सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लगेगा मगर सच है कि जिस देवभूमि उत्तराखंड से गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियां निकल रही हैं और जिनके जल को इस्तेमाल कर देश की राजधानी दिल्ली के लोग भी अपनी प्यास बुझाते हैं. उसी प्रदेश के देहरादून शहर में कालसी ब्लॉक का एक ऐसा स्कूल भी है, जिसकी 180 छात्रों का भविष्य सिर्फ इसलिए अधर में लटका हुआ है, क्योंकि प्रदेश सरकार स्कूल के बच्चों को पानी देने में समर्थ नहीं है. बच्चे इसलिए अपना स्कूल छोड़कर घर बैठे हैं कि उनके पास पीने के लिए पानी नहीं है.
ये स्कूल है अनुसूचित जनजातीय बच्चों के लिए एक मात्र आवासीय इण्टर कॉलेज, जो कालसी में चल रहा है. पानी की किल्लत के चलते पिछले 5 महीने से इस स्कूल ने 180 बच्चों की छुट्टी की हुई है.
क्यों प्यासे हैं 180 स्कूली छात्र
3 जुलाई 2017 को देहरादून की कालसी तहसील में मौजूद एकलव्य नाम के इस आवासीय स्कूल में भारी बारिश और बादल फटने के चलते मलवा घुस आया था. तकरीबन 450 गरीब प्रतिभावान बच्चों को शिक्षा दे रहे इस एकमात्र जनजातीय स्कूल से 180 बच्चों को व्यवस्था दुरुस्त होने तक घर भेज दिया गया था, जो स्कूल के ही छात्रावास में रहते थे. बादल फटने की घटना बेहद गंभीर थी, लेकिन इस हादसे में किसी की जान नहीं गयी.
आनन फानन में घोषणावीर सरकार हरकत में आई जिसके बाद मलवे की सफाई और टूटी पानी की लाइन को ठीक करने के लिए सरकार ने तुरंत एक बड़े बजट की घोषणा की. हालांकि 5 महीने बीत जाने के बाद भी स्कूल में पानी की लाइन नहीं पहुंच पायी है. पानी की इस किल्लत की वजह से 180 बच्चों का भविष्य आज अधर में लटक चुका है. स्कूल के प्रधानाचार्य डॉ जी .सी. बडोनी भी इस बात को लेकर काफी चिंतित और दुखी हैं, क्योंकि मामला बच्चों के भविष्य का है. उनका कहना है कि मामले में दोषी अगर कोई है तो वो है सरकारी अमला और संबंधित विभाग. उनकी लापरवाही ने आज 180 स्कूली बच्चों को एक ऐसे अंधकार में धकेल दिया है, जिसमें से जल्द रोशनी की किरण सामने आती दिखाई नहीं दे रही है.
पानी को भटक रहे हैं अभिभावक
वहीं दूसरी ओर अभिभावक सरकार की चौखट पर अपनी फरयाद लेकर पहुंच रहे हैं. देहरादून जिलाधिकारी को भी स्कूल में जल्द पानी की व्यवस्था दुरुस्त कराने को लेकर अभिभावकों ने एक अर्जी लगायी है. मामले में पानी की लाइन बिछाने के लिए वन विभाग सहित कई विभागों की अनुमति लटकी पड़ी है. जिसकी वजह से पानी की लाइन स्कूल तक नहीं पहुंच पा रही है.
क्या वाकई चिंतित हैं जिलाधिकारी?
जिलाधिकारी एसए मुरुगेशन भी इस मसले पर पूरी तरह से गंभीर नज़र नहीं आये. जिलाधिकारी ने मसले पर संज्ञान लेने की बात जरूर की और साथ ही 180 बच्चों के भविष्य के प्रति चिंता भी जताई. हालांकि 3 जुलाई को हुई घटना के 5 महीने बीत जाने के बाद भी सिर्फ संज्ञान लेने की बात क्यूं हो रही है?
बहरहाल 25 नवंबर की समयसीमा बता कर प्रशासन ने मुद्दे को शांत करने की कोशिश की. हालांकि अभी तक इस मामले को खत्म करने के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ है. एक दिन में समस्या खत्म होने की बात मुमकिन नहीं लगती. ऐसे में छात्रों के भविष्य का सवाल गंभीर है जिसका जवाब अब सिर्फ सरकारी अमले को ही ढूंढना होगा.
दिलीप सिंह राठौड़ / अंकुर कुमार