भीमा कोरेगांव केस में आरोपी सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुधा भारद्वाज ने जमानत के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का रूख किया है. उन्होंने कहा है कि इस मामले में 90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल हो जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, इसलिए उन्हें जमानत दी जाए. इस तरह की जमानत को डिफॉल्ट बेल कहा जाता है. इससे पहले इस मामले के एक और आरोपी गौतम नवलेखा ने भी इस आधार पर जमानत की मांग की थी, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था.
महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में जनवरी 2018 में हिंसा हुई थी. इस मामले में सुधा भारद्वाज को अगस्त 2018 को गिरफ्तार किया गया था. सुधा भारद्वाज पर प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) का सदस्य होने का आरोप है.
बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल जमानत याचिका में सुधा भारद्वाज ने दलील दी है कि सीआरपीसी की धारा-167(2) के तहत जांच एजेंसी को 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है. इसलिए इस आधार पर उन्हें जमानत दी जाए.
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शुरुआत में भीमा कोरेगांव केस की जांच पुणे पुलिस कर रही थी. उसने सुधा भारद्वाज के खिलाफ चार्जशीट दाखिल भी की थी, लेकिन बाद में ये जांच एनआईए को सौंप दी गई. तीन साल बीत जाने के बाद भी इस मामले की सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है.
अपनी याचिका में सुधा भारद्वाज ने दावा किया है कि पुणे पुलिस ने 90 दिन बाद चार्जशीट दाखिल की थी, इसलिए वो डिफॉल्ट बेल की हकदार हैं. बॉम्बे हाईकोर्ट में सिंगल जज की बेंच इस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, लेकिन भारद्वाज की ओर से पेश वकील युग चौधरी ने कहा कि क्योंकि अब इस केस की जांच एनआईए कर रही है, इसलिए एनआईए एक्ट के तहत याचिका की सुनवाई दो जजों की बेंच में की जानी चाहिए. हाईकोर्ट के जज जस्टिस सारंग वी कोतवाल उनकी इस दलील से सहमत हुए और रजिस्ट्रार को आदेश दिया कि इस याचिका को दो जजों की बेंच के सामने रखा जाए.
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