डायबिटीज कंट्रोल करने वाली ये दवा ही धीरे-धीरे और बढ़ा रही मर्ज? नई स्टडी में दी गई चेतावनी

स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना की रिसर्च में खुलासा हुआ है कि टाइप 2 डायबिटीज़ में इस्तेमाल की जाने वाली सल्फोनिल्यूरिया दवाएं लंबे समय में उल्टा असर डाल सकती हैं.

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सल्फोनिल्यूरिया डायबिटीज में इस्तेमाल होती है. (Photo: Pixabay) सल्फोनिल्यूरिया डायबिटीज में इस्तेमाल होती है. (Photo: Pixabay)

आजतक लाइफस्टाइल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 06 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:00 AM IST

डायबिटीज को शुगर की बीमारी कहा जाता है. इसमें शरीर में शुगर यानी ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है. यह दुनिया के साथ-साथ भारत में भी सबसे तेजी से बढ़ती बीमारियों में से एक है. टाइप 2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर बढ़ जाती है. इंसुलिन अग्न्याशय की बीटा कोशिकाएं बनाती हैं जो ब्लड शुगर कंट्रोल करती हैं. लेकिन हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना की रिसर्च में सामने आया है कि टाइप 2 डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए आमतौर पर जो दवा दी जाती है, वही दवा लंबे समय में टाइप 2 डायबिटीज को और भी बदतर कर सकती है.

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क्या कहती हैं रिसर्च?

Diabetes, Obesity and Metabolism में पब्लिश हुई रिसर्च के मुताबिक, टाइप 2 डायबिटीज के इलाज में सल्फोनिल्यूरिया कैटेगरी की दवाएं जैसे ग्लिबेनक्लामाइड सालों से उपयोग की जा रही हैं. स्टडी के लीड प्रोफेसर एडुआर्ड मोंटान्या ने समझाया, 'टाइप 2 डायबिटीज में सालों से सल्फोनिल्यूरिया दवाएं दी जाती रही हैं जो बीटा कोशिकाओं को अधिक इंसुलिन रिलीज के लिए स्टिम्युलेट करती हैं.'

'ग्लिबेनक्लामाइड इन्हीं में से एक कॉमन दवा है जो कई देशों में जेनरिक फॉर्म में उपलब्ध है. लेकिन हमारी रिसर्च बताती है कि जब बीटा कोशिकाएं लंबे समय तक ऐसी दवा के संपर्क में रहती हैं तो उनकी सेहत और पहचान दोनों पर नेगेटिव असर पड़ सकता है.'

बीटा सेल्स खो रहे हैं अपनी पहचान

प्रोफेसर मोंटाण्या के अनुसार, बीटा कोशिकाएं दवाओं के कारण मरती नहीं हैं बल्कि वे अपनी पहचान खो देती हैं. टेस्टिंग में पाया गया है कि ग्लिबेनक्लामाइड के लंबे समय तक प्रयोग से उनकी जीन एक्टिविटी कम हो जाती है जो इंसुलिन प्रोडक्शन के लिए जरूरी होते हैं.'

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'रिसर्च में पाया गया कि यह दवाएं कोशिकाओं के भीतर 'एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम' में तनाव पैदा करती है, जिससे उनकी पहचान खत्म होने लगती है.'

दवा का असर कम होने की मिली वजह!

प्रोफेसर मोंटाण्या ने कहा, 'अक्सर देखा जाता है कि शुरुआत में बेहतर असर दिखाने वाली दवाएं बाद में बेअसर हो जाती हैं और मरीजों को उसके बाद हैवी खुराक या नई दवाएं देनी पड़ती हैं.'

'दरअसल, कोशिकाओं की पहचान खोने से धीरे-धीरे ब्लड शुगर पर कंट्रोल कम होने लगता है जिससे शुगर और बढ़ने लगती है. सेल्स आइडेंटिटी लॉस, सेल डेथ की तरह स्थायी नहीं होती यानी सही ट्रीटमेंट से बीटा कोशिकाओं की पहचान और इंसुलिन बनाने की क्षमता दोबारा लौटाई जा सकती है.

दवा की डोज बढा़ने का कारण आया सामने

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि मरीज बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेना बंद न करें लेकिन यह रिसर्च बताती है कि लंबे समय तक सल्फोनिल्यूरिया इस्तेमाल करने से ब्लड शुगर कंट्रोल धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है. यही वजह है कि कई मरीजों को समय के साथ दवा की खुराक बढ़ानी या दूसरी दवा जोड़नी पड़ती है.

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