आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को किस आधार पर मिले हुए हैं सरकारी बंगले?

अगर सरकारी आवास पर किसी ने गैरकानूनी रूप से कब्जा किया है, तो केंद्र सरकार का एस्टेट ऑफिसर उसको नोटिस जारी करता है. यह नोटिस कब्जे वाले सरकारी आवास पर भी चस्पाया जाता है. इसके बाद जब कब्जाधारी नोटिस का जवाब देता है, तो उसकी जांच की जाती है. इसके बाद एस्टेट ऑफिसर कब्जा खाली करने का आदेश जारी करता है.

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मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी (फाइल फोटो) मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 10:09 PM IST

  • प्रियंका गांधी वाड्रा को सरकारी बंगला खाली करने का आदेश दे चुकी है केंद्र सरकार
  • एसपीजी के अलावा दूसरी सुरक्षा पाने वाले प्राइवेट लोगों को नहीं मिलते सरकारी बंगला

केंद्र सरकार ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से एक अगस्त तक नई दिल्ली स्थित सरकारी बंगला खाली करने को कहा है. सरकार ने पब्लिक प्रिमाइजेज (एविक्शन ऑफ अनऑथराइज्ड ऑक्युपेंट्स) अमेंडमेंट बिल 2019 के आधार पर प्रियंका गांधी को सरकारी बंगला खाली करने का आदेश दिया है. यह संशोधित कानून सितंबर 2019 में लागू हुआ था.

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सरकारी आवास उन लोगों को एक निर्धारित अवधि के लिए दिया जाता है, जो स्पेसिफाइड सार्वजनिक सेवा में कार्यरत हैं. पॉलिसी के मुताबिक एसपीजी सुरक्षा प्राप्त लोगों के अलावा किसी दूसरी सुरक्षा मिलने के आधार पर सरकारी आवास आवंटित नहीं किया जा सकता है.

ऐसे में सवाल यह है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को सरकारी आवास क्यों मिले हुए हैं? दरअसल, कैबिनेट कमेटी ऑन एकोमोडेशन (सीसीए) ने सुरक्षा खतरे के आधार पर अपवाद के रूप में आडवाणी और जोशी को सरकारी आवास देने का फैसला किया है.

नए नियम के तहत कुछ सरकारी आवासों को गृह मंत्रालय के निर्देश के तहत आवंटित करने की व्यवस्था की गई है. आडवाणी और जोशी को भी सुरक्षा खतरे के आधार पर गृह मंत्रालय के निर्देश पर सरकारी आवास मिले हुए हैं. इन दोनों को जेड प्लस सिक्युरिटी भी मिली हुई है. हालांकि इनको जेड प्लस सिक्युरिटी मिलने की वजह से सरकारी आवास आवंटित नहीं किए गए हैं, बल्कि सुरक्षा खतरे को देखते हुए आवंटित हुए हैं.

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क्या है सरकारी आवास खाली कराने की प्रक्रिया?

अगर सरकारी आवास पर किसी ने गैरकानूनी रूप से कब्जा किया है, तो केंद्र सरकार का एस्टेट ऑफिसर उसको नोटिस जारी करता है. इस नोटिस के जरिए कब्जाधारी से पूछा जाता है कि आखिर उसके खिलाफ निष्कासन का आदेश क्यों न जारी किया जाए? इसका जवाब देने के लिए कब्जाधारी को तीन दिन का समय दिया जाता है. यह नोटिस कब्जे वाले सरकारी आवास पर भी चस्पाया जाता है.

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इसके बाद जब कब्जाधारी नोटिस का जवाब देता है, तो उसकी जांच की जाती है. इसके बाद एस्टेट ऑफिसर कब्जा खाली करने का आदेश जारी करता है. अगर कब्जाधारी व्यक्ति आदेश का पालन नहीं करता है और सरकारी आवास खाली नहीं करता है, तो एस्टेट ऑफिसर उसको बलपूर्वक खाली करा सकता है और सरकारी आवास को अपने कब्जे में ले सकता है.

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अगर कब्जाधारी निष्कासन के आदेश को चुनौती देता है और सरकारी आवास खाली नहीं करता है, तो उससे हर महीने के हिसाब से मुआवजा वसूला जाता है. साथ ही उससे बलपूर्वक सरकारी आवास खाली कराया जा सकता है.

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