संजय कुंदन जन सरोकारों के लेखक हैं. जीविका के लिए पत्रकारिता करते हैं, पर उनका मन जनवाद, जंगल व लेखन में ही रमता है. 7 दिसंबर, 1969 को पटना में पैदा हुए. उपन्यास व कहानी भी लिखते हैं, पर मूलतः कवि हैं. उनकी मुख्य कृतियां हैं- कविता संग्रह: कागज के प्रदेश में, चुप्पी का शोर; कहानी संग्रह: बॉस की पार्टी; उपन्यास: टूटने के बाद. सम्मानः भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, हेमंत स्मृति कविता सम्मान, विद्यापति पुरस्कार.
भारत- पाकिस्तान से तनाव के दौर में 'साहित्य आजतक' के लिए देश के आज के हालात के मद्देनज़र उनकी एक कविता-
युद्ध की तैयारी
जब युद्ध की तैयारी होती है
अपने ही बीच का वह आदमी
सबसे बड़ा दुश्मन नजर आता है
जो एक खुशनुमा मौसम की बात करता है
और इंसानियत का राग छेड़ देता है
उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता है
जो एक अजनबी को पानी पिला देता है
बिना उसका मजहब पूछे ही
जब युद्ध की तैयारी होती है
लोग घर के कोने-अंतरे, अलमारियों-दराजों
में बंकर की तलाश करने लगते हैं
एक हत्यारा
रक्षक की मुद्रा में सीना तानकर
चौराहे पर खड़ा हो जाता है
उसकी शौर्यगाथाएं
तेजी से फैलती हैं अफवाहों के साथ
उस नौजवान को धमकी दी जाती है
जो कहता है-बंदूक नहीं रोजगार चाहिए
उसे दिया जाता है पागल करार
जो कहता है-
हमारा असली दुश्मन है भ्रष्टाचार.
- संजय कुंदन
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