सचिन और सारा दोनों ही मजबूत राजनीतिक परिवार से आते हैं लेकिन दोनों ने अपनी प्रेम कहानी का दम राजनीतिक परिवारों की मजबूरियों में घुटने नहीं दिया
सारा 1990 तक कश्मीर में अपने परिवार के साथ रहीं. उसके बाद फारुक अब्दुल्ला ने घाटी में चल रहे तनाव की वजह से सारा को मां के साथ लंदन भेज दिया.
जब सचिन एमबीए कर रहे थे, उसी दौरान सारा और सचिन दोस्त बन गए. समय के साथ उनकी दोस्ती गहरी होती चली गई और फिर प्यार में बदल गई.
सारा ने सचिन को अपनी मां से मिलवाया. सारा के पैरेंट्स को सचिन हमेशा से पसंद थे. सचिन का व्यक्तित्व और उनकी मुस्कान उनका दिल जीतने के लिए काफी थी. उन्हें सारा और सचिन की दोस्ती से कई ऐतराज नहीं था.
लेकिन दोनों को एक-दूसरे के साथ ज्यादा वक्त बिताने का मौका नहीं मिला. कुछ महीनों के अंदर ही सचिन ने अपना कोर्स खत्म किया और भारत लौट आए जबकि सारा इंग्लैंड में ही रहीं.
जब दोनों एक-दूसरे से दूर हुए तो उन्हें अपने प्यार का और भी ज्यादा एहसास हुआ. दूरियां प्यार को और गहरा बना देती है और सचिन-सारा के मामले में भी यही हुआ.
दोनों एक-दूसरे से ईमेल्स और फोन कॉल्स के जरिए बात करते थे. दोनों को अलग हुए तीन साल बीत चुके थे. वक्त के साथ-साथ उनका प्यार गहराता चला गया और अब दोनों का इरादा जीवन भर साथ निभाने का था.
सचिन राजस्थान के गुज्जर परिवार से आते हैं जबकि सारा एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार से थीं. दोनों को पता था कि शादी के लिए परिवारों की रजामंदी आसानी से नहीं मिलेगी.
सचिन ने आखिरकार अपनी मां को सारा के बारे में बता दिया. उम्मीद के मुताबिक, सचिन की मां ने इस रिश्ते के लिए ना कर दी. सचिन का पूरा परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था. हालांकि, सचिन ने किसी तरह अपने परिवार वालों को मना लिया.
लेकिन चुनौतियां सारा के लिए ज्यादा थीं. सारा के पिता ने इस रिश्ते को कुबूल करने से इनकार कर दिया. उन्होंने सारा को इस बारे में बात करने से भी मना कर दिया.
लेकिन सारा को उम्मीद थी कि एक ना एक दिन उनके पिता इस शादी के लिए मान जाएंगे. सारा अपने पिता के बहुत करीब थीं.
सारा ने कई दिनों तक अपने पिता को मनाने की कोशिश की. रिपोर्ट्स के
मुताबिक, कई दिनों तक वह रोती रहीं लेकिन उनके पिता फारुक पर कोई असर नहीं
पड़ा. वह अपने फैसले पर अडिग रहे.
फारुक सचिन को पसंद करते थे और
सारा के लिए शायद उन्हें इससे बेहतर रिश्ता नहीं मिलता लेकिन सामाजिक और
राजनीतिक दबाव के आगे वह मजबूर थे.
जब सचिन और सारा का रिश्ता सार्वजिनक हुआ तो अब्दुल्ला के खिलाफ घाटी में कैंपेन चलने लगे. यहां तक कि उनकी पार्टी के ही विधायक इस रिश्ते के खिलाफ हो गए. विरोधी कहने लगे कि एक मुस्लिम पुरुष अपने धर्म से बाहर शादी कर भी सकता है लेकिन इस्लाम एक मुस्लिम महिला को एक गैर मुस्लिम से शादी करने की इजाजत बिल्कुल नहीं देता है.
सचिन और सारा ने कुछ महीनों तक सब कुछ शांत होने का इंतजार किया लेकिन जल्द
ही उन्हें एहसास हो गया कि महीनों-सालों बाद भी हालात नहीं बदलेंगे.
विरोध-प्रदर्शन अब भी जारी थे.
फारुक अब्दुल्ला के पास भी अपने पार्टी विधायकों की जिद के सामने आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था.
सचिन और सारा को फैसला लेना ही था. उनके पास दो ही विकल्प थे- एक या तो वे अपने परिवार वालों की मर्जी के आगे झुक जाते और खुद की जिंदगी किस्मत के हवाले कर देते. दूसरा अपने दिल की बात सुनते हुए शादी के बंधन में बंध जाते.
सारा और सचिन ने दूसरा विकल्प ही चुना. जनवरी 2004 में दोनों ने एक साधारण से समारोह में शादी कर ली. इस शादी में बहुत कम लोगों को आमंत्रित किया गया था. अब्दुल्ला परिवार ने इस शादी का बहिष्कार किया. सारा को अंतिम पलों तक उम्मीद थी कि उनका परिवार मान जाएगा और सब कुछ ठीक हो जाएगा.
सारा के लिए यह समय
बहुत ही मुश्किल भरा था. शादी के सबसे खास दिन पर भी उन्हें अपने घर के
किसी सदस्य का साथ नहीं मिला. सारा के अकेलेपन को दूर करने के लिए सचिन के परिवार ने पूरी कोशिश की. सचिन ने भी सारा का हर मौके पर साथ दिया.
सारा अब्दुल्ला सारा पायलट बन गईं और दोनों जिंदगी के एक नए पड़ाव में पहुंच गए.
वक्त गुजरने के साथ अब्दुल्ला की नाराजगी भी दूर हो गई और बाप-बेटी अतीत की कड़वी यादें भुलाते हुए फिर से एक साथ आ गए.