दो बहनों ने राष्ट्रपति को खून से लिखा पत्र, कहा- अंकिता भंडारी की हत्या समाज की अंतरात्मा की हत्या

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर न्याय की मांग अब खून से लिखे गए सवालों तक पहुंच गई है. अल्मोड़ा की दो सगी बहनों ने अपने खून से राष्ट्रपति को पत्र लिखकर पूछा है कि जब एक बेटी को न्याय नहीं मिलता, तो बाकी बेटियां कैसे सुरक्षित हैं. यह विरोध सिस्टम की संवेदनहीनता पर करारा तमाचा बन गया है.

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'अंकिता भंडारी को न्याय दो...', बहनों ने राष्ट्रपति को खून से लिखा पत्र (Photo: itg) 'अंकिता भंडारी को न्याय दो...', बहनों ने राष्ट्रपति को खून से लिखा पत्र (Photo: itg)

aajtak.in

  • अल्मोड़ा,
  • 09 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:02 PM IST

उत्तराखंड की धरती से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकार, व्यवस्था और समाज- तीनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अंकिता भंडारी मर्डर केस को लेकर दो सगी बहनों ने अपने खून से महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर यह सवाल किया है कि जब एक बेटी को न्याय नहीं मिलता, तो देश की बाकी बेटियां कैसे सुरक्षित मानी जाएं. यह कोई प्रदर्शन मात्र नहीं, बल्कि उस हताशा, पीड़ा और आक्रोश का प्रतीक है, जो अंकिता भण्डारी हत्याकांड के बाद प्रदेश के जनमानस में लगातार गहराता जा रहा है.

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कक्षा 10 में पढ़ती है छोटी बहन

खून से पत्र लिखने वाली छोटी बहन संजना, काशीपुर स्थित तारावती बालिका विद्या मंदिर की छात्रा है. वह अभी कक्षा 10 में पढ़ती है, लेकिन उसके सवाल सत्ता के शीर्ष तक पहुंच चुके हैं. संजना और उसकी बड़ी बहन कुसुम लता बौड़ाई, दोनों सल्ट विधानसभा, जनपद अल्मोड़ा की मूल निवासी हैं. एक पहाड़ी परिवार की बेटियां, जिन्होंने यह दिखा दिया कि जब व्यवस्था बहरी हो जाए, तो बेटियां अपनी देह की आखिरी हद तक जाकर सवाल करती हैं.

संवैधानिक कोशिश अनसुनी हुई तो विरोध का रास्ता

बड़ी बहन कुसुम लता बौड़ाई केवल एक आम नागरिक नहीं हैं. वह किसान मंच की प्रदेश प्रवक्ता होने के साथ-साथ पहाड़ों फाउंडेशन की अध्यक्ष भी हैं. सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी कुसुम लता ने जब देखा कि अंकिता भण्डारी को न्याय दिलाने की हर संवैधानिक कोशिश अनसुनी होती जा रही है, तो उन्होंने विरोध का वह रास्ता चुना, जिसे देखकर पूरा समाज सन्न रह गया.

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यह समाज की अंतरात्मा की हत्या

अपने खून से लिखे गए पत्र में साफ शब्दों में लिखा गया है कि यह केवल अंकिता की हत्या का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की अंतरात्मा की हत्या है. जब सबूतों के नष्ट होने की बातें सामने आती हो, जब गवाहों पर दबाव की आशंकाएं हों, जब प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलने के आरोप हों और फिर भी न्याय में लगातार देरी हो- तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है? बहनों का कहना है कि यह खून से लिखा पत्र उस व्यवस्था के खिलाफ अंतिम चेतावनी है, जो अब तक संवेदनहीन बनी हुई है.

खून से सवाल लिखने को मजबूर हैं बेटियां

कुसुम लता बौड़ाई ने सरकार को घेरते हुए कहा कि लंबे समय से 'जांच चल रही है' जैसे जुमलों के सहारे जनता को चुप कराने की कोशिश की जा रही है. लेकिन अब हालात ऐसे हो चुके हैं कि छात्राएं, बहनें और बेटियां अपने खून से सवाल लिखने को मजबूर हैं. उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक अंकिता भण्डारी को निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध न्याय नहीं मिलता, तब तक यह संघर्ष रुकेगा नहीं- चाहे उसे कितनी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

झकझोर देने वाला विरोध

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इस खून से लिखे पत्र ने सोशल मीडिया से लेकर सामाजिक संगठनों तक गहरी हलचल पैदा कर दी है. महिला अधिकार समूहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने इसे न्याय के लिए अब तक का सबसे झकझोर देने वाला प्रतीकात्मक विरोध बताया है. लोगों का कहना है कि यह घटना बताती है कि सरकार और व्यवस्था ने जनता को किस हद तक निराश कर दिया है, जब एक नाबालिग छात्रा को भी अपने खून से राष्ट्रपति से न्याय मांगना पड़ रहा है.

Input: संजय सिंह

 

 

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