भारतीय मीडिया जगत में जब 'पुस्तक' चर्चाओं के लिए जगह छीजती जा रही थी, तब इंडिया टुडे समूह के साहित्य के प्रति समर्पित डिजिटल चैनल 'साहित्य तक' ने हर दिन किताबों के लिए देना शुरू किया. इसके लिए एक खास कार्यक्रम 'बुक कैफे' की शुरुआत की गई...इस कार्यक्रम में 'एक दिन एक किताब' के तहत हर दिन किसी पुस्तक की चर्चा होती है. पूरे साल इस कार्यक्रम में पढ़ी गई पुस्तकों में से 'बुक कैफे टॉप 10' की यह शृंखला वर्ष के अंत में होती है. इसी क्रम में आज साल 2022 के आखिरी दिन इस साल के श्रेष्ठ 'उपन्यास' के बारे में जानिए. पर उससे पहले...
साल 2021 की जनवरी में शुरू हुए 'बुक कैफे' को दर्शकों का भरपूर प्यार तो मिला ही, भारतीय साहित्य जगत ने भी उसे खूब सराहा. तब हमने कहा था- एक ही जगह बाजार में आई नई किताबों की जानकारी मिल जाए, तो किताबें पढ़ने के शौकीनों के लिए इससे लाजवाब बात क्या हो सकती है? अगर आपको भी है किताबें पढ़ने का शौक, और उनके बारे में है जानने की चाहत, तो आपके लिए सबसे अच्छी जगह है साहित्य तक का 'बुक कैफे'.
हमारा लक्ष्य इन शब्दों में साफ दिख रहा था- "आखर, जो छपकर हो जाते हैं अमर... जो पहुंचते हैं आपके पास किताबों की शक्ल में...जिन्हें पढ़ आप हमेशा कुछ न कुछ पाते हैं, गुजरते हैं नए भाव लोक, कथा लोक, चिंतन और विचारों के प्रवाह में. पढ़ते हैं, कविता, नज़्म, ग़ज़ल, निबंध, राजनीति, इतिहास, उपन्यास या फिर ज्ञान-विज्ञान... जिनसे पाते हैं जानकारी दुनिया-जहान की और करते हैं छपे आखरों के साथ ही एक यात्रा अपने अंदर की. साहित्य तक के द्वारा 'बुक कैफे' में हम आपकी इसी रुचि में सहायता करने की एक कोशिश कर रहे हैं."
हमें खुशी है कि हमारे इस अभियान में प्रकाशकों, लेखकों, पाठकों, पुस्तक प्रेमियों का बेपनाह प्यार मिला. इसी वजह से हमने शुरू में पुस्तक चर्चा के इस साप्ताहिक क्रम को 'एक दिन, एक किताब' के तहत दैनिक उत्सव में बदल दिया. साल 2021 में ही हमने 'साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10' की शृंखला भी शुरू की. उस साल हमने केवल अनुवाद, कथेतर, कहानी, उपन्यास, कविता श्रेणी में टॉप 10 पुस्तकें चुनी थीं.
साल 2022 में हमें लेखकों, प्रकाशकों और पुस्तक प्रेमियों से हज़ारों की संख्या में पुस्तकें प्राप्त हुईं. पुस्तक प्रेमियों का दबाव अधिक था और हमारे लिए सभी पुस्तकों पर चर्चा मुश्किल थी, इसलिए 2022 की मई में हम 'बुक कैफ़े' की इस कड़ी में 'किताबें मिली' नामक कार्यक्रम जोड़ने के लिए बाध्य हो गए. इस शृंखला में हम पाठकों को प्रकाशकों से प्राप्त पुस्तकों की सूचना देते हैं.
इनके अलावा आपके प्रिय लेखकों और प्रेरक शख्सियतों से उनके जीवन-कर्म पर आधारित संवाद कार्यक्रम 'बातें-मुलाकातें' और किसी चर्चित कृति पर उसके लेखक से चर्चा का कार्यक्रम 'शब्द-रथी' भी 'बुक कैफे' की पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने वाली कड़ी का ही एक हिस्सा है.
