मैंने अपने उपन्यास में अपने अतीत, विरासत और आज को इस तरह से जोड़ा है, जिस वजह से ये किताब एक समय यात्रा बन जाती है. 

लक्ष्मी पुरी ने बताया कि मेरी किताब में जिसकी पृष्ठभूमि सैकड़ों साल पुरानी है.  इसमें चार धाराएं मिलती है. एक स्वतंत्रता संग्राम की धारा, दूसरी हमारी भारतीय सभ्यता की महानता की धारा, उस समय एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा था, उसे भी जोड़ा है और चौथा समाज सुधार के जो काम हो रहा था, उसे भी जोड़ा है. 

'मेरी किताब के पात्रों से प्रेरणा ले सकते हैं आज के युवा'
लक्ष्मी पुरी ने बताया कि इस उपन्यास के माध्यम से मैंने ये दिखाने की कोशिश की है कि मेरी कहानी के पात्र इन्हीं धारों से उपजें हैं और सभी युवा हैं. इसमें ये दिखाने की कोशिश हुई है कि कैसे मेरे उपन्यास के पात्र इन सारी चीजों को समेटकर अपने व्यक्तित्व में ढलते हैं. मैंने दिखाया है कि इन सबका आज भी उसी तरह से प्रभाव है और मैं चाहती हूं कि आज के युवा इससे प्रेरणा लें. क्योंकि आज भी हम एक विकसित भारत की कल्पना कर रहे हैं. क्योंकि हमारा देश एक निश्चित गंतव्य की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा है.

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लक्ष्मी पुरी की किताब की नायिकाओं से आज की लड़कियां खुद को कैसे जोड़े?
उन्होंने कहा कि मेरे उपन्यास में जो महिला पात्र हैं, वे लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण की अग्रदूत हैं. उन्होंने सैकड़ों साल पहले क्या कर दिखाया, यही उदाहरण है इस किताब में. मेरी किताब में एक पात्र है, जो 13वीं सदी की संत थीं. वो अलौकिक कारनामें करती हैं. इसमें मैंने उनके साथ कई मेटाफर भी जोड़ा जैसे वो चींटी का सूर्य को निगल जाना.  इसमें दिखाया गया है कि कैसे वे पात्र महिलाओं को बाल विवाह से बचाने के लिए काम किया. इसमें एक ऐसी मानसिकता दर्शायी गई है कि आप यानी महिला कुछ भी कर सकती हैं. ये बात उपन्यास में सैकड़ों साल पहले के समय में दिखाया गया है.

'अतीत एक बैट्री की तरह है जो रोज विरासत के रूप में रीचार्ज होता है'
लेखिका  अनामिका ने अतीत को एक नई परिभाषा दी. उन्होंने इस बारे में उदाहरण देते हुए बताया कि हमारे यहां अतीत को एक ऐसी बैट्री की तरह देखा गया है, जिसे रोज रीचार्ज किया जाता है. हमारे यहां ऐसी परंपराएं हैं, जिससे हमारी विरासत नई रहती है. हम अपने घरों में देखते होंगे कि हमारी नानी-दादी के जो कपड़े या पुरानी साड़ियां अलमारियों में रखी है और तार-तार हो रही है. उसे घर की बच्चियां और महिलाएं नीचे स्तर लगाकर कैसे आज के समय में अलग रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश में जुटी हैं. 

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'धान के पौधे की तरह है विरासत' 
धान का पौधा कहीं और उगता है और उसे उखाड़कर कहीं और रोप दिया जाता है. यहीं हमारी विरासत के नवीकरण की प्रक्रिया है. इसी के तहत हमें परिवार को देखने का नजरिया दिया गया, कि परिवार सिर्फ रक्त संबंधों से नहीं बनता. परिवार आत्मा के संबंधों से बनता है.

परिवार की धारणा काफी विस्तृत होती है. क्योंकि हमारा पूरा समाज ही एक परिवार है. इनके अलग-अलग संवर्गों से अलग-अलग धारणाएं आई हैं. जैसे महाराष्ट्र की बात करें तो वहां के परिवार की बात करें तो एक तरफ अगर पंडिता रमा बाई थीं, तो दूसरी तरफ ढेला बाई थीं,  जो एक गणिका थीं. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने कोठे पर अखबार का दफ्तार चलाती थीं. तो ये दोनों एक ही परिवार का हिस्सा थे. क्योंकि परिवार को सीमित दायरे में नहीं देखना चाहिए.

आज परिवार की जो धारणा है बदल रही है. क्योंकि हमें जिस नजरिये से परिवार को देखने की विरासत मिली है वो संकुचित होता जा रहा है. हम जाति, धर्म, लिंग, वर्ण के आधार पर अपना परिवार देखते हैं और जो हमारे जैसा नहीं है उसे पराया समझने लगते हैं. ये हमारी विरासत नहीं है.

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