दुनियाभर में आज साइकिल दिवस मनाया जा रहा है. हर कोई पर्यावरण की दुहाई देकर लोगों से अपील कर रहा है कि साइकिल का इस्तेमाल करें. इससे आप फिट भी रहेंगे और हिट भी. लेकिन फिट और हिट के इस फॉर्मूले से इतर भारतीय राजनीति में ‘साइकिल’ के लिए 3 जून का दिन कुछ यादगार नहीं रहा. लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद जब बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती समीक्षा करने बैठीं तो उनका गुस्सा समाजवादी पार्टी पर जमकर निकला.
मायावती ने अपनी बैठक में मान लिया कि हाथी और साइकिल का गठबंधन लोगों को पसंद नहीं आया, गलती साइकिल वालों की तरफ से अधिक रही. मायावती ने आरोप लगाया है कि साइकिल चलाने वाले नेता ही अपने घर में जीत का दीपक नहीं जला सके तो उनके वोटरों से क्या उम्मीद हो.
दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले जब ये खबरें आ रही थीं कि 25 साल पुरानी दुश्मनी भुलाकर सपा-बसपा एक साथ आ सकते हैं, तो इसे भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव माना गया. हर कोई कह रहा था कि सपा-बसपा के इस फॉर्मूले से पार पाना भारतीय जनता पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.
लेकिन नमो-नमो के मंत्र पर भारतीय जनता पार्टी को इतना भरोसा था कि उन्होंने तो जैसे ठाना हुआ था कि सपा-बसपा का टूटना तय है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस बात की भविष्यवाणी की थी कि 23 मई के बाद SP-BSP के साथ की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी.
साइकिल और हाथी साथ आए, थोड़ा तोल-मोल हुआ और फिर तय हुआ कि साइकिल छोटी ही रहेगी और हाथी बड़ा भाई बनेगा. लेकिन इसी साल जनवरी में शुरू हुआ ये साथ, 6 महीने के बाद ही अधर में आ पहुंचा है. लोकसभा चुनाव में नतीजे उम्मीदों से बिल्कुल उलट साबित हुए, 38 सीटों पर लड़ने वाली बसपा सिर्फ 10 और 37 सीटों पर लड़ने वाली सपा सिर्फ 5 सीटों पर ही सिमट गई.
मायावती की तीखी बयानबाजी से इस साथ पर सवाल खड़े होने लगे हैं. लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान वादा हुआ था कि ये साथ 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव तक चलेगा. हालांकि, अब जिस तरह से संकेत मिल रहे हैं उससे 2022 का मिशन तो बहुत दूर ही लग रहा है.
अब बस देखना है कि गठबंधन आगे चलेगा या नहीं चलेगा और नज़र इसपर भी होगी कि साइकिल का पहिया पहले निकलेगा या फिर पहले हाथी साइकिल की सवारी को अलविदा कहेगा.
मोहित ग्रोवर