साल 2022 के कुछ ही दिन शेष बचे हैं, तब हम एक बार फिर 'साहित्य तक: बुक कैफे टॉप 10' की चर्चा के साथ उपस्थित हैं. इस साल कुल 17 श्रेणियों में टॉप 10 पुस्तकें चुनी गई हैं. साहित्य तक किसी भी रूप में इन्हें कोई रैंकिंग करार नहीं दे रहा. संभव है कुछ बेहतरीन पुस्तकें हम तक पहुंची ही न हों, या कुछ पुस्तकों की चर्चा रह गई हो. पर 'बुक कैफे' में शामिल अपनी विधा की चुनी हुई ये टॉप 10 पुस्तकें अवश्य हैं.
पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने की 'साहित्य तक' की कोशिशों के प्रति सहयोग देने के लिए आप सभी का आभार.
साहित्य तक 'बुक कैफे-टॉप 10' साल 2022 के श्रेष्ठ 'उपन्यास' हैं ये
* 'दाता पीर', हृषीकेश सुलभ: अनोखे प्रेम और मुस्लिम समाज की दास्तान. जो मुजाविरों और शहनाई बजाने वाले एक घराने की कथा के बहाने अपने आस-पड़ोस को समेटती हुई चलती है. इस उपन्यास में स्मृतियों की कई पेंचदार गलियां हैं जिनमें खानकाहों-दरगाहों-मज़ारों और पीर-फकीरों की कहानियां बिखरी पड़ी हैं तो मौसिकी के सदियों पुराने सिलसिले के सुर भी मिलते हैं. प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन
* 'ढलती सांझ का सूरज', मधु कांकरिया: यह उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति की कहानी कहता है, जो अपने जीवन में आर्थिक सफलता अर्जित करने के बाद अपने मानवीय धरातल में झांकता है और फिर तरक्की की सीमाओं को महसूस करता है. फिर वह तलाशता है, अपनी सार्थकता को, अपनी आत्मा और उसकी अर्थवत्ता को. कर्ज में डूबे किसान, उनकी पीड़ा, दर्द, अकेलेपन और उनकी आत्महत्याओं के बहाने विकास के थोथे मानकों पर प्रहार करती कृति. प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
* 'अल्फ़ा-बीटा-गामा', नासिरा शर्मा: सभ्य, महानगरीय समाज की निर्दयताओं और अक्षम्य अमानवीयताओं को उजागर करता उपन्यास, जो मनुष्य की आत्मग्रस्तता को कभी कुत्तों की आंखों से दिखाता है, कभी उन कुछ जनों की आंखों से जो अपने सीमित साधनों के साथ, अपने आस-पड़ोस का विरोध झेलकर उन असहाय जीवों के लिए कुछ करना चाहते हैं. प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन
* 'अमर देसवा', प्रवीण कुमार, यह कोविड काल में हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में की कलई उतारने वाला उपन्यास, जिसे पढ़ते हुए आप कई बार रोएंगे, तो बहुत बार आक्रोशित भी होंगे. मानवीय त्रासदी का अनूठा आख्यान, जो नागरिकता पर आए खतरे की चेतावनी के साथ मानवता के प्रति संगठित अपराध की बानगी देता है. इसमें राज्यतंत्र, भ्रष्ट शासन-प्रशासन, राजनीतिक निहितार्थों वाली क्रूर धार्मिकता और विकराल संकटों के बीच मनुष्यता के छीजने और कई स्तरों पर उसके घृणित स्तर तक संवेदनहीन हो जाने की दास्तान है. मौत के कारोबार में लाभ देखते बाजार-तंत्र और निरुपाय आम आदमी के बीच असली अपराधी की खोज आपको करुणा से भर देगी. प्रकाशकः राधाकृष्ण प्रकाशन
