भारत के संविधान के अनुसार देश की सत्ता किसके हाथों में होगी इसके लिए अपना मत देने का अधिकार 18 वर्ष में प्रवेश करने पर सभी नागरिकों को मिल जाता है. लेकिन, यहां पर बात आम नागरिक की नहीं बल्कि सन 2000 में 27वें राज्य के तौर पर जन्म लेने वाले उत्तराखंड राज्य की है. जो अब कुछ ही घंटों के बाद 18वें वर्ष में प्रवेश कर जाएगा और 'बालिग' भी हो जाएगा.
जन्म से 17 वर्ष तक के सफर में क्या खोया और क्या पाया बस इसी उधेड़ बुन में लगा है हर वो नागरिक जिसने इस राज्य के 'जन्म' का सपना देखा था...
पहाड़ी राज्य उत्तराखंड ने अपने शुरुआती दौर या यूं कहें कि बाल्यावस्था में ही काफी पीड़ा सही और देखी है. फिर चाहे वो राज्य निर्माण के लिए संघर्ष हो या राज्य गठन के बाद राजनीतिक उठापटक, बदलाव हो या पहाड़ों की आपदा हो लेकिन आज भी यहां के वाशिंदों के जहन में एक ही सवाल उभरता है कि इन 17 वर्षों में पहाड़ की तकदीर और तस्वीर कितनी बदली है?
यूं तो उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए आंदोलन काफी संघर्षपूर्ण रहा है. बहुत से आंदोलनकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर राज्य निर्माण की नींव रखी थी. पर्वतीय राज्य की मांग से शुरू हुआ ये संघर्ष आंदोलनकारियों के बुलंद हौसलों और बलिदानों से सफल हुआ लेकिन आज 18वें वर्ष में कदम रखते-रखते ना जाने कितने गांव खाली हो गए, ना जाने कितने लोग अपनी जमीन छोड़कर पलायन कर गए और तमाम राजनीतिक दल बस देहरादून से बैठकर ही सत्तासुख में मशगूल रहे.
सबसे बड़ी विडंबना ये कि जो राज्य निर्माण के नायक रहे वो किस हाल में हैं इसकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है. राज्य आंदोलन में रहे प्रदीप कुकरेती से बात करने पर सही हाल जाना कि आखिर किस हाल में हैं ये नायक जिन्होंने आंदोलन की नींव रखी थी.
उनकी मानें तो कुछ लोगों को तो जरूर सरकार ने आंदोलनकारी की पहचान दी मगर अधिकतर लोग राजनीति की चक्की में पिसकर ऐसे चकनाचूर हुए की ना पहचान मिली और ना वो सम्मान जिसके वो असल हकदार हैं.
पलायन बना समस्या, बंद कमरों में हुआ चिंतन
18 वर्ष के दौरान अगर सबसे गंभीर समस्या जिससे वाकई उत्तराखंड सबसे ज्यादा प्रभावित है वो है पलायन... पर 17 वर्ष बीतते-बीतते पलायन की चिंता किन फाइलों में गुम हो गई पता ही नहीं चला. बंद कमरों में चिंतन और मनन जारी है. फिर चाहे वो कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर बीजेपी की.
अभी हाल ही में देहरादून में प्रदेश के मुख्यमंत्री निवास के एक आलिशान हॉल में पलायन जैसे गंभीर मुद्दे के लिए उत्तराखंड की सरकार को उन मेहमानों को बाहर से बुलाना पड़ा जो खुद पलायन करके बहुत पहले ही उत्तराखंड से जा चुके हैं और जो बचे हैं वो अपने गांव की मिट्टी को छोड़कर देहरादून की आबोहवा में सांस ले रहे हैं.
कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह