कोलकाता: लॉकडाउन में 2 साल की बच्ची को नहीं मिला इलाज, कैंसर से हुई मौत

बच्ची के पिता बिस्वजीत साहा ने कहा कि हमें कोलकाता मेडिकल कॉलेज जाने के लिए कहा गया क्योंकि पहला ऑपरेशन वहीं हुआ था. हमने बताया कि कोलकाता मेडिकल कॉलेज को कोविड अस्पताल में तब्दील कर दिया गया है. इतना कुछ कहने के बावजूद हमारी बात नहीं सुनी गई.

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प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

इंद्रजीत कुंडू

  • कोलकाता,
  • 13 मई 2020,
  • अपडेटेड 9:56 AM IST

  • बच्ची के परिजनों ने कई अस्पतालों के चक्कर लगाए
  • किसी अस्पताल में नहीं मिला इलाज, कैंसर से मौत

बंगाल में एक दो साल की बच्ची की कैंसर से मौत हो गई. बच्ची की मौत इसलिए हो गई क्योंकि कोरोना वायरस फैलने से उसे सही इलाज नहीं मिल सका. बच्ची के परिजनों का कहना है कि अगर कोरोना महामारी नहीं फैली होती तो शायद वह बच जाती.

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बच्ची के पिता बिस्वजीत साहा ने कहा कि अपनी बीमार बेटी को लेकर वे हर जगह गए लेकिन कोई मदद नहीं मिली. लॉकडाउन के दौरान बच्ची के घरवाले उसे रिक्शे में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले गए लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो सकी. बच्ची पेट के कैंसर से ग्रसित थी लेकिन घरवालों की उम्मीद थी कि अगर सही इलाज मिल जाता तो वह बच जाती.

पहले डॉक्टरों ने बीमार बच्ची को केमोथेरेपी देने की सलाह दी थी. पिछले साल दिसंबर में कोलकाता मेडिकल कॉलेज में उसके पेट के ट्यूमर का ऑपरेशन हुआ था. कुछ महीने पहले उसे पहली बार केमोथेरेपी दी गई थी लेकिन लॉकडाउन के दौरान उसकी हालत और तेजी से बिगड़ती चली गई.

बच्ची के पिता बिस्वजीत साहा ने कहा, हमें कोलकाता मेडिकल कॉलेज जाने के लिए कहा गया क्योंकि पहला ऑपरेशन वही हुआ था. हमने बताया कि कोलकाता मेडिकल कॉलेज को कोविड अस्पताल में तब्दील कर दिया गया है. इतना कुछ कहने के बावजूद हमारी बात नहीं सुनी गई. साहा गरीबी में दिन गुजारते हैं और रोजी-रोटी के लिए रिक्शा चलाते हैं. पूरा परिवार कोलकाता एयरपोर्ट से 20 किमी दूर बामनगाछी में रहता है.

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पिछले हफ्ते बच्ची का पूरा परिवार कोलकाता और उत्तर 24 परगना के कई अस्पतालों में चक्कर काट चुका है. बारासात जिला अस्पताल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्पेशलाइज्ड हॉस्पिटल, आरजी कर मेडिकल कॉलेज और बारासात कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट में इलाज के लिए घरवाले भटकते रहे लेकिन कहीं इसकी सुविधा नहीं मिली. अंत में उचित इलाज के अभाव में रविवार रात बच्ची की मौत हो गई. ताज्जुब की बात यह है कि एक-दो अस्पतालों में दवा चलाने की सलाह देकर बच्ची के परिजनो को डिस्चार्ज सर्टिफिकेट देकर घर भेज दिया गया.

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