* 'नमस्ते समथर', मैत्रेयी पुष्पा: राजनीति की सबसे निकृष्ट चालों से लिथड़े साहित्य-संसार की गाथा पर आधारित उपन्यास, जिसकी नायिका साहित्य को समाज की मशाल बनाने का उद्यम करने की नीयत से एक साहित्यिक संस्था के ज़िम्मेदार पद को स्वीकार तो लेती है, लेकिन जल्दी ही उसे वह काली कारा नज़र आने लगता है. साहित्यिक समाज, राजनीतिक दिग्भ्रम और मर्दाना वर्चस्व से हर जगह लड़ती औरत की कहानी. प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
* 'नकटौरा', चित्रा मुद्गल: आत्मकथात्मक औपन्यासिक कृति, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता के घर और बाहर के अंतर्विरोध की पृष्ठभूमि पर रची गई है. कथाकार ने समानधर्मी बिरादरी, अड़ोस-पड़ोस, जीवन में आये स्थायी-अस्थायी पात्रों, निजी रिश्तों के बीच के उद्वेलन और अंतर्द्वंद्व को इस तर्ह खंगाला है कि लेखकीय समाज के बहुत सारे चरित्रों के चेहरे से नकाब उतर जाती है. शिल्प इतना कसा है कि आप अगर कभी मिले हैं तो इन पात्रों को जान-पहचान सकते हैं. जीवन संघर्ष के बीच सत्य की पक्षधरता का दामन थामे रखने वाली यह एक बेबाक कृति है. प्रकाशकः सामयिक प्रकाशन
* 'चन्ना तुम उगिहो', चन्द्रकला त्रिपाठी: स्त्री-विमर्श को नई दिशा देता उपन्यास, जिसकी स्त्री-पात्र अपने जीवन में प्रेम, साहस, त्याग की प्रतिमूर्ति बनकर भी अपने समय और समाज से टकराते हुए मानवी ही रहती हैं, दैवी नहीं बन जातीं. काशी की जीवंत परंपरा में हिंदू-मुस्लिम एकता और बंगाल की सांस्कृतिक मिठास से जीवंत उपन्यास. प्रकाशकः प्रलेक प्रकाशन
* 'शहर से दस किलोमीटर', नीलेश रघुवंशी: साइकिल के इश़्क में डूबे एक जोड़ी पैरों की परिक्रमा की वह गाथा है, जो बताती है कि शहर से कुछ ही दूरी पर वह दुनिया बसती है, जो न तो शहरों की कल्पना का हिस्सा है, न ही उनके सपनों में उसकी कोई जगह है. पर अपने दुखों, सुखों, हरियाली और सूखों के साथ वह अपने आप में भरा-पूरा है. प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
* 'चाँद गवाह', उर्मिला शिरीष: उपन्यास का सबसे शानदार केंद्र बिंदु है एक स्त्री. जो प्रश्न भी उठाती है और उसके उत्तर भी तलाशती है. स्त्री के दोनों पक्ष आपस में टकराते हैं. कौन गलत है- कौन सही जैसे सवालों से घिरी स्त्रियों में से एक स्त्री अपनी परिधि से बाहर निकल जाना चाहती है और दूसरी स्त्री परिधि में रहने का मानसिक दवाब बनाती है. मन से देह तक के सफ़र के बीच स्त्री प्रश्न उठाती है कि आत्मा के रिश्ते देह के सम्बन्धों से कैसे बड़े होते हैं. प्रकाशकः सामयिक प्रकाशन
* 'अम्बपाली: एक उत्तरगाथा', गीताश्री: लिच्छवी गणतंत्र के राजनर्तकी की गाथा, जो अपने अधिकारों और अस्मिता के लिए जूझने वाली सम्भवतः विश्व की पहली स्त्रीवादी नागरिक थी. यह उपन्यास इतिहास के निर्माण में मिथकों की अनिवार्यतः प्रमुख भूमिका को उजागर करता है. एक राजनर्तकी, जिसे अपने राज्य में मंत्री पद का दर्जा मिला था, पर इससे भी उसका जीवन सहज नहीं हुआ और अपने रूप सौंदर्य की बड़ी कीमत चुकाई. प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
सभी लेखकों, प्रकाशकों, अनुवादकों को बधाई!
जय प्रकाश पाण्डेय