अपनी जांच रिपोर्ट से कई मंत्रियों को भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति का दोषी तय करने वाले यूपी के पूर्व लोकायुक्त जस्टिस एन के मेहरोत्रा का 78 वर्ष की उम्र में लखनऊ में निधन हो गया है. एन के मेहरोत्रा लंबे समय से बीमार चल रहे थे. उनके निधन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शोक जताया है. एन के मेहरोत्रा की जांच रिपोर्ट पर कई मंत्रियों को बर्खास्त किया गया था. मेहरोत्रा ऐसे लोकायुक्त थे जिनकी जांच में दो विधायकों को दोहरे लाभ का दोषी पाया गया और उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई थी. उत्तर प्रदेश में पहली बार इस तरह का एक्शन लिया गया था.
यूपी के पूर्व लोकायुक्त जस्टिस एन के मेहरोत्रा ने लोकायुक्त के रूप में 16 मार्च 2006 को यूपी के पांचवें लोकायुक्त बने थे. उस समय मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे और राज्यपाल टीवी राजेश्वर ने उनको लोकायुक्त पद की शपथ दिलाई थी. उसके बाद से लोकायुक्त ने जनता और आम लोगों की शिकायतों पर भ्रष्टाचार की जांच करना शुरू किया था. उन्होंने लोकायुक्त दफ्तर को जनता दरबार में तब्दील कर दिया था. कोई भी व्यक्ति कार्य दिवस में किसी भी समय सीधे उनसे मिल सकता था. एन के मेहरोत्रा देश के एकमात्र लोकायुक्त हैं, जिनकी जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन सरकार के कई ताकतवर मंत्रियों पर गाज गिरी थी.
लोकायुक्त की जांच के बाद कई ताकतवर मंत्रियों को हटना पड़ा था
एन के मेहरोत्रा उस समय चर्चा में आए थे, जब उनकी जांच रिपोर्ट के आधार पर मायावती सरकार के कई मंत्रियों के खिलाफ जांच शुरू की गई थी. सबसे पहले उन्होंने मायावती सरकार के होम्योपैथिक और धर्मार्थ कार्य राज्यमंत्री राजेश त्रिपाठी के खिलाफ जांच पूरी की. अंत्येष्टि स्थल पर कब्जे के लिए शुरू हुई जांच में राजेश त्रिपाठी को दोषी पाया गया. उसके बाद माया सरकार में कद्दावर मंत्री रहे अवध पाल सिंह यादव के खिलाफ जांच रिपोर्ट में भी वो भ्रष्टाचार और अपने बेटे को सरकारी पशुधन अस्पतालों के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट देने और उसमें अनियमितता के दोषी पाए गए. इन दोनों मंत्रियों को लोकायुक्त एन के मेहरोत्रा की रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री मायावती ने बर्खास्त कर दिया था.
मायावती को लेने पड़े थे कठोर फैसले
इसके अलावा मायावती सरकार में शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्रा और श्रम मंत्री बादशाह सिंह पर लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट की वजह से गाज गिरी थी. रंगनाथ मिश्रा पर भदोही और बादशाह सिंह ओर महोबा में ग्राम सभा की जमीन कब्जा करने और भ्रष्टाचार का आरोप लगा. उस समय रंगनाथ मिश्रा ब्राह्मण समुदाय का सरकार में एक चेहरा थे और बीएसपी की सोशल इंजीनियरिंग के तहत उनको हटाना एक बड़ा फैसला था. वहीं बादशाह सिंह की बुंदेलखंड में पकड़ थी. मायावती ने इन मंत्रियों को न सिर्फ हटाया बल्कि इस बात को प्रचारित भी किया कि भ्रष्टाचार में शामिल किसी व्यक्ति को वो मंत्रिमंडल में नहीं रखना चाहतीं. हालांकि इसके पीछे लोकायुक्त की मजबूत और तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट थी जिसको नजरंदाज करना मुश्किल था.
लोकायुक्त संगठन की साख बढ़ाने का श्रेय
जस्टिस एन के मेहरोत्रा को लोकायुक्त संगठन की साख को बढ़ाने के लिए भी जाना जाता है. अपने कार्यकाल के दौरान एक ही समय पर लोकायुक्त के रूप में एनके मेहरोत्रा तत्कालीन बीएसपी सरकार के 18 मंत्रियों और 16 विधायकों की जांच कर रहे थे. साथ ही विपक्ष के भी कई विधायकों की जांच कर रहे थे. कहा जाता है कि उन्होंने आम लोगों की शिकायत पर जांच कर तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार करवाई, जिसके आधार पर जनप्रतिनिधियों को दोषी करार दिया जा सका. उनके ये तेवर अखिलेश यादव सरकार में भी जारी रहे. उन्होंने इन दिनों जेल में बंद तत्कालीन खनन मंत्री गायत्री प्रजापति की भी जांच की थी. सरकार में उनकी रिपोर्ट पर आधा दर्जन नगर पंचायत अध्यक्ष हटाए गए थे. राजकीय निर्माण निगम के आधा दर्जन प्रोजेक्ट मैनेजरों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी.
शिल्पी सेन