घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) को लागू हुए लगभग 20 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसकी ज़मीन पर प्रभावी क्रियान्वयन अब भी सवालों के घेरे में है. इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा आदेश देते हुए देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छह हफ्तों के भीतर "संरक्षण अधिकारी (Protection Officer)" नियुक्त करने का निर्देश दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आईसीडीएस (ICDS) या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जो बाल विकास योजनाओं के तहत कार्यरत हैं, घरेलू हिंसा कानून के तहत नियुक्त संरक्षण अधिकारी नहीं हो सकते. कोर्ट ने कहा कि इन अधिकारियों पर पहले से ही बाल कल्याण, पोषण, निगरानी और अन्य योजनाओं की भारी जिम्मेदारी है, और घरेलू हिंसा के मामलों को प्रभावी ढंग से संभालने के लिए अलग से समर्पित अधिकारी नियुक्त करना अनिवार्य है.
हर जिले और तालुका स्तर पर नियुक्त हों अधिकारी
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने निर्देश दिया कि महिला एवं बाल विकास विभाग या सामाजिक कल्याण विभाग के एक अधिकारी को प्रत्येक ज़िला और तालुका स्तर पर संरक्षण अधिकारी के रूप में नामित किया जाए.
DV Act के अंतर्गत संरक्षण अधिकारी वह पहला संपर्क बिंदु होता है जो घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई करता है, कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत कराता है और उनकी सुरक्षा व मामले की प्रगति की निगरानी करता है.
वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता, जो NGO "We the Women" की ओर से पेश हुईं, उन्होंने अदालत को बताया कि बाल कल्याण योजनाओं के साथ-साथ DV Act की जिम्मेदारी सौंपे जाने से अधिकारी अति-व्यस्त हो जाते हैं और महिलाओं को समुचित सहायता नहीं मिल पाती. उन्होंने कहा, "ICDS या आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को संरक्षण अधिकारी बनाना पर्याप्त नहीं होगा."
कुछ राज्यों ने अदालत को बताया कि मिशन शक्ति योजना या DV Act के तहत समर्पित अधिकारियों की नियुक्ति और प्रशिक्षण में समय और धन की आवश्यकता होगी. हालांकि अदालत ने कहा कि, "यह दीर्घकालिक आदर्श हो सकता है कि अलग संवर्ग (Cadre) बनाया जाए, लेकिन तब तक कोई और भी सहायता कर सकता है."
केंद्र और NALSA को भी निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) को भी निर्देश दिए हैं कि वे घरेलू हिंसा अधिनियम और उससे जुड़ी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करें. कोर्ट ने कहा, "NALSA के सदस्य सचिव सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधिक सेवा प्राधिकरणों से समन्वय करें ताकि ज़िला और तालुका स्तर पर महिलाओं के लिए उपलब्ध नि:शुल्क कानूनी सहायता और परामर्श की जानकारी व्यापक स्तर पर प्रचारित की जा सके."
अनीषा माथुर