माया नहीं मानी तो कांग्रेस को अपना गढ़ रायबरेली-अमेठी बचाना हो जाएगा मुश्किल

बीजेपी कांग्रेस को उसी के दुर्ग अमेठी और रायबरेली में घेराबंदी करने की रणनीति पर काम कर रही है. ऐसे में बसपा ने कांग्रेस के साथ तीन राज्यों में होने वाले चुनाव में गठबंधन नहीं करने का फैसला किया है. ऐसा ही रुख बसपा यूपी में भी अख्तियार करती है तो कांग्रेस को अपना गढ़ बचाना एक बड़ी चुनौती होगी.

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मायावती, सोनिया गांधी और राहुल गांधी (फोटो क्रेडिट, आजतक फाइल फोटो) मायावती, सोनिया गांधी और राहुल गांधी (फोटो क्रेडिट, आजतक फाइल फोटो)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 05 अक्टूबर 2018,
  • अपडेटेड 12:45 PM IST

इस साल के आखिर में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी खेमे में दरार पड़ गई है. बसपा अध्यक्ष मायावती ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करने का ऐलान किया है. लेकिन इस फैसले के संकेत दीर्घकालीन हैं. इससे महागठबंधन लेकर लोकसभा चुनाव में उतरने की कांग्रेस की कोशिशों को झटका लगा है.

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अगर बसपा इस तरह का रवैया यूपी में भी अख्तियार करती है तो सूबे में कांग्रेस अलग-थलग पड़ जाएगी. ऐसे में 2019 के चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपनी ही सीटें बचाने में लोहे के चने चबाने पड़ सकते हैं. बता दें कि बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उसके ही दुर्ग में घेरने की रणनीति बना रखी है.

राहुल को अमेठी और सोनिया को रायबरेली में मात देने के लिए बीजेपी लगातार दोनों संसदीय सीटों पर सक्रिय है. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दोनों क्षेत्रों का दौरा करके 'गांधी परिवार' के करीबी नेताओं को अपने साथ मिलाया था.

बीजेपी के बाद अगर बसपा ने कांग्रेस से यूपी में मुंह फेरा तो कांग्रेस के लिए अपना किला बचाना मुश्किल हो जाएगा. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राहुल गांधी को अमेठी में घेरने की कवायद की थी, जिसके चलते कांग्रेस अध्यक्ष को अपना किला बचाने में पसीने छूट गए थे. 2014 में बीजेपी ने अमेठी में राहुल के खिलाफ स्मृति ईरानी को उतारा था.

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स्मृति ईरानी के खिलाफ राहुल को जीतने में पसीने छूट गए थे. हालत ये हो गई कि प्रियंका गांधी को अमेठी में डेरा जमाना पड़ा. इसके अलावा सपा ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे. इसके बाद कहीं जाकर राहुल एक लाख वोट से जीत सके. जबकि इससे पहले के चुनाव में राहुल ने तीन लाख से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की थी.

2014 के चुनाव में अमेठी संसदीय सीट पर राहुल गांधी को 408651 वोट मिले थे. वहीं, बीजेपी की स्मृति ईरानी को 300748 वोट मिले थे. जबकि बसपा उम्मीदवार धर्मेंद्र प्रताप सिंह को 57716 वोट मिले थे. जबकि 2009 में बसपा उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे और उन्हें 93997 वोट मिले थे. इसके अलावा 2017 के विधानसभा चुनाव अमेठी में कांग्रेस का खाता नहीं खुल सका था. जबकि बीजेपी ने सभी पांचों सीटें जीतने में कामयाब रही थी.

स्मृति ईरानी पिछले चार साल से अमेठी में सक्रिय हैं. वो लगातार अमेठी का दौरा कर रही हैं और स्थानीय मुद्दों को उठाकर कांग्रेस आलाकमान को घेरती रहती हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सोनिया गांधी के सामने अजय अग्रवाल को मैदान में उतारा था. मोदी लहर के बावजूद वो सोनिया के सामने कड़ी चुनौती पेश नहीं कर सके थे. लेकिन बीजेपी को करीब पौने दो लाख वोट मिले थे. हालांकि सोनिया गांधी करीब 3 लाख से ज्यादा मतों से जीतने में कामयाब रही थीं. लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली की पांच सीटों में से कांग्रेस को महज दो सीटें मिली थीं. इसके अलावा दो सीटें बीजेपी और एक सीट सपा ने जीती थी.

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अब बीजेपी ने 2019 में रायबरेली की घेराबंदी करने का प्लान बना रखा है. इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने सोनिया गांधी के संसदीय सीट से एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह को अपने साथ मिला लिया है. ऐसे में बसपा अगर चुनाव में उतरती है फिर सोनिया के लिए अपना किला बचा पाना टेढ़ी खीर हो जाएगा.

दिलचस्प बात ये है कि अमेठी और रायबेरली दोनों सीटों पर दलित और ओबीसी खासकर यादव समाज के वोटर अच्छे खासे हैं. यूपी में अगर कांग्रेस के बिना सपा और बसपा हाथ मिलाते हैं तो ऐसे में दोनों सीटें मायावती के खाते में आएंगी. बसपा पिछले चुनाव की तरह इस बार भी उम्मीदवार उतरेगी. ऐसे में बसपा के वोट के साथ-साथ सपा के वोट भी उसे मिलेंगे, जिससे कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी.

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