5 महिलाओं-2 बच्चों के मर्डर का वो केस जिसमें 28 साल बाद आरोपी घोषित हो गया जुवेनाइल

महाराष्ट्र के पुणे में पांच महिलाओं और दो बच्चों की हत्या के मामले में मौत की सजा पाए सजायाफ्ता कैदी जुवेनाइल घोषित हो गया है. 28 साल से जेल में बंद दोषी को सुप्रीम कोर्ट ने जुवेनाइल मानते हुए रिहा करने का आदेश दिया है और कहा है कि कानून के मुताबिक उसे मौत की सजा नहीं दी जा सकती.

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 28 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 7:46 PM IST

महाराष्ट्र के पुणे में पांच महिलाओं और दो बच्चों की हत्या के मामले में दोषी पाए गए एक आरोपी को मौत की सजा सुनाई गई थी. साल 1994 के इस हत्याकांड में मौत की सजा पाए सजायाफ्ता कैदी को सुप्रीम कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ये साबित करने में सफल रहा कि जब वारदात हुई थी, तब सजायाफ्ता कैदी किशोर था.

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केएम जोसेफ, अनिरुद्ध बोस और ऋषिकेश रॉय की पीठ ने सजायाफ्ता नारायण चेतनराम चौधरी के किशोर होने के दावे की जांच करने वाले जजकी रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक इस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि बीकानेर जिले के राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय की ओर से 30 जनवरी 2019 को जारी सर्टिफिकेट में उसकी उम्र 12 बताई गई है जिसे उस अपराध के घटित होने के समय उसकी उम्र निर्धारित करने के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए जिस मामले में उसे दोषी ठहराया गया है.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि उस सर्टिफिकेट के मुताबिक अपराध के समय उसकी उम्र 12 साल और 6 महीने थी. इस तरह उसे जिस अपराध में दोषी ठहराया गया है, उसके घटित होने के समय 2015 के एक्ट (जुवेनाइल जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) के प्रावधानों के मुताबिक किशोर था. कोर्ट ने ये भी कहा कि इसे निरानरम की असली उम्र माना जाना चाहिए जिसे नारायण के रूप में ट्रायल के बाद दोषी ठहराया गया.

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अमान्य हो गई मौत की सजा

ये भी कहा गया कि वह पहले ही इस मामले में तीन साल से अधिक समय तक जेल में रह चुका है और कानून के तहत अपराध के समय नाबालिग होने की वजह से उसे मौत की सजा नहीं दी जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि इस फाइंडिंग के बाद पुणे के एडिशनल सेशन जज की ओर से सुनाई गई मौत की सजा, हाईकोर्ट और इस कोर्ट की ओर से की गई सजा की पुष्टि ऑपरेशन ऑफ लॉ के जरिए अमान्य हो जाएगी. 2015 के एक्ट की धारा 18 के प्रावधानों के मुताबिक उसे तुरंत रिहा कर दिया जाएगा जहां वह 28 साल से अधिक समय कैद था.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि कोर्ट अपनी उन टिप्पणियों को लेकर सहमत है जिनमें अभियुक्त या दोषी की किशोर होने संबंधी याचिका पर उम्र निर्धारित करने में लापरवाह या अड़ियल रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए. बेंच ने ये भी कहा कि किसी अपराध की डिग्री या डायमेंशन से आरोपी (इस मामले में दोषी) के किशोर होने की जांच को लेकर कोर्ट का रुख निर्देशित नहीं होना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि जब दोषी ने किशोर होने के अपने दावे के समर्थन में स्कूल से जन्म प्रमाण पत्र लाकर प्रस्तुत कर दिया है तो राज्य को किसी सबूत के साथ ये सिद्ध करना होगा कि उसकी जन्मतिथि का रिकॉर्ड प्रवेश रजिस्टर में फर्जी था.

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ओसिफिकेश टेस्ट की रिपोर्ट का भी हुआ जिक्र

बेंच ने ये भी कहा कि कोर्ट स्कूल रजिस्टर की प्रविष्टि पर संदेह के लिए किसी तरह के अनुमान में शामिल नहीं हो सकता और इसका खंडन करने के लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है. कानून में उम्र के साक्ष्य के रूप में जन्मतिथि प्रमाण पत्र बताया गया और हम उसी के अनुसार चलेंगे. कोर्ट में साल 2005 में कराए गए दोषी के ओसिफिकेशन टेस्ट का भी जिक्र हुआ. तब उसकी उम्र 22 साल से 40 साल के बीच बताई गई थी. कोर्ट ने कहा कि 2005 में हम अगर दोषी की उम्र 22 साल लें तो जन्मतिथि 1983 की आती है जो स्कूल रजिस्टर में दर्ज उसकी जन्मतिथि के अनुरूप ही है.

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी की ओर से घटना के समय किशोर होने के दावे पर फैसला लेने के लिए इसे 29 जनवरी 2019 को पुणे के मुख्य जिला और सत्र न्यायाधीश की अदालत में भेज दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने पुणे के जज से छह सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा था. करीब 28 साल पुराने इस मामले को साल 2014 में संविधान पीठ के आदेश के बाद फिर से खोला गया था जिसमें ये कहा गया था कि मौत की सजा वाले मामलों की कम से कम तीन न्यायाधीशों की खुली अदालत में समीक्षा की जाए.

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क्या है पूरा मामला

महाराष्ट्र के पुणे के कोथरुड स्थित एक फ्लैट में 24 अगस्त 1994 को एक गर्भवती महिला सहित पांच महिलाओं और तीन साल से कम उम्र के दो बच्चों की हत्या कर दी गई थी. इस जघन्य मामले में 5 सितंबर 1994 को तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था. इनमें से एक बाद में गवाह बन गया था और उसकी गवाही के आधार पर पुणे की कोर्ट ने दो आरोपियों को दोषी ठहराया था.

पुणे की कोर्ट ने 19 फरवरी 1998 को दोनों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी. बॉम्बे हाईकोर्ट ने 22 जुलाई 1999 को ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखते हुए मौत की सजा की पुष्टि कर दी थी. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने भी दोषियों की अपील खारिज कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर 2000 को अपना फैसला सुनाया था जिसमें मौत की सजा बरकरार रखी गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने 24 नवंबर 2000 को रिव्यू पिटीशन भी खारिज कर दी थी. साल 2015 के अगस्त महीने में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने चौधरी समेत दोनों दोषियों की दया याचिका भी ठुकरा दी थी. इसके बाद चौधवरी ने साल 2016 में फिर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और अपने रिव्यू पिटीशन पर फिर से सुनवाई करने की अपील की. साल 2018 में चौधरी ने एक आवेदन देकर ये दावा किया कि उस वारदात के समय उसकी उम्र 12 साल थी जिसमें उसे मौत की सजा सुनाई गई है.

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