आज रंग है ऐ मां, रंग है री
मोरे ख्वाजा के घर के रंग है री
आज सजन मिलावरा मोरे आंगन में
आज रंग है ऐ मां, रंग है री
मोहे पीर पायो निजामुद्दीन औलिया
मैं तो जब देखूं मोरे संग है नी मां रंग है री
देस विदेस में ढूंढ फिरी हूं
मोहे तोरा रंग भायो निजामुद्दीन
हिंदी खड़ी बोली या हिंदवी के पहले कवि कहे जाने वाले अमीर खुसरो ने अपने आध्यात्मिक गुरू दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन औलिया के लिए ये पंक्तियां कही थीं. होली के त्योहार का आनंद अगर सूफियाना अंदाज में मनाना हो तो इनसे अच्छा कुछ नहीं है. अमीर खुसरो निजामुद्दीन औलिया के दीवाने थे, उन्होंने अपनी कलम से जो भी लिखा सब निजामुद्दीन पर न्यौछावर किया.
कहा जाता है कि जिस दिन अमीर खुसरो अपने पीर हजरत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य बने, वो दिन होली का ही था. उस दौरान ही उन्होंने औलिया की तारीफ में आज रंग है... लिखा था. खुसरो ने अपनी मां के सामने औलिया की तारीफ में राग बहार में गाया था.
खुसरो की पैदाइश सन् 1253 के आस-पास की बताई जाती है. खुसरो को बचपन में कुछ खास तालीम नहीं मिली, लेकिन काफी कम उम्र से ही उन्होंने सूफी को समझना शुरू कर दिया था. लेकिन सूफी ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की सोहबत पाकर वह हीरा हो गए, यानी ज्ञानी हो गए. करीब छह साल तक खुसरो जलालुद्दीन खिलजी और उसके बेटे अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में भी रहे.
(तस्वीर - अमीर खुसरो, क्रेडिट- वीकिपीडिया)
1310 में खुसरो निजामुद्दीन औलिया के करीब आए और उनके लिए ही लिखना शुरू कर दिया. उन्होंने अधिकतर हिंदवी, फारसी, अरबी में ही कव्वाली लिखी. 1325 में जब निजामुद्दीन औलिया का देहांत हुआ तो उस दौरान खुसरो कहीं बाहर गए हुए थे. करीब 6 महीने बाद जब वो वापस दिल्ली लौटे तो उन्हें इस बात का पता चला. और ये लिखा... निजामुद्दीन औलिया के जाने के कुछ समय बाद ही अमीर खुसरो का भी अक्टूबर, 1325 में देहांत हो गया था.
''गोरी सौवैं सेज पर, मुख पर डारौ केस, चल ख़ुसरो घर आपणे, सांझ भई चहुदेस.''
आज भी दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर अमीर खुसरो की कई कव्वालियों को गाया जाता है. जिनमें आज रंग है, छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके, ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल शामिल हैं.
आज रंग है को पाकिस्तानी कव्वाल नुसरत फतेह अली खान, साबरी ब्रदर्स और हाल ही में राहत फतेह अली खान ने कोक स्टूडियो में भी गाया था.
नुसरत फतेह अली खान का आज रंग है यहां क्लिक कर सुनें...
दैय्या रे मोहे भिजोया री,
शाह निजाम के रंग में,
कपड़े रंग के कुछ न होत है,
या रंग में तन को डुबोया री.
-अमीर खुसरो
मोहित ग्रोवर